राजस्थान क्रिकेट संघ: अब मैदान में उतरेंगे 'नेता पुत्र', कैबिनेट विस्तार की जगह 'कमेटी विस्तार' क्यों...?
क्रिकेट प्रेमियों, कुर्सी बचाने वाले नेताओं और भावी नेताओं के चमत्कारी पुत्रों, सादर नमस्कार! राजस्थान क्रिकेट संघ (आरसीए) की एडहॉक कमेटी में जो ‘विस्तार’ हुआ है, उसे देखकर लगता है कि कहीं यह मंत्रिमंडल विस्तार की रिहर्सल तो नहीं? क्योंकि जिस तरह से 'अनाधिकारिक मंत्रियों' की संख्या बढ़ी है, क्रिकेट का मैदान अब सियासी पिच बनता दिख रहा है, और खिलाड़ी कौन? बड़े-बड़े नेताओं के बेटे-पोते! आइए, इस 'परिवार कल्याण योजना' पर एक नज़र डालते हैं, जहां बैट-बॉल नहीं, बल्कि 'बैकग्राउंड' का बोलबाला है।
क्रिकेट का मैदान बना सियासी लॉन्चपैड: 'अडजस्टमेंट' की अद्भुत कहानी
पिछले दिनों आरसीए की एडहॉक कमेटी से कन्वीनर डीडी कुमावत और सदस्य पिंकेश पोरवाल ने विदा ली, जैसे कोई ओपनिंग बल्लेबाज बिना खाता खोले ही पवेलियन लौट गया हो। लेकिन मैदान खाली नहीं रहा! तुरंत ही दो नए धुरंधर पिच पर उतरे और अब राजस्थान क्रिकेट की कमान पूरी तरह से भाजपा के 'नेता पुत्रों' के हाथ में आ गई है। ऐसी सुगबुगाहट है कि मंत्रिमंडल विस्तार न होने के कारण, इन 'टैलेंटेड' युवाओं को आरसीए में 'एडजस्ट' किया जा रहा है, ताकि क्रिकेट के बहाने इनकी सियासी पिच तैयार की जा सके। यह रणनीति ऐसी है कि 'एक पंथ, दो काज' – क्रिकेट भी बचा रहेगा (कम से कम कागजों पर) और भावी नेताओं का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।
रविवार को जारी नई लिस्ट में, पुराने तीन सदस्य तो जमे ही हुए थे – चिकित्सा मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर के पुत्र धनंजय सिंह खींवसर, सांसद घनश्याम तिवारी के पुत्र आशीष तिवाड़ी और विधायक जसवंत यादव के पुत्र मोहित यादव (जो अब कन्वीनर भी हैं)। अब इसमें नया नाम जुड़ा है हनुमानगढ़ के भादरा से विधायक संजीव बेनीवाल के पुत्र अर्जुन बेनीवाल का, जो कुछ समय पहले ही हनुमानगढ़ जिला क्रिकेट संघ के सचिव बने थे। यानी, जूनियर स्तर पर भी 'वंशवादी क्रिकेट' की ट्रेनिंग ज़ोरों पर थी। कमेटी में एक और सदस्य हैं अरिष्ठ सिंघवी, जिनके दादा चंद्रराज सिंघवी पूर्व में मंत्री रह चुके हैं। गनीमत है, अरिष्ठ अकेले ऐसे हैं जो रणजी और आईपीएल खेल चुके क्रिकेटर भी हैं। जोधपुर जिला क्रिकेट संघ से आरसीए एडहॉक कमेटी में 2-2 सदस्य हैं – अध्यक्ष धनंजय और सचिव अरिष्ठ दोनों ही जगह बनाने में सफल रहे। यह तो 'ऑल इन द फैमिली' का अद्भुत नज़ारा है!
