ईरान पर अमेरिकी हमले की असली वजह: न परमाणु बम, न तेल, बल्कि यह 'डिजिटल तिजोरी' थी निशाना

ईरान में बिटकॉइन माइनिंग पर अमेरिकी हमले के पीछे की वजह

अक्सर जब भी ईरान और अमेरिका के बीच तनाव की बात होती है, तो दुनिया का ध्यान परमाणु कार्यक्रमों या तेल के कुओं पर चला जाता है। लेकिन हाल ही में ईरान पर हुए अमेरिकी हमले की असली वजहें कुछ और ही थीं, जिन पर कम ही चर्चा हुई। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की उस गुप्त 'डिजिटल तिजोरी' पर चोट की, जिसके दम पर ईरान लंबे समय से अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहा था। यह हमला सीधे तौर पर ईरान के बड़े पैमाने पर चल रहे बिटकॉइन माइनिंग ऑपरेशंस पर केंद्रित था, जिसने वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था को भी हिला दिया।

दरअसल, 2018 में जब अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए, तो ईरानी अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। ईरान की मुद्रा रियाल की कीमत में 96 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आई। ऐसे में, ईरानी सरकार और उसकी शक्तिशाली सेना रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) ने एक अनूठा रास्ता खोजा। उन्होंने अपने प्रचुर मात्रा में मौजूद सस्ते तेल और गैस का उपयोग बिजली उत्पादन के लिए किया, और उस बिजली से बिटकॉइन की माइनिंग शुरू कर दी। बिटकॉइन एकमात्र ऐसी डिजिटल करेंसी है जिसे किसी बैंक या देश द्वारा रोका नहीं जा सकता, और इंटरनेट के माध्यम से इसका उपयोग दुनिया भर में व्यापार के लिए किया जा सकता है।

ईरान की 'डिजिटल तिजोरी' और अमेरिकी हमला

ईरान की सेना IRGC ने इस काम के लिए बड़े-बड़े गोदाम स्थापित किए, जहां हजारों मशीनें दिन-रात बिटकॉइन बनाने का काम करती थीं। इन माइनिंग सेंटरों के पास अपनी अलग बिजली लाइनें थीं। ईरान में बिजली बेहद सस्ती है, जिससे उन्हें बिटकॉइन माइनिंग में काफी कम खर्च आता था। जहां दुनिया के अन्य देशों में एक बिटकॉइन बनाने में बहुत अधिक लागत आती थी, वहीं ईरानी सेना को एक बिटकॉइन बनाने में सिर्फ 1,000 से 3,000 डॉलर का खर्च आता था। जबकि बाज़ार में एक बिटकॉइन की कीमत लगभग 68,000 डॉलर (करीब 56 लाख रुपये) थी, जिससे उन्हें प्रति बिटकॉइन 65,000 डॉलर का सीधा मुनाफा हो रहा था। फरवरी 2026 में अमेरिका में एक बिटकॉइन माइन करने की औसत लागत लगभग 87,000 डॉलर थी, जो बाज़ार मूल्य से भी अधिक थी, यानी अमेरिका को यह 67 गुना महंगी पड़ रही थी। CNN और Amuseonx की रिपोर्टों के अनुसार, हैरानी की बात यह थी कि जब देश में बिजली की कमी होती थी, तो आम लोगों के घरों की बिजली काट दी जाती थी, लेकिन सेना के इन बिटकॉइन कारखानों में मशीनें कभी नहीं रुकती थीं।

