नई दिल्ली: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में राज्यसभा में भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) की धीमी प्रगति, खासकर BSNL को 4G सेवाएं लाने में हुई देरी को लेकर एक विस्तृत और तथ्यात्मक बयान दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि कंपनी की मौजूदा कमजोर स्थिति रातोंरात नहीं बनी, बल्कि दशकों की नीतिगत खामियों और गलत फैसलों का नतीजा है। वित्त मंत्री ने बताया कि कैसे पिछली सरकारों की नीतियों ने इस सरकारी दूरसंचार कंपनी की कमर तोड़ी और इसे निजी प्रतिद्वंद्वियों से काफी पीछे धकेल दिया। यह खुलासा देश के दूरसंचार क्षेत्र और सरकारी उपक्रमों के भविष्य को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है।
BSNL को कमजोर करने वाले फैसले और 4G में देरी
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बयान में यूपीए सरकार पर बीएसएनएल का समर्थन न करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जब देश में 4जी तकनीक काफी पहले आ चुकी थी, तब बीएसएनएल को इसके लिए आवश्यक धन उपलब्ध नहीं कराया गया। सीतारमण के अनुसार, करीब पांच साल पहले ही बीएसएनएल को 4जी तकनीक विकसित करने के लिए फंड दिया गया, जिसके बाद कंपनी ने अपनी स्वदेशी तकनीक तैयार की और अब उसी का उपयोग कर रही है। यह देरी कंपनी के बाजार हिस्सेदारी और राजस्व पर भारी पड़ी।
लाइसेंस फीस और स्पेक्ट्रम का भारी बोझ
सीतारमण ने आंकड़ों के साथ बताया कि बीएसएनएल ने लाइसेंस फीस और स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क के रूप में कुल 37,513 करोड़ रुपये का भुगतान किया, लेकिन उसे 2005-06 तक केवल 9,249 करोड़ रुपये ही वापस मिले। इसके बाद यह प्रतिपूर्ति बंद कर दी गई। 2010 में 3जी और बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम के लिए भी बीएसएनएल और एमटीएनएल से अत्यधिक ऊंची कीमत वसूली गई। एमटीएनएल को 11,098 करोड़ रुपये और बीएसएनएल को 18,499 करोड़ रुपये चुकाने पड़े, जिससे उनकी नकदी लगभग खत्म हो गई और कंपनी पर भारी वित्तीय दबाव आ गया।
कमजोर स्पेक्ट्रम और नेटवर्क विस्तार में बाधाएं
वित्त मंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि उस समय बीएसएनएल और एमटीएनएल को 2.5 से 2.6 गीगाहर्ट्ज का स्पेक्ट्रम दिया गया, जबकि निजी कंपनियों को अधिक उपयोगी 2.3 से 2.4 गीगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम मिला। उन्होंने सवाल उठाया कि बेहतर विकल्प उपलब्ध होने पर भी सरकारी कंपनियों को कमजोर विकल्प क्यों दिया गया। नेटवर्क विस्तार के मोर्चे पर भी बीएसएनएल को चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 2006 में 4.55 करोड़ जीएसएम लाइनों के लिए टेंडर जारी किया गया था, जिसे बाद में घटाकर 1.45 करोड़ कर दिया गया। 2008 में 9.3 करोड़ लाइनों का एक बड़ा टेंडर निकाला गया, लेकिन 2010 में उसे रद्द कर दिया गया। इन फैसलों ने बीएसएनएल के विस्तार और बाजार में उसकी प्रतिस्पर्धात्मकता को सीधे तौर पर प्रभावित किया।
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बाजार हिस्सेदारी में गिरावट और कर्मचारी मुद्दों का प्रभाव
इन नीतियों के परिणामस्वरूप, बीएसएनएल की बाजार हिस्सेदारी में भारी गिरावट दर्ज की गई। 2005 में कंपनी की बाजार हिस्सेदारी लगभग 19 प्रतिशत थी, जो 2014 तक घटकर 10.5 प्रतिशत और 2015 तक 7.96 प्रतिशत रह गई। यह लगातार गिरावट कंपनी के लिए एक गंभीर चुनौती बन गई। इसके अलावा, कर्मचारी पुनर्गठन जैसे महत्वपूर्ण फैसले भी लंबे समय तक टाले गए, जिससे कंपनी की कार्यक्षमता प्रभावित हुई। 2014 तक इस पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, जबकि इसके लिए प्रस्ताव मौजूद थे। सरकारी विभागों में बीएसएनएल सेवाओं का उपयोग अनिवार्य न होने से भी कंपनी को स्थिर मांग नहीं मिल पाई।
अब क्या बदला: बीएसएनएल को मजबूत करने के प्रयास
वित्त मंत्री ने बताया कि मौजूदा सरकार ने बीएसएनएल को पुनर्जीवित करने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। कंपनी के लिए कुल 3.22 लाख करोड़ रुपये के रिवाइवल पैकेज को मंजूरी दी गई है। इसमें स्पेक्ट्रम आवंटन, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश, कर्ज से राहत और कंपनी के पुनर्गठन जैसे उपाय शामिल हैं। इसके अलावा, सभी मंत्रालयों और सरकारी विभागों में बीएसएनएल सेवाओं के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए आदेश जारी किए गए हैं। निर्मला सीतारमण ने स्वदेशी 4जी तकनीक के इस्तेमाल को बीएसएनएल की ताकत बताया, न कि कोई पाबंदी। उन्होंने जानकारी दी कि बीएसएनएल ने देशभर में 1 लाख स्वदेशी 4जी साइट्स लगाने का ऑर्डर दिया है, जिनमें से 28 फरवरी तक 97,906 साइट्स पर उपकरण लगाए जा चुके हैं और 96,103 साइट्स पहले ही चालू हो चुकी हैं। भारतनेट परियोजना के तहत गांवों तक ऑप्टिकल फाइबर पहुंचाने का काम भी तेजी से चल रहा है, जिससे बीएसएनएल को भी मजबूती मिल रही है।
बीएसएनएल के संघर्ष और पुनरुत्थान की यह कहानी दर्शाती है कि सरकारी उपक्रमों को मजबूत करने के लिए दीर्घकालिक नीतिगत समर्थन और सही समय पर वित्तीय निवेश कितना महत्वपूर्ण है। जहां पिछली नीतियों ने कंपनी की कमर तोड़ी, वहीं अब किए जा रहे सुधार इसे फिर से खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। स्वदेशी 4जी तकनीक के साथ बीएसएनएल का आगे बढ़ना भारत के आत्मनिर्भरता के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसकी सफलता भविष्य की नीतियों और कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी।
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