पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड मामले से बरी कर दिया है। यह फैसला राम रहीम के लिए एक बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, जो पहले से ही दो साध्वियों के यौन शोषण मामले में 20 साल की सजा काट रहे हैं। हालांकि, इसी मामले में तीन अन्य दोषियों - कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल - की आजीवन कारावास की सजा को हाईकोर्ट ने बरकरार रखा है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर छत्रपति हत्याकांड को सुर्खियों में ला दिया है और न्याय की लंबी लड़ाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
छत्रपति हत्याकांड: क्या था पूरा मामला और अब तक का सफर?
यह मामला अक्टूबर 2002 का है, जब सिरसा स्थित 'पूरा सच' अखबार के संपादक पत्रकार रामचंद्र छत्रपति को उनके घर के बाहर गोली मार दी गई थी। गंभीर रूप से घायल छत्रपति ने 21 नवंबर 2002 को दम तोड़ दिया था। इस हत्या की जड़ें अगस्त 2002 में प्रकाशित एक गुमनाम पत्र से जुड़ी थीं, जिसमें डेरा सच्चा सौदा की साध्वियों के साथ यौन शोषण और दुष्कर्म के गंभीर आरोप लगाए गए थे। रामचंद्र छत्रपति ने इस पत्र को अपने अखबार में प्रकाशित कर डेरा प्रमुख की गतिविधियों को उजागर करने का साहस दिखाया था।
छत्रपति के निधन के बाद, उनके पुत्र अंशुल छत्रपति ने न्याय के लिए संघर्ष शुरू किया। उनकी याचिका पर, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 2003 में मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी। नवंबर 2003 में सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की और जांच शुरू की। डेरा सच्चा सौदा ने 2004 में इस जांच को रुकवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की, लेकिन शीर्ष अदालत ने इसे खारिज कर दिया। करीब 16 वर्षों तक यह हाई-प्रोफाइल मामला पंचकूला की स्पेशल सीबीआई कोर्ट में चला, जहां 2018-2019 में सीबीआई ने चार्जशीट दाखिल की।
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सीबीआई अदालत ने 2019 में इस मामले को एक सुनियोजित साजिश करार देते हुए गुरमीत राम रहीम सिंह, कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल को दोषी ठहराया था। अदालत ने इन सभी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। गुरमीत राम रहीम ने इस फैसले के खिलाफ पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में अपील दायर की थी, जिस पर आज सुनवाई करते हुए उन्हें बरी कर दिया गया।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद प्रतिक्रिया और आगे की राह
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के इस फैसले पर दिवंगत पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के परिवार की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आई है। उनके छोटे पुत्र हरि दमन छत्रपति ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वे हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। हरि दमन ने दोहराया कि उनके पिता की हत्या डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के कहने पर ही की गई थी और वे अपने पिता को न्याय दिलाने के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करेंगे। यह बयान दर्शाता है कि न्याय की यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक जाने की पूरी संभावना है।
यह फैसला भारतीय न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग दृष्टिकोंण को भी दर्शाता है, जहां निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए व्यक्ति को ऊपरी अदालत से राहत मिल सकती है। गुरमीत राम रहीम सिंह वर्तमान में रोहतक की सुनारिया जेल में बंद हैं, जहां वे दो साध्वियों से दुष्कर्म के मामले में 20 साल की सजा काट रहे हैं। छत्रपति हत्याकांड से बरी होने के बावजूद, उनकी जेल से रिहाई की संभावना फिलहाल दूर है।
इस फैसले का समाज और मीडिया जगत पर भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है। पत्रकार रामचंद्र छत्रपति को अक्सर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निडर पत्रकारिता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। उनके परिवार का सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय न्याय की उम्मीद को बनाए रखता है और यह सुनिश्चित करता है कि इस बहुचर्चित मामले पर देश की सबसे बड़ी अदालत में भी विचार किया जाएगा। यह घटनाक्रम न्यायपालिका के प्रति जनता के विश्वास और कानून की जटिल प्रक्रियाओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण है, जहां हर फैसले के बाद एक नई कानूनी चुनौती सामने आ सकती है।
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.