ईरान संकट में भारत की बदलती कूटनीति: ट्रंप के शांति संकेत और जयशंकर-रूबियो की सीधी वार्ता

ईरान संकट में भारत की कूटनीति, जयशंकर और रूबियो की बातचीत, पश्चिम एशिया में भारत की भूमिका

जब अमेरिका और इजराइल की सेनाएं ईरान पर लगातार सैन्य धमकियां दे रही थीं और संभावित बमबारी की स्थिति बनी हुई थी, तब नई दिल्ली ने जानबूझकर इस आक्रामक मुहिम से एक सुरक्षित कूटनीतिक दूरी बनाए रखी थी। लेकिन, जैसे ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ ‘शानदार बातचीत’ और संभावित डील का संकेत दिया, भारत ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता बढ़ा दी और अमेरिका के साथ सीधी वार्ता की मेज पर आ गया। यह घटनाक्रम पश्चिम एशिया में बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य और ईरान संकट में भारत की कूटनीति के एक महत्वपूर्ण मोड़ को दर्शाता है, जिसका सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है।

सोमवार शाम को भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के बीच टेलीफोन पर विस्तृत बातचीत हुई। ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ शुरू होने के बाद पश्चिम एशिया के इस गंभीर संकट पर दोनों देशों के शीर्ष राजनयिकों के बीच यह पहली सबसे बड़ी और सीधी बातचीत थी। विदेश मंत्री जयशंकर ने स्वयं इस बातचीत की पुष्टि करते हुए बताया कि चर्चा पश्चिम एशिया के संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं पर केंद्रित रही। दोनों देशों ने संपर्क में बने रहने पर भी सहमति व्यक्त की।

गोलीबारी के बीच भारत ने क्यों बनाई थी अमेरिका से दूरी?

इस कूटनीतिक बदलाव के पीछे भारत की एक सुविचारित रणनीति काम कर रही है। जब अमेरिका ईरान के बिजली संयंत्रों और बुनियादी ढांचों को तबाह करने पर आमादा था, तब भारत ने वाशिंगटन के आक्रामक रुख का खुले तौर पर समर्थन करने से परहेज किया। इसका मुख्य कारण ईरान के साथ भारत के गहरे ऐतिहासिक, आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। भारत ईरान के चाबहार पोर्ट का संचालन कर रहा है, जो मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए भारत का एक महत्वपूर्ण ‘गेटवे’ है। इसके अतिरिक्त, खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं, जिनकी सुरक्षा और हित भारत के लिए सर्वोपरि हैं। यदि भारत युद्ध के चरम पर अमेरिका का खुला समर्थन करता, तो क्षेत्र में उसके अपने राष्ट्रीय हित खतरे में पड़ जाते। नई दिल्ली शुरू से ही कूटनीति और संवाद के जरिए तनाव कम करने का पक्षधर रहा है, न कि सैन्य टकराव का। यही वजह थी कि जब तक युद्ध के बादल घने थे, भारत ने पेंटागन की युद्ध नीतियों से खुद को अलग रखा था।

ट्रंप के ऐलान के बाद भारत की सक्रियता

भू-राजनीति में कोई भी स्थिति स्थायी नहीं होती। जैसे ही अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने 48 घंटे के सैन्य अल्टीमेटम को ठंडे बस्ते में डाला और यह घोषणा की कि ईरान के ‘सबसे सम्मानित’ नेताओं के साथ उनकी ‘प्रोडक्टिव’ चर्चा चल रही है, भारत ने तुरंत स्थिति को भांप लिया। नई दिल्ली समझ गई कि अब मध्य पूर्व में गोलियों की जगह कूटनीति की बिसात बिछने वाली है। ऐसे में भारत का अमेरिका के साथ सीधे संपर्क में आना बेहद जरूरी था, ताकि युद्ध के बाद के किसी भी परिदृश्य या संभावित समझौते में भारत के आर्थिक और ऊर्जा हित सुरक्षित रह सकें। यह भारत की दूरदर्शिता और यथार्थवादी विदेश नीति का परिचायक है।

ऊर्जा सुरक्षा पर सबसे बड़ा फोकस

जयशंकर और रूबियो की इस बातचीत का केंद्र बिंदु ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था रहा, जो वर्तमान में सबसे ज्वलंत मुद्दा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की आशंका और बाल्टिक सागर में रूसी तेल टर्मिनल पर हालिया हमले के कारण वैश्विक तेल बाजार में भारी अनिश्चितता और हाहाकार मचा हुआ है। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और होर्मुज का बंद होना सीधे तौर पर भारत की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर हमला है। इस स्थिति में, अमेरिका के साथ सीधे संवाद के माध्यम से भारत अपने ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा और वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखने के प्रयासों में अपनी भूमिका सुनिश्चित करना चाहता है।

यह घटनाक्रम दर्शाता है कि भारत वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए एक सतर्क और रणनीतिक दृष्टिकोण अपना रहा है। पश्चिम एशिया में स्थिरता बनाए रखना और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना भारत की विदेश नीति के प्रमुख स्तंभ हैं, और जयशंकर-रूबियो वार्ता इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आगामी दिनों में इस क्षेत्र में होने वाले कूटनीतिक घटनाक्रमों पर भारत की पैनी नज़र रहेगी ताकि वह अपनी स्थिति को और मजबूत कर सके।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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