बांग्लादेश की बार-बार डिमांड, भारत का इनकार: क्या है शेख हसीना के प्रत्यर्पण का रास्ता?

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भारत और बांग्लादेश के बीच संबंधों में सुधार के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन पड़ोसी देश बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का प्रत्यर्पण अभी भी एक उलझा हुआ मुद्दा बना हुआ है। अगस्त 2024 में अपनी सरकार गिरने के बाद शेख हसीना भारत आ गई थीं, और तब से ढाका लगातार उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है। इस संवेदनशील मामले पर भारत ने स्पष्ट किया है कि बांग्लादेश की ओर से आए अनुरोध पर फिलहाल न्यायिक और कानूनी प्रक्रियाओं (judicial and legal processes) के तहत विचार किया जा रहा है। यह घटनाक्रम न केवल दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों (bilateral relations) के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि दक्षिण एशिया की कूटनीति (South Asian diplomacy) में भी इसका गहरा असर देखा जा सकता है।

78 वर्षीय शेख हसीना को अगस्त 2024 में देश छोड़कर भारत आना पड़ा था, जब बांग्लादेश में उनकी सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर छात्र-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों (student-led protests) ने उग्र रूप ले लिया था। इन आंदोलनों के बाद उनकी सरकार गिर गई थी। हाल ही में, बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने नई दिल्ली की अपनी यात्रा के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बैठक में शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा प्रमुखता से उठाया था।

शेख हसीना का प्रत्यर्पण: बांग्लादेश की लगातार मांग और भारत का रुख

शेख हसीना पर 2024 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ (crimes against humanity) करने का आरोप है। बांग्लादेश की अदालत, इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (International Crimes Tribunal) ने उन्हें और उनके तत्कालीन गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई है। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली पिछली अंतरिम सरकार ने भी भारत से हसीना को प्रत्यर्पित करने का औपचारिक अनुरोध (formal request) किया था।

भारत सरकार ने इस विषय पर एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया को बताया कि यह मामला अभी समीक्षाधीन (under review) है और भारत इस मुद्दे पर सभी संबंधित पक्षों के साथ रचनात्मक तरीके से (constructively) बातचीत जारी रखेगा। भारत ने यह भी दोहराया है कि वह बांग्लादेश की मौजूदा तारीक रहमान सरकार के साथ संबंधों को बेहतर बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध (committed) है।

गौरतलब है कि अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में कुछ तनाव आ गया था। हालांकि, बाद में हालात सामान्य करने की दिशा में प्रयास शुरू हुए, जब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Om Birla) और विदेश सचिव विक्रम मिस्री (Vikram Misri) ने 17 फरवरी को ढाका में तारीक रहमान के प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह (swearing-in ceremony) में हिस्सा लिया। तारीक रहमान ने संसदीय चुनावों (parliamentary elections) में भारी जीत हासिल करने के बाद प्रधानमंत्री का पद संभाला था। इसी बीच, बांग्लादेश संसद में आवामी लीग (Awami League) पर प्रतिबंध को कानूनी आधार देने वाले एक नए कानून पर भी चर्चा चल रही है, जिस पर भारत बारीकी से नजर बनाए हुए है।

शेख हसीना के पास क्या हैं विकल्प?

इस बढ़ते कानूनी दबाव और प्रत्यर्पण की लगातार मांग के बीच, यह सवाल उठ रहा है कि क्या शेख हसीना के पास बांग्लादेश के शिकंजे से बचने का कोई और रास्ता है। अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों (international law experts) के मुताबिक, उनके पास एक विकल्प किसी तीसरे देश में राजनीतिक शरण (political asylum) लेने की कोशिश करना हो सकता है, जहां उन्हें राजनीतिक शरणार्थी (political refugee) का दर्जा मिल सके। हालांकि, यह प्रक्रिया आसान नहीं होती और इसमें संबंधित देश की नीतियां, द्विपक्षीय संबंध (bilateral relations) और अंतरराष्ट्रीय दबाव (international pressure) की अहम भूमिका होती है।

फिलहाल भारत में रह रही शेख हसीना का भविष्य काफी हद तक भारत के कानूनी फैसले और कूटनीतिक संतुलन (diplomatic balance) पर निर्भर करेगा। नई दिल्ली को अपने पड़ोसी के साथ बेहतर संबंधों को बनाए रखते हुए अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानवीय विचारों के बीच एक नाजुक संतुलन साधना होगा। आने वाले समय में यह मामला दक्षिण एशिया की राजनीति और कूटनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है, जिसके क्षेत्रीय स्थिरता (regional stability) पर दूरगामी परिणाम होंगे।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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