भारतीय अर्थव्यवस्था पर भीषण गर्मी का असर: अफ्रीका से भी ज़्यादा तप रहा भारत, GDP और रोज़गार पर सीधा खतरा

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नई दिल्ली: भारत में झुलसा देने वाली गर्मी अब सिर्फ मौसम की खबर नहीं रह गई है, बल्कि यह सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था पर गर्मी का असर दिखा रही है। पिछले कुछ हफ्तों से उत्तरी और मध्य भारत के बड़े हिस्सों में तापमान लगातार 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया जा रहा है, और कुछ इलाकों में तो यह 47 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच गया है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्य इस भीषण गर्मी की चपेट में हैं। इस असामान्य ताप लहर ने भारतीय शहरों को वैश्विक गर्मी के चार्ट में सबसे ऊपर पहुंचा दिया है, यहां तक कि पश्चिमी एशियाई और अफ्रीकी क्षेत्रों को भी पीछे छोड़ दिया है, जो पारंपरिक रूप से अत्यधिक गर्मी के लिए जाने जाते हैं। यह पैटर्न जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से जुड़े एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है, जहाँ दक्षिण एशिया में लू (Heatwave) अब ज़्यादा लंबी, पहले शुरू होने वाली और ज़्यादा तीखी होती जा रही हैं।

बढ़ती गर्मी और भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहराता खतरा

तापमान में लगातार बढ़ोतरी भारत की आर्थिक रफ्तार को सीधे तौर पर कैसे धीमा कर सकती है, इस पर जाने-माने प्रोडक्ट ग्रोथ लीडर और क्रिएटर आकाश गुप्ता ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (X) पर एक पोस्ट के जरिए रोशनी डाली है। उनके विश्लेषण में मैकिन्से एंड कंपनी (McKinsey & Company), अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO), अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और द लैंसेट (The Lancet) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के अनुमानों का हवाला दिया गया है, जो बेहद गंभीर आर्थिक जोखिमों की ओर इशारा करते हैं:

अनुमान है कि 2030 तक, हर साल काम के घंटों के नुकसान के कारण भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 2.5% से 4.5% हिस्सा जोखिम में होगा। इसके परिणामस्वरूप, प्रति वर्ष 150-250 अरब डॉलर (Billion Dollars) का आर्थिक नुकसान हो सकता है। आंकड़ों के मुताबिक, गर्मी के संपर्क में आने के कारण असल में 3.4 करोड़ फुल टाइम जॉब (Full Time Jobs) खत्म हो जाएंगी। सिर्फ 2021 में ही, 167 अरब काम के घंटे पहले ही बर्बाद हो चुके हैं, और पिछले दो दशकों में गर्मी से होने वाली मौतों में 55% की बढ़ोतरी हुई है। ये अनुमान इस धारणा को चुनौती देते हैं कि भारत की विकास यात्रा 'सामान्य' उत्पादकता स्थितियों के तहत ही जारी रहेगी, जिसमें जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की उसकी उम्मीद भी शामिल है।

कूलिंग की बढ़ती मांग और बिजली की चुनौती

जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, वैसे-वैसे एयर कंडीशनिंग (Air Conditioning) पर निर्भरता भी बढ़ती जाती है, लेकिन यह अपने साथ एक नया संकट भी लेकर आती है। वर्तमान में, सिर्फ 8% भारतीय घरों में ही एसी हैं। हालांकि, मांग में जबरदस्त बढ़ोतरी होने की उम्मीद है, जिसके तहत 2035 तक 130-150 मिलियन (Million) नई यूनिट्स की जरूरत होगी। 2024 में बिजली की पीक डिमांड (Peak Demand) पहले ही 240 GW (गीगावाट) तक पहुंच चुकी है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले (University of California, Berkeley) के अनुमानों के मुताबिक, सिर्फ रूम एसी की वजह से ही 2035 तक पीक डिमांड में 180 GW की बढ़ोतरी हो सकती है, जो लगभग जर्मनी की कुल स्थापित क्षमता (Total Installed Capacity) के बराबर है। वहीं, सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (Central Electricity Authority) का अनुमान है कि 2028 तक बिजली की 26 GW की कमी हो सकती है।

'कूलिंग ट्रैप' और जलवायु-अनुकूल विकास की अनिवार्यता

भारत का पावर ग्रिड (Power Grid) अभी भी लगभग 70% कोयले पर निर्भर है, जिससे एक खतरनाक फीडबैक लूप (Feedback Loop) बन जाता है: ज़्यादा गर्मी के कारण एसी का ज़्यादा इस्तेमाल होता है, जिससे कोयले से बनी ज़्यादा बिजली की खपत होती है। ज़्यादा कोयले का इस्तेमाल ज़्यादा उत्सर्जन (Emissions) करता है, और बदले में, यह और भी ज़्यादा गर्मी पैदा करता है। इस स्थिति को विश्लेषक 'कूलिंग ट्रैप' (Cooling Trap) कहते हैं, जहाँ गर्मी से राहत पाने का उपाय ही असल समस्या को और भी बदतर बना देता है।

भारत एक अहम मोड़ पर खड़ा है। इसकी आर्थिक महत्वाकांक्षाएं, जिसमें दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना भी शामिल है, अब सीधे तौर पर इस बात से जुड़ी हैं कि यह भीषण गर्मी का सामना कैसे करता है। अब मुख्य चुनौती सिर्फ ढांचागत विस्तार (Infrastructure Expansion) करना नहीं है, बल्कि जलवायु-अनुकूल विकास (Climate-Resilient Development) करना है। इसमें कूलिंग की मांग से भी तेजी से अक्षय ऊर्जा (Renewable Energy) का विस्तार करना, गर्मी कम करने के लिए शहरों को नए सिरे से डिजाइन करना, बाहर काम करने वाले मजदूरों के लिए सुरक्षा उपायों में सुधार करना और ऊर्जा-कुशल कूलिंग टेक्नोलॉजी (Energy-Efficient Cooling Technology) को बड़े पैमाने पर अपनाना शामिल है।

अप्रैल में भारतीय शहरों का तापमान 42 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की तस्वीर सिर्फ एक जलवायु विसंगति (Climate Anomaly) से कहीं ज़्यादा है। जैसा कि आकाश गुप्ता ने कहा, यह सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुमान में रियल टाइम (Real Time) में की जा रही कटौती है, जो भारत के भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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