विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) के क्षेत्रों में महिलाओं की असीम क्षमता को देखते हुए, वैश्विक स्तर पर उनके योगदान को सम्मानित करने और बाधाओं को दूर करने के लिए लगातार पहल की जा रही हैं। इसका उद्देश्य एक अधिक समावेशी और विविध वैज्ञानिक समुदाय का निर्माण करना है, जो सभी प्रतिभाओं का लाभ उठा सके। हालांकि, वास्तविकता यह है कि उच्च शिक्षा में महिलाओं की STEM में भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी चिंताजनक रूप से कम है। विशेष रूप से भारत में यह खाई और गहरी है, जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसे उभरते क्षेत्रों में पुरुषों का दबदबा स्पष्ट दिखाई देता है। यह स्थिति न केवल लैंगिक समानता के लिए बल्कि वैश्विक चुनौतियों से निपटने की हमारी सामूहिक क्षमता के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है।
STEM में महिलाओं की वैश्विक स्थिति और भारतीय परिदृश्य
वैश्विक स्तर पर विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (Science, Technology, Engineering, Mathematics) क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी लगभग 33.3 से 35 प्रतिशत है। उन्हें अक्सर वित्तीय साधनों की कमी, प्रकाशन के अवसरों का अभाव और विश्वविद्यालयों में शीर्ष पदों पर कम उपस्थिति जैसी जटिल चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यूएस नेशनल साइंस फाउंडेशन (US National Science Foundation) ने वर्ष 2001 में STEM की अवधारणा प्रस्तुत की थी, जिसका उद्देश्य ज्ञान और कौशल को एकीकृत करने वाले करियर को बढ़ावा देना था। भारत उन देशों में से एक है जहां बड़ी संख्या में वैज्ञानिक और इंजीनियर हैं, और पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में तेजी आई है।
हालांकि, भारत में स्थिति कुछ अलग है। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय शिक्षा प्रणाली में लगभग 43 प्रतिशत महिलाएं नामांकित हैं, जो वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। लेकिन, जब नौकरी के क्षेत्र की बात आती है, तो उनकी भागीदारी नाटकीय रूप से घटकर केवल 14 प्रतिशत रह जाती है। इसके पीछे गणित में आत्मविश्वास की कमी और पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण जैसी प्रमुख बाधाएं मानी जाती हैं। इस खाई को पाटने के लिए, भारत सरकार ने विज्ञान ज्योति योजना (Vigyan Jyoti Yojana), GATI योजना और किरण योजना (KIRAN Yojana) जैसी कई पहलें की हैं, जिनका उद्देश्य STEM क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है।
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डिजिटल और AI सेक्टर में लैंगिक असमानता
नई डिजिटल तकनीक (Digital Technology) के विकास के इस दौर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence - AI) समेत कई क्षेत्रों में पुरुषों का दबदबा स्पष्ट है। डेटा (Data) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े कार्यों में महिलाएं केवल 26 प्रतिशत हैं, जबकि क्लाउड कंप्यूटिंग (Cloud Computing) में उनकी भागीदारी महज 12 प्रतिशत है। यह असमानता पूर्वाग्रह से ग्रस्त एल्गोरिद्म (Biased Algorithms) और तकनीक में निहित असमानताओं के कारण डिजिटल जगत में पुरुष वर्चस्व को बढ़ावा देने का जोखिम पैदा करती है। सीमित शोध संसाधन, सामाजिक रूढ़ियां और कार्यस्थलों पर भेदभाव (Workplace Discrimination) आज भी महिलाओं को इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों से दूर रख रहे हैं।
महिलाओं को विज्ञान और तकनीक से जितना दूर रखा जाएगा, जलवायु परिवर्तन (Climate Change), सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public Health) और खाद्य सुरक्षा (Food Security) जैसी तात्कालिक वैश्विक चुनौतियों से निपटने की हमारी सामूहिक शक्ति उतनी ही सीमित होती जाएगी। किर्गिस्तान (Kyrgyzstan) की रसायन वैज्ञानिक असेल् सार्तबाएवा (Asel Sartbaeva) इसका एक प्रेरणादायक उदाहरण हैं, जो ब्रिटेन में रसायन विज्ञान की सहायक प्रोफेसर होने के साथ-साथ जैव-प्रौद्योगिकी कंपनी (Biotechnology Company) की सह-संस्थापक भी हैं। उनका शोध वैश्विक स्वास्थ्य की एक अहम समस्या, टीकों को ऊंचे तापमान पर सुरक्षित रखने पर केंद्रित है। उनका मानना है कि विज्ञान में महिलाओं के लिए हालात पहले से बेहतर हुए हैं, लेकिन अभी भी और अधिक प्रतिभाओं की आवश्यकता है।
आगे की राह: समावेशी विकास और समान अवसर
बढ़ती असमानताओं के इस दौर में, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सामाजिक विज्ञान, विज्ञान-प्रौद्योगिकी और वित्तीय क्षेत्र को एक साथ जोड़कर समावेशी और सतत विकास (Inclusive and Sustainable Development) में तेजी लाई जा सकती है। इन क्षेत्रों में सहयोग से डिजिटल कौशल में लैंगिक अंतर (Gender Gap in Digital Skills) को कम किया जा सकता है, महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यमों (Women-led Enterprises) को प्रोत्साहन मिल सकता है और AI संबंधी नीतियों को अधिक संवेदनशील बनाया जा सकता है। दुनिया को अगले दशक में सृजित होने वाली 80 प्रतिशत नौकरियों के लिए किसी न किसी रूप में गणित और विज्ञान कौशल (Math and Science Skills) की आवश्यकता होगी।
यह महत्वपूर्ण है कि लड़कियों को शुरुआत से ही विज्ञान के क्षेत्र में पढ़ाई-लिखाई के लिए प्रोत्साहित किया जाए। अक्सर परिवार, विशेषकर पिता, लड़कियों के भविष्य से जुड़े निर्णयों को प्रभावित करते हैं, जहां यह धारणा बनी हुई है कि विज्ञान चुनने से वे परिवार नहीं बना पाएंगी। यह धारणा गलत है; लड़कियां करियर और परिवार दोनों को साथ लेकर चल सकती हैं। समान अवसर प्रदान करने के लिए छात्रवृत्तियां (Scholarships) बढ़ाने, प्रशिक्षण (Training) के दरवाजे खोलने और सुरक्षित कार्यस्थल (Safe Workplace) तैयार करने की आवश्यकता है। हमारा भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम कितनी प्रतिभाओं को अवसर दे पाते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि महिलाएं अपने अधिकारों और सबकी भलाई के लिए वैज्ञानिक सपने साकार कर सकें।
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.