28 फरवरी को अमेरिका और इज़रायल ने संयुक्त रूप से ईरान पर हमला किया। यह हमला केवल इमारतों पर नहीं, बल्कि सीधे ईरान के उन बिजली घरों और इंटरनेट के रास्तों को निशाना बनाया गया, जहां से यह बिटकॉइन का कारोबार चलता था। Bitget की एक रिपोर्ट बताती है कि हमले के तुरंत बाद, ब्लॉकचेन एनालिस्ट्स ने असामान्य वित्तीय गतिविधि का पता लगाया। हमले के कुछ ही मिनटों के भीतर, ईरान के डिजिटल बाज़ारों से पैसा निकालने की रफ़्तार 700 प्रतिशत तक बढ़ गई। नेशनल काउंसिल ऑफ रेसिस्टेंस ऑफ ईरान (ncr-iran.org) की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के सबसे बड़े क्रिप्टो एक्सचेंज Nobitex से 28 फरवरी से 2 मार्च के बीच 10.3 मिलियन डॉलर निकाले गए। Amuseonx की रिपोर्ट बताती है कि 2019 से 2026 तक ईरान ने संभवतः 54,000 से 1,26,000 बिटकॉइन माइन किए थे, जिनकी कुल कीमत 1.35 अरब से 3.15 अरब डॉलर के बीच थी। भले ही ईरान सरकार ने पूरे देश का इंटरनेट बंद कर दिया था, लेकिन साइबर इंटेलिजेंस फर्म RAKIA के शोधकर्ताओं ने ईरान के भीतर 1,100 से अधिक एक्टिव क्रिप्टोकरेंसी नोड्स का पता लगाया, जिससे स्पष्ट होता है कि यह सरकारी या सेना का काम था।

वैश्विक बाजार पर असर और ट्रंप की रणनीति

जब ईरान के बिटकॉइन माइनिंग फार्म्स पर हमला हुआ, तो इसका असर पूरी दुनिया के डिजिटल बाज़ार पर पड़ा। 1 मार्च 2026 को वैश्विक बिटकॉइन माइनिंग की रफ्तार, जिसे हैशरेट (Hashrate) कहा जाता है, अपने उच्चतम स्तर 1,083 EH/s पर थी। लेकिन हमलों के बाद, 16 मार्च तक यह गिरकर 954 EH/s पर आ गई, यानी दुनियाभर में बिटकॉइन बनाने की रफ्तार में 12% की बड़ी गिरावट आई। इसका एक रोचक परिणाम यह हुआ कि जो बिटकॉइन ईरान को मिलने वाले थे, वे अब दुनिया के बाकी देशों के माइनर्स में बंट गए, जिससे अमेरिका के टेक्सास, रूस और कजाकिस्तान के बिटकॉइन बनाने वालों की कमाई घर बैठे बढ़ गई।

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को घुटनों पर लाने के लिए केवल सैन्य हमले का सहारा नहीं लिया, बल्कि तीन अलग-अलग रास्तों से घेराबंदी की: पहला, सैन्य हमला करके उन बिजली घरों को निशाना बनाया गया, जो बिटकॉइन मशीनों को बिजली देते थे। दूसरा, जनवरी 2026 में अमेरिका के खजाना विभाग ने दो बड़े डिजिटल बाज़ारों (क्रिप्टो एक्सचेंज) पर ताला लगा दिया, जहां से ईरान की सेना करोड़ों-अरबों डॉलर का अवैध लेन-देन कर रही थी। तीसरा, कानूनी शिकंजा कसते हुए, CoinGeek की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के न्याय विभाग ने दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाज़ार Binance की भी जांच शुरू कर दी, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या ईरान ने इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल अपनी सेना को पैसा पहुंचाने के लिए किया था।

यह घटना दर्शाती है कि आधुनिक युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों और भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अब वे डिजिटल अर्थव्यवस्था और क्रिप्टोकरेंसी जैसे अदृश्य मोर्चों पर भी लड़े जा रहे हैं। ईरान पर अमेरिकी हमले का यह अप्रत्याशित पहलू वैश्विक राजनीति में डिजिटल करेंसी की बढ़ती भूमिका और प्रतिबंधों से बचने के लिए देशों द्वारा अपनाई जा रही नई रणनीतियों को उजागर करता है। भविष्य में, ऐसी 'डिजिटल तिजोरियां' और उन पर होने वाले हमले अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं, जिससे देशों की आर्थिक सुरक्षा और संप्रभुता के लिए नई चुनौतियां खड़ी होंगी।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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