बंगाल चुनाव नतीजों से पहले TMC की सुप्रीम कोर्ट में दस्तक, EC के नए नियम को चुनौती: क्या बदलेंगे मतगणना के समीकरण?

Bengal Election Results, TMC challenges EC rule in Supreme Court over central employees as counting supervisors, Kolkata High Court

बंगाल चुनाव नतीजों से पहले TMC की सुप्रीम कोर्ट में दस्तक, EC के नए नियम को चुनौती: क्या बदलेंगे मतगणना के समीकरण?

पश्चिम बंगाल में वोटों की गिनती से ठीक पहले राजनीतिक और कानूनी घमासान चरम पर पहुंच गया है। ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने अब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का दरवाजा खटखटाया है। इस याचिका के जरिए पार्टी ने चुनाव आयोग (Election Commission - EC) के उस विवादास्पद फैसले को रोकने की मांग की है, जिसमें मतगणना पर्यवेक्षकों (Counting Supervisor) के तौर पर सिर्फ केंद्र सरकार (Central Government) या पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) के कर्मचारियों को नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब पूरे देश की निगाहें 4 मई को होने वाली मतगणना पर टिकी हैं और यह मामला नतीजों की निष्पक्षता को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। यह कानूनी लड़ाई तब और तेज हो गई जब कोलकाता हाई कोर्ट (Kolkata High Court) ने 1 मई, 2024 को TMC की याचिका को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग के निर्णय में कोई गैर-कानूनी (Illegal) बात नहीं है। हाई कोर्ट से राहत न मिलने के बाद, TMC ने बिना देरी किए सुप्रीम कोर्ट में तत्काल सुनवाई (Urgent Hearing) की अपील की है, क्योंकि मतगणना की तारीख बेहद करीब है।

मतगणना पर्यवेक्षकों पर छिड़ी बहस: TMC बनाम चुनाव आयोग

दरअसल, पूरा मामला चुनाव आयोग के उस निर्देश से जुड़ा है, जिसके तहत हर मतगणना टेबल पर कम से कम एक अधिकारी - चाहे वह सुपरवाइजर हो या असिस्टेंट - केंद्रीय सरकार या किसी PSU से होना अनिवार्य है। TMC का आरोप है कि यह नियम राज्य के कर्मचारियों की भूमिका को सीमित कर रहा है और केंद्र सरकार के प्रभाव को बढ़ा सकता है। TMC के वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी का कहना है कि ऐसा आदेश जारी करने का अधिकार केवल मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner) को है, किसी अन्य अधिकारी को नहीं। पार्टी को आशंका है कि केंद्रीय कर्मचारी केंद्र सरकार के दबाव में आकर निष्पक्षता (Fairness) को प्रभावित कर सकते हैं। उनका तर्क है कि आमतौर पर मतगणना प्रक्रिया में राज्य के कर्मचारी शामिल होते हैं, लेकिन इस बार नियम में यह मनमाना बदलाव विशेष रूप से बंगाल को निशाना बनाने के लिए किया गया है।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग का पक्ष है कि यह फैसला पारदर्शिता (Transparency) और निष्पक्षता बढ़ाने के लिए लिया गया है। आयोग का तर्क है कि नियमों के अनुसार, किसी भी गजेटेड अधिकारी (Gazetted Officer) - चाहे वह राज्य का हो या केंद्र का - को नियुक्त किया जा सकता है, इसलिए यह निर्णय पूरी तरह से वैध है। कोलकाता हाई कोर्ट ने भी इसी तर्क को सही ठहराते हुए कहा था कि चुनाव आयोग को केंद्रीय या राज्य के कर्मचारियों को नियुक्त करने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि जब हर पार्टी के एजेंट मौजूद होंगे, सीसीटीवी (CCTV) निगरानी होगी और माइक्रो-ऑब्जर्वर (Micro-Observer) भी रहेंगे, तो गड़बड़ी की आशंका का कोई ठोस आधार नहीं है।

आगे क्या? सुप्रीम कोर्ट का फैसला तय करेगा निष्पक्षता की कसौटी

अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं। यह चुनाव नतीजों से पहले का आखिरी बड़ा कानूनी दांव है, जो यह तय करेगा कि पश्चिम बंगाल में वोटों की गिनती किसके भरोसे होगी। यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करता है, तो यह पहली बार होगा जब पश्चिम बंगाल में वोटों की गिनती पूरी तरह से केंद्रीय कर्मचारियों की निगरानी में होगी। इस फैसले का दूरगामी असर न केवल बंगाल चुनाव पर पड़ेगा, बल्कि भविष्य में चुनाव प्रबंधन (Election Management) और केंद्र-राज्य संबंधों (Centre-State Relations) के संदर्भ में भी इसके महत्वपूर्ण निहितार्थ होंगे। यह मामला चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता (Autonomy) को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ता है।
यह देखना दिलचस्प होगा कि देश की सर्वोच्च अदालत इस पेचीदा मामले पर क्या रुख अपनाती है। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ही बताएगा कि क्या चुनाव आयोग का यह नियम निष्पक्षता की कसौटी पर खरा उतरता है, या फिर इसमें बदलाव की आवश्यकता है।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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