टैरिफ का अमेरिकी तड़का: ट्रंप बोले 'नो चेंज', अधिकारी बोले '10%' – भारत पर क्या असर?

अमेरिकी टैरिफ पर ट्रंप के बयान और अधिकारी की घोषणा के बीच विरोधाभास दिखाती हास्यपूर्ण तस्वीर, भारतीय निर्यातकों की चिंता दर्शाते हुए।

अमेरिका-भारत ट्रेड ड्रामा: जब ट्रंप कुछ और कहें और अधिकारी कुछ और!

अरे भई वाह! अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दुनिया भी किसी बॉलीवुड फिल्म से कम नहीं। आए दिन कोई न कोई नया ट्विस्ट, नया सस्पेंस! इस बार मामला है अमेरिका और भारत के बीच टैरिफ का, जिसमें एंट्री हुई है पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके 'नो चेंज' वाले बयान की। उधर, अमेरिकी अधिकारी कुछ और ही राग अलाप रहे हैं। तो भैया, ये माजरा क्या है? और हमारे आम भारतीय, जो सुबह-शाम अपनी दाल-रोटी की फिक्र में रहते हैं, उनके लिए ये 'टैरिफ-टैरिफ' का खेल क्यों दिलचस्प है?

दरअसल, खबर ये है कि एक तरफ अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फरमा रहे हैं कि ट्रेड डील में कोई बदलाव नहीं होगा, कोई नया टैरिफ नहीं लगेगा। दूसरी तरफ, अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) के अधिकारी बता रहे हैं कि भारत के कुछ चुनिंदा उत्पादों पर 10% टैरिफ 18 जून से लागू होने वाला है। अब आप कहेंगे, ये तो वही बात हो गई कि 'घर के बड़े कुछ और कहें और बच्चे कुछ और ही खिचड़ी पका रहे हों!' हमारे निर्यातकों के माथे पर चिंता की लकीरें हैं, और सोशल मीडिया पर तो इस 'ट्रंप वर्सेज रियलिटी' के मीम्स बनने शुरू हो चुके हैं। सीधे शब्दों में कहें तो, हमारे झींगा, बासमती चावल और सोने-चांदी के आभूषणों पर अब अमेरिका में एंट्री महंगी होने वाली है।

पुराने फैसले, नया सिरदर्द: ट्रेड वॉर का एक और एपिसोड?

ये कोई रातोंरात लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें 2019 में ट्रंप प्रशासन के 'अमेरिका फर्स्ट' नारे में छिपी हैं। तब ट्रंप ने भारत को 'जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेस' (GSP) से बाहर कर दिया था और कुछ भारतीय उत्पादों पर ये टैरिफ लगाने की बात कही थी। फिर कोरोना आया, दुनिया थम गई, और ये फैसले भी ठंडे बस्ते में चले गए। अब अचानक, जैसे कोई पुरानी बॉलीवुड फिल्म का सीक्वल अचानक रिलीज हो जाए, वैसे ही ये टैरिफ फिर से जाग उठे हैं।

अमेरिकी अधिकारी साफ कह रहे हैं कि ये तो पुराना ही फैसला है, जिसे अब लागू किया जा रहा है। मतलब, ट्रंप का 'नो चेंज' वाला बयान शायद मौजूदा ट्रेड पॉलिसी के संदर्भ में हो, लेकिन ये पुराने घाव अब हरे हो रहे हैं। भारतीय निर्यातकों के लिए ये किसी झटके से कम नहीं है, खासकर तब जब वे वैश्विक मंदी और अन्य चुनौतियों से जूझ रहे हैं। सरकार की ओर से अभी तक कोई बड़ी प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत भी चुप बैठने वाला नहीं। याद है जब अमेरिका ने स्टील पर टैरिफ लगाया था, तो हमने भी अमेरिकी सेब और बादाम पर जवाबी शुल्क ठोक दिया था? कूटनीतिक शतरंज की बिसात बिछ चुकी है, और हर चाल सोच-समझकर चली जाएगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह वैश्विक व्यापार में अस्थिरता का एक और संकेत है। ट्रंप के कार्यकाल से लेकर अब तक, अमेरिका की व्यापार नीतियां अक्सर 'अप्रत्याशित' रही हैं। यह घटना भारत के लिए 'आत्मनिर्भर भारत' के संकल्प को और मजबूत करने का एक अवसर भी हो सकती है, ताकि हम अपनी अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचा सकें। लेकिन फिलहाल तो यह हमारे निर्यातकों के लिए एक नया सिरदर्द ही है।

क्या यह एक ट्रेंड है या बस एक और 'भारतीय ड्रामा एपिसोड'?

तो क्या ये व्यापार युद्ध का एक नया ट्रेंड है, या बस अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक और 'भारतीय ड्रामा एपिसोड' जो जल्द ही खत्म हो जाएगा? सच कहूं तो, ये दोनों का ही मिश्रण लगता है। वैश्विक व्यापार हमेशा से ही हितों के टकराव और कूटनीतिक दांवपेच का अखाड़ा रहा है। कभी अमेरिका भारत को GSP से बाहर करता है, कभी भारत अमेरिका के उत्पादों पर शुल्क लगाता है। ये चलता रहता है, जैसे घर में कभी-कभी होने वाली नोक-झोंक।

आगे क्या होगा? क्या भारत सरकार जवाबी कार्रवाई करेगी? क्या ये टैरिफ वाकई 18 जून से लागू होंगे, या फिर कोई नया 'ट्वीट' या 'बयान' आकर इसे फिर से टाल देगा? ये तो वक्त ही बताएगा। लेकिन एक बात तो तय है, जब तक ट्रंप खुद कोई नया ट्वीट न करें, तब तक कुछ भी अंतिम नहीं! और हां, व्यापार की इस दुनिया में, 'नो चेंज' का मतलब भी कभी-कभी 'बड़े चेंज' हो सकता है। देखते हैं आगे और कौन सा 'ट्विस्ट' आता है!

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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