भारत का सेमीकंडक्टर क्षेत्र (semiconductor sector) तेजी से आकार ले रहा है, लेकिन सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि यह किसी अल्पकालिक सब्सिडी की दौड़ में नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव (Ashwini Vaishnaw) ने हाल ही में बताया कि इंडियन सेमीकंडक्टर मिशन (Indian Semiconductor Mission - ISM) के तहत आवंटित लगभग 76,000 करोड़ रुपये में से अधिकांश राशि का उपयोग किया जा चुका है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत धैर्य वाले निवेश (patient investment) पर दांव लगा रहा है, जिसका लक्ष्य 2035 तक दुनिया के शीर्ष सेमीकंडक्टर विनिर्माण (semiconductor manufacturing) देशों में शामिल होना है। यह एक दूरदर्शी रणनीति है जो देश के तकनीकी भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।
सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भारत की दीर्घकालिक रणनीति और माइक्रो-एलईडी का महत्व
सरकार ने हाल ही में गुजरात के धोलेरा (Dholera, Gujarat) में माइक्रो-एलईडी (Micro-LED) तकनीक लाने के लिए एक डिस्प्ले फैब (Display Fab) परियोजना को मंजूरी दी है। यह भारत के डिस्प्ले इकोसिस्टम (Display Ecosystem) के लिए एक बड़ा अवसर है। मंत्री वैष्णव के अनुसार, वैश्विक डिस्प्ले उद्योग में ज्योमेट्री (geometry) का आकार तेजी से घट रहा है, जो 300 माइक्रोन से 70 माइक्रोन तक आ गया है। टीवी (TV) और स्मार्टफोन (Smartphone) जैसे बड़े पैमाने पर अपनाए जाने वाले उपकरणों के लिए 50 माइक्रोन का आकार असली अहम मोड़ है। इस स्तर पर माइक्रो-एलईडी तकनीक यूजर अनुभव (user experience) और कीमत (price) दोनों में एलसीडी (LCD) और ओएलईडी (OLED) के साथ सीधे प्रतिस्पर्धा कर सकती है।
धोलेरा संयंत्र में मिनी-एलईडी (Mini-LED) और माइक्रो-एलईडी (Micro-LED) दोनों तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। इसमें मिनी-एलईडी चिपों का आकार 50x100 माइक्रोन और 75x125 माइक्रोन होगा, जबकि माइक्रो-एलईडी चिप का आकार 30x60 माइक्रोन होगा। उम्मीद है कि धोलेरा संयंत्र से पहली माइक्रो-एलईडी स्क्रीन लगभग 22 महीनों में बनकर तैयार हो जाएंगी। यह परियोजना भारत को अत्याधुनिक डिस्प्ले तकनीक (cutting-edge display technology) में अग्रणी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
तकनीकी विकास और आत्मनिर्भरता की ओर कदम
सरकार का दृष्टिकोण चरणबद्ध है: पहले तकनीक को साबित करना, फिर आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) बनाना, वर्कफोर्स (workforce) को प्रशिक्षित करना और अंततः इसका विस्तार करना। यह भारत को एक भरोसेमंद और दीर्घकालिक पार्टनर (long-term partner) के रूप में स्थापित करेगा। धोलेरा संयंत्र के लिए, क्रिस्टल मैट्रिक्स (Crystal Matrix) ने तकनीक के हस्तांतरण (technology transfer) हेतु ल्यूमेंस (Lumens) के साथ गठजोड़ किया है। क्रिस्टल मैट्रिक्स उत्पादन शुरू होने के साथ ही इस तकनीक को विकसित करने के लिए शोध एवं विकास (Research & Development - R&D) में भी निवेश करेगी, जो स्वदेशी क्षमता निर्माण (indigenous capability building) के लिए महत्वपूर्ण है।
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इंडियन सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) की शुरुआत के बाद से, मात्र चार वर्षों में भारत में सेमीकंडक्टर संयंत्रों की संख्या शून्य से बढ़कर 12 हो गई है। इनमें से दो संयंत्र (माइक्रोन Micron और केन्स Kens के) पहले ही वाणिज्यिक उत्पादन (commercial production) कर रहे हैं। तीसरा संयंत्र जुलाई में और चौथा इस साल के अंत तक उत्पादन शुरू कर देगा। भारत का पहला फैब (Fab) 2028 तक धोलेरा में बनकर तैयार होने की उम्मीद है, जो देश के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा।
प्रतिस्पर्धा में भारत का धैर्यवान दृष्टिकोण
जब अन्य देश भारत के मुकाबले कई गुना ज्यादा सब्सिडी (subsidies) दे रहे हैं, तब भी भारत सरकार एक अलग रणनीति अपना रही है। मंत्री वैष्णव ने स्पष्ट किया, "हमारे देश की कई प्रतिस्पर्धी प्राथमिकताएं हैं। हमने स्पष्ट कर दिया है कि यह 20 साल का सफर है। हम धैर्य वाले निवेश पर दांव लगा रहे हैं, न कि किसी छोटी अवधि की सब्सिडी की दौड़ में हैं।" यह दृष्टिकोण टिकाऊ विकास (sustainable growth) और एक मजबूत घरेलू सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम (domestic semiconductor ecosystem) बनाने पर केंद्रित है।
सेमीकंडक्टर के अलावा, भारत सर्वर निर्माण (server manufacturing) को भी बढ़ावा दे रहा है, जो डेटा केंद्रों (data centers) का एक अहम हिस्सा हैं। डेल (Dell) और एचपीई (HPE) जैसी वैश्विक कंपनियों ने 'मेड इन इंडिया' (Made in India) सर्वर का उत्पादन बढ़ाया है। नेटवेब (Netweb) और वीवीडीएन (VVDN) जैसी घरेलू कंपनियां इस क्षेत्र में शुरुआती चैंपियन (champions) के तौर पर उभर रही हैं, जो डिजिटल इंडिया (Digital India) के लक्ष्यों को मजबूत कर रही हैं।
कुल मिलाकर, भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र में एक लंबी और रणनीतिक यात्रा पर है। यह सिर्फ तात्कालिक लाभ या वैश्विक सब्सिडी की होड़ में शामिल होने के बजाय, एक मजबूत, आत्मनिर्भर और टिकाऊ विनिर्माण आधार बनाने पर केंद्रित है। माइक्रो-एलईडी जैसी अत्याधुनिक तकनीकों में निवेश, घरेलू R&D को बढ़ावा देना और चरणबद्ध विकास का दृष्टिकोण भारत को 2035 तक सेमीकंडक्टर विनिर्माण में एक वैश्विक शक्ति (global power) के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। यह पहल न केवल आर्थिक विकास को गति देगी बल्कि देश की तकनीकी संप्रभुता (technological sovereignty) को भी मजबूत करेगी।
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.