बिहार में फाइलेरिया की 'घर वापसी': क्या जलवायु परिवर्तन हमें 'हाथी' बनाने पर तुला है?
जलवायु परिवर्तन, वो शब्द है जो अब सिर्फ पर्यावरण सम्मेलनों के ब्रोशर तक सीमित नहीं रहा. अब ये हमारी थाली से लेकर अस्पताल के बेड तक पहुंच गया है. ताज़ा 'एपिसोड' बिहार से है, जहाँ फाइलेरिया (यानी हाथीपांव) फिर से अपनी 'शाही वापसी' कर रहा है. ये वही बीमारी है जिसे हमने लगभग भूला दिया था, लेकिन लगता है जलवायु देवता और हमारे शहर की नालियां, दोनों ही इसे फिर से 'ग्लैमरस' बनाने पर तुले हैं. तो भई, ये सिर्फ बिहार की बात नहीं, ये हम सबकी कहानी है – कैसे प्रकृति हमें अपने ही कर्मों का हिसाब एक मच्छर के ज़रिए दे रही है. यह खबर हर उस भारतीय के लिए दिलचस्प है जो सोचता है कि 'ग्लोबल वार्मिंग' सिर्फ पोलर बियर का मुद्दा है, हमारे मोहल्ले का नहीं.
मच्छरों की 'पार्टी' और हमारे 'विकास' की कहानी
फाइलेरिया, जिसे आम भाषा में 'हाथीपांव' कहते हैं, एक परजीवी के कारण होता है जो मच्छरों द्वारा फैलता है. एक समय था जब इसे भारत से लगभग ख़त्म करने का दम भरा जाता था. बड़े-बड़े पोस्टर लगते थे, दवाइयां बंटती थीं और हम सब 'स्वस्थ भारत' के सपने देख रहे थे. लेकिन लगता है प्रकृति के पास हमारी 'विकास गाथा' का एक अलग ही स्क्रिप्ट है. अब जब गर्मियां बेहिसाब बढ़ रही हैं, बारिश का पैटर्न बिगड़ रहा है और नमी का स्तर अप्रत्याशित रूप से ऊपर-नीचे हो रहा है, तो मच्छरों को तो पार्टी करने का पूरा मौका मिल गया है. बिहार के कुछ इलाकों में फाइलेरिया के मामलों में फिर से इजाफा देखा जा रहा है. स्वास्थ्य विभाग के माथे पर चिंता की लकीरें हैं, जनता में हल्की सुगबुगाहट. सोशल मीडिया पर शायद अभी मीम्स नहीं बने, लेकिन अगर ये ट्रेंड चला तो 'मच्छर वाली सरकार' जैसे हैशटैग दूर नहीं. विशेषज्ञ साफ कह रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन मच्छरों के प्रजनन और उनके जीवनकाल को प्रभावित कर रहा है, जिससे ये पुरानी बीमारियां फिर सिर उठा रही हैं.
सिर्फ एक 'भारतीय ड्रामा' या प्रकृति का 'अलार्म'?
ये सिर्फ बिहार का किस्सा नहीं, ये पूरे देश के लिए एक 'अलार्म' है. जब हम 'स्मार्ट सिटी' और 'विश्वगुरु' बनने की बात करते हैं, तब हमारी बुनियादी स्वास्थ्य व्यवस्था और पर्यावरणीय स्वच्छता की पोल खुल जाती है. फाइलेरिया का लौटना दिखाता है कि सिर्फ बड़े-बड़े बांध और फ्लाईओवर बनाने से बात नहीं बनेगी, हमें अपनी नालियों, कूड़ेदानों और बढ़ते तापमान पर भी ध्यान देना होगा. यह ट्रेंड सिर्फ स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि हमारी अर्थव्यवस्था पर भी भारी पड़ेगा. बीमार लोग काम कैसे करेंगे? स्वास्थ्य बजट का बोझ बढ़ेगा. क्या हम हर साल एक नई बीमारी के 'सीजनल एपिसोड' के लिए तैयार हैं? या फिर अब भी हम इसे सिर्फ 'एक और भारतीय ड्रामा' मानकर टालते रहेंगे? ये दिखाता है कि पर्यावरण और विकास को अलग करके देखने की हमारी सोच कितनी घातक है. यह अब कोई दूर का सिद्धांत नहीं, बल्कि हमारे दरवाजे पर खड़ी एक कड़वी हकीकत है.
तो अगली बार जब एसी की ठंडी हवा में बैठकर आप ग्लोबल वार्मिंग पर ज्ञान बांटें, तो ज़रा बिहार के उन लोगों का भी सोचें जिन्हें फाइलेरिया की 'घर वापसी' का सामना करना पड़ रहा है. शायद प्रकृति हमें एक बहुत ही 'मच्छर-भर' तरीके से समझाना चाहती है कि अब भी वक्त है, सुधर जाओ! वरना, 'हाथीपांव' सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि हमारे लापरवाह 'विकास' का एक जीता-जागता स्मारक बन जाएगा. और तब, 'विकास' की परिभाषा में शायद 'मच्छर-मुक्त भारत' की जगह 'फाइलेरिया-युक्त भारत' जुड़ जाए!