नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) की डिग्री के खुलासे की मांग से जुड़ी याचिका पर दिल्ली विश्वविद्यालय (Delhi University - DU) को दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। यह मामला याचिका देरी से दाखिल करने से जुड़ा है, जिस पर विश्वविद्यालय को अपनी आपत्ति दर्ज करानी है। चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय (Chief Justice D.K. Upadhyay) की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई के लिए 20 अगस्त की तारीख तय की है। यह घटनाक्रम सार्वजनिक जवाबदेही (public accountability) और सूचना के अधिकार (Right to Information - RTI) के दायरे पर चल रही बहस को और गहरा करता है।
पीएम की डिग्री: दिल्ली HC ने DU को जवाब दाखिल करने के लिए दिया समय
हालिया सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कोर्ट से आग्रह किया कि याचिका दाखिल करने में हुई देरी को माफ किया जाए। उन्होंने यह भी बताया कि पिछली सुनवाई में भी दिल्ली विश्वविद्यालय को जवाब दाखिल करने के लिए तीन हफ्ते का अतिरिक्त समय दिया गया था। तब विश्वविद्यालय ने खुद कहा था कि वह इस पर दो हफ्ते में आपत्ति दाखिल कर देगा, जिसके बाद ही कोर्ट कोई फैसला ले। यह कानूनी प्रक्रिया एक बार फिर दिखाती है कि कैसे सूचना के अधिकार से जुड़े मामले अदालती दांव-पेच में उलझ जाते हैं।
दिल्ली विश्वविद्यालय ने पहले भी इस याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री की डिग्री का खुलासा करने वाली याचिका केवल 'सनसनी पैदा करने' के लिए दायर की गई है और यह सुनवाई योग्य नहीं है। विश्वविद्यालय की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta) ने दलील दी थी कि याचिका दाखिल करने में हुई देरी और याचिका के गुणों पर विश्वविद्यालय जवाब दाखिल करना चाहता है, जिसके लिए उन्हें और समय चाहिए।
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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी दांव-पेच
यह मामला कई वर्षों से कानूनी अखाड़े में है। 12 नवंबर 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया था कि सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाएं तय समय सीमा के बाद दाखिल की गई हैं। कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय को निर्देश दिया था कि वह देर से याचिकाएं दाखिल करने पर अपनी आपत्ति दाखिल करें। इस याचिका को दायर करने वालों में आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party - AAP) के सांसद संजय सिंह (Sanjay Singh), आरटीआई कार्यकर्ता नीरज शर्मा (Neeraj Sharma) और वकील मोहम्मद इरशाद (Mohammad Irshad) शामिल हैं। इन याचिकाकर्ताओं ने एकल पीठ (single bench) के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसने केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission - CIC) के फैसले को रद्द कर दिया था।
जस्टिस सचिन दत्ता (Justice Sachin Datta) की बेंच ने 25 सितंबर 2025 को केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश के खिलाफ दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए सीआईसी के आदेश को निरस्त कर दिया था। एकल पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान, दिल्ली विश्वविद्यालय ने कहा था कि वह कोर्ट को डिग्री दिखा सकती है, लेकिन किसी 'अजनबी' को नहीं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उस समय कहा था कि दिल्ली विश्वविद्यालय के पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है और विश्वविद्यालय हर साल का रजिस्टर (register) मेंटेन करता है। उन्होंने तर्क दिया था कि एक ऐसे छात्र की डिग्री मांगी जा रही है जो आज देश का प्रधानमंत्री है, और यह एक निजी जानकारी (private information) है।
सूचना के अधिकार और निजता के बीच संतुलन
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सूचना के अधिकार कानून (RTI Act) के तहत किसी छात्र की डिग्री देना निजी कार्य नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक कार्य (public function) है। उन्होंने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय एक सार्वजनिक प्राधिकार (public authority) है, और ऐसे में सूचना मांगने वाले की नीयत के आधार पर किसी की डिग्री की सूचना देने से इनकार नहीं किया जा सकता। विश्वविद्यालय ने इसे निजी जानकारी बताते हुए साझा करने से इनकार कर दिया था, उनका मानना था कि इससे कोई सार्वजनिक हित (public interest) पूरा नहीं होता। इसके बाद नीरज शर्मा ने केंद्रीय सूचना आयोग का रुख किया था, जिसने दिल्ली विश्वविद्यालय के सूचना अधिकारी (Public Information Officer - PIO) मीनाक्षी सहाय (Meenakshi Sahay) पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया और डिग्री से संबंधित जानकारी देने का आदेश दिया था। दिल्ली विश्वविद्यालय ने इसी सीआईसी फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
यह मामला सूचना के अधिकार और व्यक्तिगत निजता के अधिकार के बीच एक महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाई को दर्शाता है। दिल्ली हाईकोर्ट का आगामी फैसला न केवल प्रधानमंत्री की डिग्री से जुड़े विवाद को प्रभावित करेगा, बल्कि सार्वजनिक हस्तियों की निजी जानकारी के खुलासे और आरटीआई कानून के दायरे को लेकर भविष्य के मामलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम कर सकता है। 20 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी, जब दिल्ली विश्वविद्यालय को याचिका में देरी पर अपनी आपत्ति दाखिल करनी होगी।
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.