वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tension) ने एक बार फिर आम आदमी की जेब पर सीधा हमला बोला है. ईरान और अमेरिका के बीच भड़के संघर्ष के कारण दुनिया भर में तेल की आपूर्ति (oil supply) बाधित हो रही है, जिसका सीधा असर पेट्रोल और सीएनजी की बढ़ती कीमतों पर दिख रहा है. यह संकट गहराता जा रहा है और ऐसे में भारत के लिए अपने ऊर्जा सुरक्षा (energy security) के मोर्चे पर चिंताएं बढ़ गई हैं. लेकिन, इस मुश्किल घड़ी में भारत के दोस्त UAE ने एक उम्मीद की किरण जगाई है, जिसके साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक महत्वपूर्ण डील करके लौटे हैं, जिससे आने वाले दिनों में देश को तेल संकट से निपटने में मदद मिल सकती है.
वैश्विक तेल आपूर्ति पर गहराता संकट
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) और एक्सियोस (Axios) की रिपोर्टें बताती हैं कि ईरान-अमेरिका तनाव के कारण तेल आपूर्ति पर जो 'परमानेंट डैमेज' हुआ है, वह किसी पीस डील (peace deal) के बाद भी तुरंत ठीक नहीं होगा. फारस की खाड़ी (Persian Gulf) से बारूदी सुरंगों को हटाने और तेल उत्पादन को सामान्य स्तर पर लाने में कम से कम दो से तीन महीने का समय लग सकता है. इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में ईरान का आक्रामक रुख भी चिंता का विषय है. ईरान भले ही इसे आधिकारिक तौर पर ‘टोल टैक्स’ न कहे, लेकिन वह वहां से गुजरने वाले टैंकरों पर नई फीस लगाने की तैयारी में है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह फीस प्रति बैरल (per barrel) भले ही कम लगे, लेकिन सालाना ईरान के लिए 10 से 100 बिलियन डॉलर (billion dollars) की बंपर कमाई का जरिया बन सकती है.
एक्सियोस के अनुसार, इस संकट के खत्म होने के बाद भी तेल की कीमतें आसमान पर रह सकती हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान के इस नए रवैये ने समुद्री व्यापार को हमेशा के लिए जोखिम भरा बना दिया है. इस दीर्घकालिक खतरे के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार (international market) में तेल की कीमतों में एक स्थायी ‘भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम’ (geopolitical risk premium) जुड़ जाएगा, जो तेल को लगातार महंगा बनाए रखेगा. इस स्थिति का फायदा अमेरिकी तेल उत्पादक (US oil producers) उठा रहे हैं, जो अपने उत्पादन को रिकॉर्ड स्तर पर ले जाने की तैयारी में हैं, जिससे अगले साल तक अमेरिका का तेल उत्पादन 14.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन (million barrels per day) तक पहुंच सकता है. अमेरिकी शेल उत्पादकों (US shale producers) ने अपने बजट में 490 मिलियन डॉलर का इजाफा कर ग्लोबल मार्केट पर कब्जा जमाने की तैयारी की है.
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भारत के दोस्त UAE: संकटमोचक या स्थायी समाधान?
ऐसे में, भारत के लिए संयुक्त अरब अमीरात (UAE) एक अहम रणनीतिक साझेदार (strategic partner) बनकर उभरा है. UAE ईरान-अमेरिका के दबदबे को कम करने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को बाईपास (bypass) करने वाले पाइपलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर (pipeline infrastructure) पर तेजी से काम कर रहा है. UAE की 'वेस्ट-ईस्ट पाइपलाइन' (West-East Pipeline) परियोजना का लगभग 50% काम पूरा हो चुका है और इसका लक्ष्य 2027 तक इसे चालू करना है. अबू धाबी की सरकारी तेल कंपनी ADNOC की देखरेख में बन रही यह पाइपलाइन, फुजैराह पोर्ट (Fujairah Port) के जरिए UAE की तेल निर्यात क्षमता (oil export capacity) को दोगुना कर 40 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंचा देगी. हाल ही में UAE के ओपेक (OPEC) से बाहर निकलने के बाद उस पर तेल उत्पादन का कोई कोटा (quota) भी लागू नहीं है, जिससे वह वैश्विक बाजार में अपनी आपूर्ति (supply) और मजबूत कर सकेगा.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया UAE यात्रा के दौरान, भारत और UAE के बीच ऊर्जा सुरक्षा को लेकर एक ऐतिहासिक रक्षा और कूटनीतिक समझौता (strategic defense and diplomatic agreement) हुआ है. इस ‘महाडील’ के तहत, UAE की ADNOC कंपनी भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (Strategic Petroleum Reserve - SPR) में लगभग 30 मिलियन बैरल कच्चा तेल (crude oil) स्टोर करने पर सहमत हुई है, जो पहले के समझौतों से पांच गुना अधिक है. यह तेल भारत के विशाखापट्टनम (Visakhapatnam) और ओडिशा के चांदीखोल (Chandikhol) जैसे भूमिगत भंडारों (underground storages) में सुरक्षित रखा जाएगा. इसके अतिरिक्त, भारतीय तेल कंपनी IOCL और UAE के बीच LPG और LNG की भारी आपूर्ति को लेकर भी कई बड़े समझौते हुए हैं, जो संकट के समय में भी भारत को बिना किसी रुकावट के ईंधन की सुरक्षा की गारंटी देते हैं.
यह घटनाक्रम दर्शाता है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखने के लिए सक्रिय रूप से वैकल्पिक रास्ते तलाश रहा है. UAE के पाइपलाइन प्रोजेक्ट्स और भारत के साथ हुए रणनीतिक समझौते, होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं. वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में स्थायी 'जोखिम प्रीमियम' जुड़ने की आशंका के बावजूद, भारत ने UAE के साथ मिलकर अपनी दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया है. यह डील न केवल भारत को कच्चे तेल के भंडारण में बड़ी क्षमता प्रदान करती है, बल्कि LPG और LNG की आपूर्ति सुनिश्चित करके देश की समग्र ऊर्जा लचीलापन (energy resilience) को भी बढ़ाती है.
ईरान-अमेरिका तनाव से उपजे वैश्विक तेल संकट ने दुनिया भर में अनिश्चितता पैदा की है, लेकिन भारत के लिए UAE के साथ हुई यह रणनीतिक साझेदारी एक कवच का काम कर सकती है. प्रधानमंत्री मोदी द्वारा की गई ये डील्स भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करती हैं और भविष्य के झटकों से निपटने के लिए देश को बेहतर स्थिति में लाती हैं, जिससे आम जनता की जेब पर पड़ने वाले बोझ को कुछ हद तक कम किया जा सकता है.
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.