तेल 100 डॉलर के पार: FY27 के लिए भारतीय कॉरपोरेट कमाई के अनुमानों में बड़ी कटौती, युद्ध बना मुख्य जोखिम

कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर पार, भारतीय कॉरपोरेट कमाई के अनुमानों में कटौती

तेल 100 डॉलर के पार: FY27 के लिए भारतीय कॉरपोरेट कमाई के अनुमानों में बड़ी कटौती, युद्ध बना मुख्य जोखिम

कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गई हैं, जिससे भारतीय कंपनी जगत के लिए चिंता बढ़ गई है। विश्लेषकों ने वित्त वर्ष 2027 (FY27) के लिए कॉरपोरेट कमाई के अनुमानों में कटौती करना शुरू कर दिया है। मध्य पूर्व (Middle East) में जारी संघर्ष को इसका मुख्य कारण बताया जा रहा है, जिसका पूरा असर अभी सामने आना बाकी है। यह स्थिति न केवल कंपनियों के मुनाफे पर बल्कि देश की समग्र आर्थिक वृद्धि (economic growth) और आम जनता की जेब पर भी भारी पड़ सकती है, क्योंकि इससे महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका है।

उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया (West Asia) की लड़ाई के कारण कच्चे तेल और गैस की कीमतों में जो बढ़ोतरी हुई है, वह आने वाली तिमाहियों में भारतीय कंपनी जगत के वित्त प्रदर्शन पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी। निप्पॉन इंडिया ऐसेट मैनेजमेंट (Nippon India Asset Management) में न्यू ऐसेट क्लास के प्रमुख एंड्रयू हॉलैंड (Andrew Holland) के अनुसार, खाड़ी युद्ध (Gulf War) से पहले वित्त वर्ष 26-27 के लिए कमाई में लगभग 10-12 फीसदी की बढ़ोतरी की उम्मीद थी। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर पश्चिम एशिया में हालात जल्द ठीक हो जाते हैं, तो शायद एक तिमाही के लिए थोड़ा झटका लग सकता है, लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा, तो कमाई में बढ़ोतरी की उम्मीदों को घटाकर लगभग 6-10 फीसदी तक किया जा सकता है।

इस बीच, कच्चे तेल की कीमतें लगभग 107 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं। अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता में गतिरोध के कारण सोमवार को इनमें करीब 2 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। हॉलैंड ने यह भी कहा कि तेल की कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं, संभवतः 90–100 डॉलर प्रति बैरल पर, और यह इस बात पर निर्भर करेगा कि होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) में बाधा रहती है या नहीं। उनका मानना है कि अगर स्ट्रेट फिर से खुल जाता है तो तेल की कीमतें तेजी से गिर सकती हैं, लेकिन कमाई पर इसका असर दिखने में समय लगेगा।

कमाई के अनुमानों पर गहराता संकट: जेपी मॉर्गन का विश्लेषण

बिजनेस स्टैंडर्ड (Business Standard) के विश्लेषण के मुताबिक, पिछले हफ्ते के आखिर तक मार्च 2026 की तिमाही के नतीजे घोषित करने वाली 141 कंपनियों का कुल शुद्ध लाभ सालाना आधार पर 14 फीसदी बढ़ा था। यह पिछली 10 तिमाहियों में सबसे तेज रफ्तार से हुई बढ़ोतरी थी, जो मौजूदा स्थिति के विपरीत है। जेपी मॉर्गन (J.P. Morgan) के विशेषज्ञों ने भी पश्चिम एशिया की जंग के चलते वित्त वर्ष 2027 में कंपनियों की कमाई में बढ़ोतरी को लेकर जोखिमों का इशारा किया है। उनका अनुमान है कि भले ही संघर्षविराम हो गया हो, लेकिन आपूर्ति में रुकावटें (supply disruptions) और ऊंची लागत अगले कुछ महीनों तक बनी रहेगी। ऊर्जा की आपूर्ति सामान्य होने में तीन से चार महीने का समय और लगने की संभावना है।

जेपी मॉर्गन ने पिछले कुछ हफ्तों में उपभोक्ता (Consumer), ऑटो (Auto), वित्तीय (Financial) और तेल विपणन कंपनियों (OMCs - Oil Marketing Companies) जैसे अलग-अलग सेक्टरों में वित्त वर्ष 27 के लिए कमाई के अपने अनुमानों को भारांकित औसत (weighted average) के आधार पर 2 से 10 फीसदी तक घटा दिया है। जेपी मॉर्गन के राजीव बत्रा (Rajiv Batra) ने हाल के एक नोट में लिखा, "अलग-अलग सेक्टरों में चुनौतियां कई तरीकों से सामने आएंगी, जिनमें सीधे खपत पर असर, मार्जिन में कमी, कामकाज में अड़चन और दूसरे दर्जे के असर शामिल हैं।" उन्होंने कैलेंडर वर्ष 26/27 के लिए एमएससीआई इंडिया (MSCI India) की कमाई में बढ़ोतरी के अपने अनुमानों को 2 फीसदी/1 फीसदी घटाकर 11 फीसदी/13 फीसदी कर दिया है।

रुपया-डॉलर और सेक्टरों पर असर

विश्लेषकों के मुताबिक, कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों के अलावा अगले कुछ महीनों में एक और चीज पर नजर रखनी होगी और वह है रुपये-डॉलर का समीकरण (Rupee-dollar equation)। भारत की कमाई का कुछ हिस्सा निर्यात (export) पर निर्भर है। फार्मा (Pharma), सूचना प्रौद्योगिकी (IT), धातु (Metal) और ऑटो जैसे सेक्टरों को रुपये के कमजोर होने से फायदा होता है, लेकिन कच्चे तेल की ऊंची कीमतें इस लाभ को कम कर सकती हैं।

इलारा कैपिटल (Elara Capital) के प्रमुख बिनो पातिपरमपिल (Bino Patiparampil) ने कहा, "वित्त वर्ष 27 के लिए पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने से पहले हम निफ्टी ईपीएस (Nifty EPS - Earnings Per Share) में 15 फीसदी की बढ़त की उम्मीद कर रहे थे। मेरी शुरुआती राय यह है कि अगर युद्ध जारी रहता है और तेल के दाम कुछ और महीने ऊंचे रहते हैं तो यह घटकर 7-8 फीसदी तक आ सकती है।" ऑटोमोबाइल (Automobile), तेल व गैस (Oil & Gas) और एयरलाइंस (Airlines) जैसे सेक्टरों पर इसका सीधा और गहरा असर पड़ सकता है।

भारतीय कंपनी जगत के लिए आने वाले समय में वैश्विक भू-राजनीतिक (geopolitical) हालात और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव एक बड़ी चुनौती बने रहेंगे। निवेशकों और नीति निर्माताओं को इन कारकों पर बारीकी से नजर रखनी होगी ताकि संभावित प्रभावों को कम किया जा सके और आर्थिक स्थिरता (economic stability) बनाए रखी जा सके। स्थिरता की वापसी और तेल की कीमतों में नरमी ही कॉर्पोरेट कमाई के अनुमानों को फिर से पटरी पर ला सकती है।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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