बचपन का मोटापा: चीन के बाद भारत में सबसे ज्यादा बच्चे शिकार, क्या सिर्फ लाइफस्टाइल है जिम्मेदार?

भारत में बचपन का मोटापा एक गंभीर स्वास्थ्य संकट, बच्चे स्क्रीन देखते हुए और जंक फूड खाते हुए

हाल ही में जारी हुई एक नई रिपोर्ट ने भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य भविष्य पर गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं। विश्व मोटापा महासंघ (World Obesity Federation) द्वारा प्रकाशित वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस 2026 (World Obesity Atlas 2026) के आंकड़ों के अनुसार, बचपन का मोटापा और अधिक वजन से ग्रस्त बच्चों की कुल संख्या के मामले में भारत, चीन के बाद अब वैश्विक स्तर पर दूसरे स्थान पर आ गया है। यह आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है, जहाँ भारत में बच्चों में मोटापे के मामलों में औसतन हर साल लगभग 5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की जा रही है, जो वैश्विक स्तर पर सबसे तेज वृद्धि है। यह स्थिति न सिर्फ बच्चों के वर्तमान स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है, बल्कि उनके भविष्य पर भी गहरा असर डाल रही है, जिससे यह समझना आवश्यक हो जाता है कि क्या इस समस्या के लिए केवल जीवनशैली ही जिम्मेदार है?

भारत में बचपन का मोटापा: एक गहराता संकट

विश्व मोटापा दिवस (4 मार्च) के अवसर पर जारी की गई इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने बच्चों में अधिक वजन और मोटापे की संख्या के मामले में अमेरिका और कई पश्चिमी देशों को भी पीछे छोड़ दिया है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि 2025 तक भारत में लगभग 4.1 करोड़ बच्चों का बॉडी मास इंडेक्स (BMI) अधिक होगा, जबकि लगभग 1.4 करोड़ बच्चे मोटापे से पीड़ित होंगे। ये आंकड़े भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी हैं।

रिपोर्ट के विस्तृत विश्लेषण से पता चलता है कि भारत में साल 2025 में 5 से 9 साल की उम्र के लगभग 1.49 करोड़ बच्चे अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त थे। वहीं, 10 से 19 साल की उम्र के 2.6 करोड़ से अधिक बच्चे ओवरवेट या मोटापे की समस्या से जूझ रहे थे। वैश्विक स्तर पर, 5 से 19 साल की उम्र के हर 5 में से एक बच्चा (लगभग 20.7%) अधिक वजन या मोटापे से प्रभावित है, जो 2010 के मुकाबले 14.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। यह दर्शाता है कि यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि एक वैश्विक महामारी का रूप ले रही है, जिसमें भारत सबसे तेजी से आगे बढ़ रहा है।

क्या सिर्फ जीवनशैली है जिम्मेदार? कारण और समाधान

बच्चों में बढ़ते मोटापे के पीछे कई जटिल कारण हैं, जिनमें जीवनशैली एक महत्वपूर्ण कारक है लेकिन एकमात्र नहीं। नींद की कमी शरीर में भूख को नियंत्रित करने वाले हार्मोन को असंतुलित कर देती है, जिससे बच्चे अधिक खाने लगते हैं। वहीं, परीक्षाओं और पढ़ाई का बढ़ता बोझ बच्चों को "इमोशनल ईटिंग" की ओर धकेलता है, जहाँ भोजन तनाव से निपटने का एक भावनात्मक सहारा बन जाता है। इसके अतिरिक्त, कुछ मामलों में हाइपोथायरायडिज्म या इंसुलिन प्रतिरोध जैसी चिकित्सकीय स्थितियां भी मोटापे का कारण बन सकती हैं, जिनका समाधान केवल खानपान बदलने से नहीं होता, बल्कि डॉक्टर की देखरेख में इलाज की आवश्यकता होती है।

एक्सपर्ट्स के अनुसार, एक और बड़ा लेकिन कम चर्चित कारण मां का स्वास्थ्य है। शोध बताते हैं कि जिन माताओं का BMI गर्भावस्था के दौरान अधिक होता है या जो टाइप 2 मधुमेह से पीड़ित होती हैं, उनके बच्चों में बचपन में ही मोटापे का खतरा काफी बढ़ जाता है। वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस के अनुसार, भारत में 15 से 49 वर्ष की लगभग 13.4 प्रतिशत महिलाएं अधिक BMI से और 4.2 प्रतिशत टाइप 2 मधुमेह से पीड़ित हैं। यह दर्शाता है कि बच्चे का वजन कभी-कभी जन्म से पहले ही तय होने लगता है। इसके अलावा, शारीरिक गतिविधि की कमी भी एक प्रमुख कारक है; भारत में 74 प्रतिशत किशोर (11 से 17 साल के बच्चे) WHO द्वारा अनुशंसित शारीरिक गतिविधि के स्तर को पूरा नहीं करते हैं। स्कूलों में खेल के मैदानों का सिकुड़ना और पढ़ाई का बढ़ता दबाव भी इस समस्या को और गंभीर बना रहा है।

इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें परिवार, स्कूल और सरकार सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। डॉ. राहुल चावला जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि परिवारों को घर का ताजा और पोषण से भरपूर खाना तथा बाहर खेलने की आदत को प्राथमिकता देनी होगी। स्कूलों को बेहतर खानपान नीतियां लागू करनी होंगी और बच्चों के लिए खुले खेल के मैदान उपलब्ध कराने होंगे। सरकार को बच्चों को लक्षित करने वाले जंक फूड विज्ञापनों पर रोक लगानी होगी और पैकेजिंग पर स्पष्ट व समझने योग्य पोषण लेबलिंग सुनिश्चित करनी होगी।

बच्चों में बढ़ता मोटापा भारत के लिए एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। यह केवल जीवनशैली का मामला नहीं है, बल्कि इसमें जैविक, सामाजिक और पर्यावरणीय कारक भी शामिल हैं। इस संकट से निपटने के लिए एक समन्वित और व्यापक रणनीति की आवश्यकता है जो सभी हितधारकों को शामिल करे। समय रहते ठोस कदम उठाने से ही हम अपने बच्चों के स्वास्थ्य और देश के भविष्य को सुरक्षित कर पाएंगे।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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