जलवायु परिवर्तन और कृषि संकट: कैमूर के किसानों की बढ़ी लागत, घटा मुनाफा
बिहार के कैमूर जिले में जलवायु परिवर्तन और कृषि संकट ने किसानों की रीढ़ तोड़ दी है। अनियमित वर्षा, भीषण गर्मी और सूखे की बढ़ती घटनाओं के कारण खेती की लागत में बेतहाशा वृद्धि हुई है, जबकि फसलों का मुनाफा लगातार घट रहा है। यह स्थिति न केवल किसानों की आजीविका पर गहरा असर डाल रही है, बल्कि राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए भी एक गंभीर चुनौती पेश कर रही है। किसानों को अब अपनी उपज बचाने और बेचने के लिए पहले से कहीं अधिक संघर्ष करना पड़ रहा है। कृषि विभाग (Agriculture Department) के आंकड़ों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण प्रमुख फसलों की उपज में आगामी वर्षों में 7-8% की गिरावट आ सकती है, जिससे किसानों की कृषि आय (Agricultural Income) में 15-25% तक की कमी होने का अनुमान है। विभाग का कहना है कि बदलते मौसम के चलते किसानों को अधिक सिंचाई, कीटनाशक और सूखे को सहने वाली प्रजातियों के बीजों (Drought-Resistant Seeds) पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है। अत्यधिक गर्मी और बेमौसम बारिश विशेष रूप से धान और गेहूं जैसी मुख्य फसलों की उत्पादकता (Productivity) को प्रभावित कर रही है, और तापमान में वृद्धि से गेहूं की उपज में भारी कमी की आशंका है।
किसानों की दोगुनी मेहनत और अनिश्चित भविष्य
कैमूर के नावागांव के अग्रणी किसान धीरेन्द्र चौबे, निमी के अरुण सिंह और संजय सिंह जैसे कई किसानों ने बताया कि प्रतिकूल मौसम में खेती के लिए अब पहले से कहीं अधिक परिश्रम करना पड़ रहा है, और मजदूरी का खर्च भी काफी बढ़ गया है। राधेश्याम सिंह ने दो साल पहले हुई बेमौसम बारिश का जिक्र करते हुए बताया कि चांद के किसानों को किस तरह भारी क्षति झेलनी पड़ी थी, जब काटकर रखी धान की फसल खेत में ही पानी में डूब गई थी। जिले के लगभग 80 प्रतिशत किसानों के पास रबी और खरीफ दोनों सीजन में अनाज के भंडारण के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। ठंड में खुले में रखे धान की रखवाली करना बेहद मुश्किल होता है, जबकि गर्मी में गेहूं, चना और मसूर की देखभाल करते समय किसानों को लू और भीषण गर्मी का सामना करना पड़ता है।
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किसानों को अपनी उपज बेचने में भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सत्येन्द्र सिंह, मनोज तिवारी और महेन्द्र सिंह जैसे किसानों के अनुसार, सरकार द्वारा धान क्रय (Paddy Procurement) के लिए 15 नवंबर की तिथि निर्धारित होने के बावजूद, कैमूर में खरीद अक्सर देर से शुरू होती है। इस दौरान किसानों को अपने धान का ढेर खलिहान में रखकर क्रय केंद्र का इंतजार करना पड़ता है। अक्सर धान में नमी या अन्य कमियां बताकर खरीद से इनकार कर दिया जाता है, जिससे किसान मजबूरन शहर के व्यापारियों या बिचौलियों (Middlemen) को कम कीमत पर अपनी उपज बेचते हैं। इस वर्ष सीसी (Cash Credit) की कमी, पैक्स अध्यक्षों (PACS Presidents) द्वारा धान क्रय स्थगित करने और सहकारिता पदाधिकारियों (Cooperative Officials) की हड़ताल ने भी किसानों की परेशानी बढ़ाई।
जलवायु अनुकूल खेती ही एकमात्र समाधान
किसान कामेश्वर कुशवाहा और संतोष सिंह बताते हैं कि पहले बरसात, ठंड और गर्मी के मौसम का एक तय समय होता था, लेकिन अब उसमें अनियमितता आ गई है। इससे बुआई और कटाई के समय फसल को क्षति होती है। अधिक तापमान, सूखा, अत्यधिक बारिश और आंधी-तूफान से फसलों की उपज पर बुरा असर पड़ता है। गर्म तापमान में कीट और फसल रोग तेजी से फैलते हैं, जिससे किसानों की रासायनिक दवाओं (Chemical Pesticides) पर निर्भरता बढ़ जाती है। वहीं, अत्यधिक वर्षा या सूखे की वजह से मिट्टी की उर्वरता (Soil Fertility) भी कम हो रही है, जिससे फसलें कमजोर हो रही हैं।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. अमित कुमार सिंह ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन से खेती और किसानों की आय बुरी तरह प्रभावित हुई है। उन्होंने 'जलवायु अनुकूल खेती' (Climate-Smart Agriculture) को समय की मांग बताया। डॉ. सिंह ने किसानों को एक ही फसल पर निर्भर न रहकर अलग-अलग फसलों की खेती करने, ड्रिप इरिगेशन (Drip Irrigation) और स्प्रिंकलर सिस्टम (Sprinkler System) जैसे आधुनिक सिंचाई तरीकों से पानी बचाने, तथा रासायनिक की जगह जैविक व प्राकृतिक खाद (Organic and Natural Fertilizers) और नीम आधारित कीटनाशकों (Neem-Based Pesticides) का उपयोग करने की सलाह दी। इसके अतिरिक्त, खेत की मेड़ पर फलदार और छायादार पौधे लगाने से सूक्ष्म जलवायु संतुलन (Microclimate Balance) बनता है और मृदा क्षरण (Soil Erosion) रुकता है। ये उपाय किसानों को बदलते मौसम के जोखिमों से निपटने में मदद कर सकते हैं।
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.