नेपाली बहुओं को भारतीय नागरिकता: सात फेरे के सात साल पूरे होने पर गुड न्यूज, बिहार में विशेष पहल
भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने 'रोटी-बेटी' के रिश्ते को अब एक नई प्रशासनिक और कानूनी मजबूती मिलने जा रही है। भारतीय दूल्हों के साथ विवाह कर सात फेरे लेने वाली नेपाली मूल की हजारों महिलाओं के लिए यह एक बड़ी खुशखबरी है। सात साल का वैवाहिक जीवन पूरा कर चुकी इन नेपाली बहुओं को अब भारतीय नागरिकता (Indian Citizenship) मिलने का रास्ता साफ हो गया है। इस प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए बिहार के सीमावर्ती जिलों में विशेष समितियां बनाई जा रही हैं, जो प्रखंड स्तर पर कैंप लगाकर पंजीकरण में मदद करेंगी।
यह पहल उन हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण है, जो दशकों से भारत में रह रही हैं और परिवार बसा चुकी हैं, लेकिन दस्तावेजों की कमी या जटिल प्रक्रियाओं के कारण भारतीय नागरिकता से वंचित थीं। प्रशासन की यह सक्रियता न केवल उनके जीवन में स्थिरता लाएगी, बल्कि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंधों को भी और गहरा करेगी।
नागरिकता प्रक्रिया को सुलभ बनाने के लिए बनी उच्चस्तरीय समिति
इस महत्वपूर्ण कदम की नींव केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सीमांचल (Seemanchal) में हुई समीक्षा बैठक के दौरान रखी गई थी। इसी बैठक में नेपाली मूल की महिलाओं को भारतीय नागरिकता दिलाने में प्रशासनिक मदद देने पर चर्चा हुई थी। इसके बाद, पूर्णिया और सहरसा प्रमंडल के आयुक्त राजेश कुमार ने सीमांचल और कोसी (Kosi) के इलाकों में ब्याही गई नेपाली बेटियों की जांच कर उन्हें भारतीय नागरिकता दिलाने में सहयोग का निर्देश दिया।
इस निर्देश के बाद, पूर्णिया के जिलाधिकारी ने नागरिकता पंजीकरण की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है। इस समिति की कमान अपर समाहर्ता (विधि-व्यवस्था) (Additional Collector, Law and Order) को सौंपी गई है। इसमें अपर पुलिस अधीक्षक (Additional Superintendent of Police), उपनिर्वाचन पदाधिकारी (Deputy Election Officer) और सभी संबंधित प्रखंडों के प्रखंड विकास पदाधिकारी (Block Development Officers) शामिल हैं। यह टीम जिले के सभी प्रखंडों में विशेष कैंप आयोजित करेगी, जहां नेपाली महिलाओं को पंजीकरण प्रक्रिया में तकनीकी और कानूनी सहायता प्रदान की जाएगी। इसका सीधा अर्थ है कि अब इन महिलाओं को नागरिकता के लिए जिला मुख्यालय के चक्कर नहीं काटने होंगे।
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समिति का पहला काम होगा, नेपाल से भारत में ब्याही गई बेटियों को चिह्नित करना और उनका एक विस्तृत डेटाबेस तैयार करना। इसके बाद उनके लंबित आवेदनों की जांच की जाएगी और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कानूनी रूप से वैध सभी आवेदकों को नागरिकता प्राप्त करने में पूरी मदद मिले।
'रोटी-बेटी' के रिश्ते को मिलेगी कानूनी मजबूती, तैयार होगा डेटाबेस
भारत में नेपाली महिलाओं को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है, बशर्ते उन्होंने किसी भारतीय नागरिक से विवाह किया हो और भारत में कम से कम सात वर्ष का निवास पूरा कर लिया हो। यह आवेदन प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन है और भारत सरकार के गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) के आधिकारिक पोर्टल (Official Portal) के माध्यम से की जा सकती है। सीमांचल और कोसी जैसे इलाके, जिनमें पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, अररिया, सुपौल जैसे जिले शामिल हैं, नेपाल की सीमा के करीब हैं। इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ऐसी महिलाएं रहती हैं, जो नेपाल से विवाह कर यहां आई हैं।
यह पहल न केवल इन महिलाओं को उनके कानूनी अधिकार दिलाएगी, बल्कि भारत और नेपाल के बीच सदियों से चले आ रहे 'रोटी-बेटी' के सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंधों को प्रशासनिक स्तर पर भी एक नई मजबूती प्रदान करेगी। साथ ही, यह एक महत्वपूर्ण डेटाबेस (Database) तैयार करने में भी मदद करेगा, जिससे यह पता चल सकेगा कि इन इलाकों में नेपाल की कितनी बेटियां ब्याही गई हैं। यह डेटा भविष्य की नीति निर्धारण और सामाजिक योजनाओं के लिए भी उपयोगी साबित होगा।
यह कदम भारत सरकार की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है जिसमें वह अपने नागरिकों और उनसे जुड़े लोगों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए प्रयासरत है। इससे उन हजारों परिवारों को राहत मिलेगी जो लंबे समय से इस जटिलता का सामना कर रहे थे। उम्मीद है कि यह प्रक्रिया तेजी से और सफलतापूर्वक पूरी होगी, जिससे नेपाल से आई बहुओं को भारतीय समाज में पूर्ण रूप से एकीकृत होने का अवसर मिलेगा।
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.