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कहते हैं, एडहॉक कमेटी चुनाव कराने के लिए बनती है, पर आरसीए की एडहॉक कमेटी को पिछले दो साल में 9वीं बार एक्सटेंशन मिला है। शायद चुनाव की तारीखें शुभ मुहूर्त में नहीं आ रहीं, या फिर नेता पुत्रों को क्रिकेट की बारीकियां सीखने में थोड़ा और समय लग रहा है? इन सबके बीच, मंत्री खींवसर के पुत्र धनंजय सिंह खींवसर तो कमेटी के 'परमानेंट फिक्सचर' हैं। 9वीं बार आए हैं! इनके तो विवाद भी 'स्थायी' सदस्य रहे हैं – जयदीप बिहाणी और डीडी कुमावत से विवाद, नागौर और जोधपुर दोनों जगह से अध्यक्ष होने के आरोप, कोर्ट-कचहरी... पर 'घर के बड़े बेटे' की तरह, चाहे कुछ भी हो, इनकी जगह हमेशा पक्की रहती है।
'नेता पुत्र' होने का आरोप? अरे नहीं, ये तो क्रिकेट से 'लंबे समय से जुड़े' हैं!
कन्वीनर मोहित यादव ने बड़ी ही संजीदगी से कहा, “मुझे ये जिम्मेदारी नेता का बेटा होने के कारण नहीं मिली है। मैं क्रिकेट से लंबे समय से जुड़ा हूं।” यह सुनकर तो कई सारे 'आम' क्रिकेट प्रेमियों की आंखें नम हो गईं होंगी, जिन्होंने जीवन भर बैट को सिर्फ बल्ला ही समझा होगा, और कभी उसे 'सत्ता की सीढ़ी' के तौर पर देखा ही नहीं। मतलब, अगर 'नेता पुत्र' होना सिर्फ एक संयोग है, तो आरसीए में यह संयोग 'पांच में से चार' बार क्यों हो रहा है? क्या ये सारे 'संयोग' एक ही नक्षत्र में जन्मे हैं? यह तो ऐसा ही है जैसे कोई कहें कि मुझे लॉटरी इसलिए नहीं लगी क्योंकि मैं टिकट खरीदा था, बल्कि इसलिए क्योंकि मैं लकी हूं!
यह घटना सिर्फ राजस्थान क्रिकेट की नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के एक बड़े 'ट्रेंड' की झलक है। जब मुख्यधारा की राजनीति में सीधे टिकट मिलना या मंत्री पद पर बैठना मुश्किल हो जाए, तो 'खेल', 'शैक्षणिक' संस्थाएं और अन्य बोर्ड 'पुत्र मोह' की प्रयोगशाला बन जाती हैं। इससे संकेत मिलता है कि अब नेताओं के बच्चों को राजनीति में आने से पहले स्पोर्ट्स एडमिनिस्ट्रेशन में इंटर्नशिप करनी पड़ेगी, ताकि भविष्य में वे 'पारी संभाल सकें'। इससे खेल का क्या होगा? शायद 'खेल' भी राजनीति की तरह 'वंशवादी' हो जाएगा, जहां 'मेरिट' की जगह 'मैरिटाइम रूट' से एंट्री होगी। अब 'क्रिकेटर' बनने के लिए 'बैट' नहीं, 'बैकग्राउंड' देखना पड़ेगा।
तो जनाब, तैयार हो जाइए भविष्य के लिए! जहां स्टेडियम में 'रोहित-विराट' की जगह 'नेता पुत्र' के नाम के नारे लगेंगे। कौन जाने, अगली बार IPL की बोली या BCCI की कोई बड़ी डील में ये ही हमारे 'युवा ब्रिगेड' नेतृत्व करते मिलें, देश के लिए झंडे गाड़ते नहीं, तो कम से कम अपने 'वंश' के लिए। उम्मीद है कि 'आरसीए का पहले जैसा रुतबा वापस लाने' के चक्कर में, बेचारा क्रिकेट ही अपनी रुतबा न खो दे। फिलहाल तो यही लगता है कि राजस्थान क्रिकेट में 'ऑल इन द फैमिली' का नया अध्याय लिखा जा रहा है, और हम दर्शक दीर्घा से तालियां बजाने के लिए मजबूर हैं।
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.