डिजिटल इंडिया के बढ़ते कदमों के बीच भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की एक नई रिसर्च रिपोर्ट ने देश के वित्तीय व्यवहार को लेकर चौंकाने वाले और महत्वपूर्ण तथ्य पेश किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था में देश में कैश और डिजिटल भुगतान (Cash and Digital Payments) दोनों ही अपनी विशिष्ट भूमिका निभा रहे हैं और एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी होने के बजाय एक-दूसरे के पूरक (Complementary) साबित हो रहे हैं। यह खबर आम नागरिक के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि कैसे बदलती वैश्विक परिस्थितियों और घरेलू जरूरतों के बीच भारत अपनी भुगतान प्रणाली को संतुलित कर रहा है।
SBI रिपोर्ट: संकट के समय नकदी की ओर क्यों बढ़ रहा है झुकाव?
एसबीआई रिसर्च (SBI Research) के अध्ययन के मुताबिक, यूपीआई (UPI) जैसे डिजिटल माध्यमों ने छोटे और रोजमर्रा के रिटेल ट्रांजैक्शन (Retail Transactions) को बेहद आसान बना दिया है। हालांकि, जब बात आपातकालीन स्थितियों, भविष्य की बचत या अनौपचारिक लेनदेन की आती है, तो आज भी भारतीय नागरिकों का भरोसा नकदी (Cash) पर बना हुआ है। रिपोर्ट में एक दिलचस्प पैटर्न देखा गया है—जैसे-जैसे वैश्विक तनाव और युद्ध जैसी स्थितियां (Global Tensions) बढ़ रही हैं, लोगों में एहतियातन अपने पास अधिक नकदी रखने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
आंकड़ों के जरिए इसे समझें तो प्रति व्यक्ति चलन में नकदी (Currency in Circulation - CIC) और एटीएम से निकाली गई नकदी के बीच का अंतर वित्त वर्ष 2024 में 1,804 रुपये था, जो वित्त वर्ष 2026 तक बढ़कर 9,127 रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। महज दो वर्षों में यह पांच गुना बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि लोग बैंक खातों के बजाय हाथ में कैश रखना अधिक सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इसी तरह का व्यवहार रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia-Ukraine War) के दौरान भी दुनिया भर में देखा गया था।
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ई-रुपया और प्रति व्यक्ति आय का विश्लेषण
भारत ने अपनी डिजिटल मुद्रा, यानी सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) या ई-रुपया लॉन्च तो कर दिया है, लेकिन रिपोर्ट मानती है कि इसका प्रसार अभी बहुत सीमित है। मार्च 2025 तक ई-रुपये का कुल प्रचलन केवल 1,016 करोड़ रुपये रहा। एसबीआई रिसर्च का सुझाव है कि ई-रुपये को लोकप्रिय बनाने के लिए फिनटेक (Fintech) प्लेटफॉर्म्स के साथ रणनीतिक साझेदारी और लोगों में जागरूकता बढ़ाने की सख्त जरूरत है।
आर्थिक प्रगति के साथ नकदी के उपयोग का संबंध भी काफी गहरा है। वित्त वर्ष 2012 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 71,609 रुपये थी, जो वित्त वर्ष 2026 तक 2,51,393 रुपये होने की संभावना है। इस दौरान प्रति व्यक्ति नकदी का चलन भी 8,762 रुपये से बढ़कर 29,324 रुपये पहुंच गया है। दिलचस्प बात यह है कि जीडीपी और नकदी की वृद्धि दर (CAGR) के बीच का मामूली अंतर काफी हद तक यूपीआई लेनदेन (UPI Transactions) की वृद्धि के बराबर है, जो प्रति व्यक्ति 1,301 रुपये के स्तर पर है।
500 रुपये के नोटों का बढ़ता दबदबा और आरबीआई के निर्देश
भारतीय मुद्रा बाजार में मूल्य के हिसाब से 500 रुपये के नोटों का प्रभुत्व लगातार बढ़ रहा है। मार्च 2025 तक कुल चलन में नकदी के मूल्य का 86 प्रतिशत हिस्सा केवल 500 रुपये के नोटों का था। इस असंतुलन को कम करने और छोटे नोटों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों और एटीएम ऑपरेटरों को सख्त निर्देश दिए हैं। अब बैंकों को एटीएम में नियमित रूप से 100 और 200 रुपये के नोट उपलब्ध कराने होंगे। रिपोर्ट के अनुसार, 100 रुपये के नोटों की हिस्सेदारी में मामूली सुधार हुआ है, जो 6.2% से बढ़कर 8.2% हो गई है।
निष्कर्ष और भविष्य की राह
एसबीआई की यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत एक 'हाइब्रिड' अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। जहां डिजिटल भुगतान सुविधा और गति प्रदान करता है, वहीं नकदी सुरक्षा और गोपनीयता का अहसास कराती है। आने वाले समय में नीति निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि डिजिटल बुनियादी ढांचा (Infrastructure) मजबूत हो, लेकिन साथ ही नकदी की तरलता (Liquidity) में भी कोई कमी न आए। अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए इन दोनों स्तंभों का समानांतर चलना अनिवार्य है।
लघु अवधि में नकदी के प्रति बढ़ते मोह को वैश्विक अनिश्चितता का परिणाम माना जा सकता है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से डिजिटल साक्षरता और ई-रुपये जैसे नवाचार ही भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य की दिशा तय करेंगे। फिलहाल, बैंकिंग सेक्टर और आम जनता के लिए संदेश साफ है—जेब में कैश और फोन में डिजिटल वॉलेट, दोनों का होना आज की जरूरत है।