S&P रिपोर्ट: महंगा कच्चा तेल भारत की GDP ग्रोथ रेट को 6.3 परसेंट पर नहीं रोक पाएगा

India's Economy Projected to Grow Strongly Despite High Oil Prices

एसएंडपी का बड़ा दावा: कच्चा तेल 130 डॉलर पहुंचने पर भी 6.3% की दर से दौड़ेगी भारतीय अर्थव्यवस्था

वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर आई है। प्रतिष्ठित वैश्विक रेटिंग एजेंसी एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स (S&P Global Ratings) ने दावा किया है कि अगर चालू वित्त वर्ष में कच्चे तेल की कीमतें आसमान भी छूने लगती हैं, तब भी भारत की विकास दर मजबूत बनी रहेगी। एजेंसी के अनुसार, यदि ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की औसत कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच जाती है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था 6.3 फीसदी की सम्मानजनक दर से बढ़ेगी। यह दर्शाता है कि बाहरी झटकों को झेलने में भारत की आर्थिक बुनियाद कितनी सक्षम है।

एसएंडपी द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का यह प्रदर्शन दुनिया की अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले काफी बेहतर रहने वाला है। एजेंसी ने अपने आधार परिदृश्य (base-case scenario) में अनुमान लगाया है कि यदि कच्चे तेल की कीमत औसतन 85 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो भारत की जीडीपी वृद्धि दर (GDP growth rate) 7.1 फीसदी रह सकती है। दोनों ही स्थितियों में, भारत तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शुमार रहेगा, जो वैश्विक मंच पर उसकी मजबूत स्थिति को रेखांकित करता है।

महंगे तेल के साइड इफेक्ट्स: महंगाई और घाटे का खतरा

हालांकि रिपोर्ट में विकास दर को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया है, लेकिन एसएंडपी ने महंगे कच्चे तेल से होने वाले संभावित नुकसानों के प्रति सचेत भी किया है। एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि तेल की ऊंची कीमतों से देश के चालू खाता घाटे (Current Account Deficit - CAD) पर सीधा दबाव पड़ेगा। इसके अलावा, ईंधन महंगा होने से माल ढुलाई और उत्पादन लागत बढ़ेगी, जिससे अंततः कंपनियों के मुनाफे (corporate profit) पर असर पड़ सकता है। आम उपभोक्ताओं के लिए यह दोहरी मार हो सकती है क्योंकि महंगाई बढ़ने से उनकी क्रय शक्ति (purchasing power) कम होगी, जो निजी खपत को प्रभावित कर सकती है।

रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि सरकार को ऊर्जा की बढ़ी हुई कीमतों के असर को कम करने के लिए सब्सिडी (subsidies) पर अधिक खर्च करना पड़ सकता है। एसएंडपी का मानना है कि इससे सरकार के राजकोषीय घाटे (fiscal deficit) पर दबाव जरूर बढ़ेगा, लेकिन भारत की संप्रभु क्रेडिट रेटिंग (Sovereign Credit Rating) पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ेगा। एजेंसी के अनुसार, भारत सरकार दीर्घकालिक राजकोषीय संतुलन के प्रति प्रतिबद्ध है और उसके पास खर्चों में लचीलापन है। जरूरत पड़ने पर सरकार अन्य मदों में कटौती कर वित्तीय घाटे के लक्ष्य को हासिल कर सकती है।

कॉर्पोरेट और बैंकिंग सेक्टर पर पड़ सकता है असर

एसएंडपी ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में बताया है कि यदि ऊर्जा की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो भारत की शीर्ष 100 कंपनियों की आय में 15 से 20 फीसदी तक की भारी गिरावट आ सकती है। इससे कंपनियों पर कर्ज (leverage) का बोझ बढ़ेगा, जो उनकी वित्तीय स्थिति को कमजोर कर सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, रिफाइनिंग और एविएशन (Aviation) सेक्टर महंगे तेल से सबसे अधिक संवेदनशील हैं। वहीं, ऊर्जा आयात पर निर्भर रहने वाले सीमेंट, धातु और स्टील जैसे क्षेत्र भी जोखिम के दायरे में हैं।

ईंधन और खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों का असर बैंकिंग क्षेत्र पर भी पड़ने की आशंका जताई गई है। महंगाई से लोगों की क्रय शक्ति घटने के कारण वाहन ऋण (vehicle loans) और किफायती आवास (affordable housing) जैसे क्षेत्रों में ऋण की मांग में कमी आ सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि खराब स्थिति में, बैंकों के फंसे हुए कर्ज (NPA) में सालाना एक फीसदी के आसपास की बढ़ोतरी हो सकती है। यदि हालात ज्यादा चुनौतीपूर्ण बनते हैं, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) कुछ क्षेत्रों के लिए ऋण पुनर्गठन (loan restructuring) की अनुमति दे सकता है।

एक अलग रिपोर्ट में, भारतीय निर्यात-आयात बैंक (EXIM Bank) ने भी पुष्टि की है कि पश्चिम एशिया संकट (West Asia crisis) का भारतीय कंपनियों की ऋण चुकाने की क्षमता पर अब तक कोई महत्वपूर्ण असर नहीं पड़ा है। बैंक की एमडी और सीईओ हर्षा बंगारी ने कहा कि भले ही कुछ कंपनियों की गतिविधियों पर असर पड़ा हो, लेकिन उनकी आर्थिक बुनियाद मजबूत है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था की आंतरिक शक्ति को दर्शाता है कि वह बाहरी चुनौतियों के बावजूद स्थिर बनी हुई है।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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