लिपुलेख पर नेपाल की आपत्ति: कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भारत-नेपाल सीमा विवाद में नया मोड़

भारत-नेपाल सीमा पर स्थित लिपुलेख दर्रा, जहां कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर नेपाल ने आपत्ति जताई है

हाल ही में नेपाल ने भारत के माध्यम से लिपुलेख दर्रे (Lipulekh Pass) से होकर कैलाश मानसरोवर यात्रा (Kailash Mansarovar Yatra) के संचालन पर अपनी पुरानी आपत्ति को एक बार फिर ज़ोरदार तरीके से दोहराया है। यह मुद्दा, जो भारत और नेपाल के बीच एक लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद (border dispute) का केंद्र बिंदु है, एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। नेपाल के विदेश मंत्रालय (Ministry of Foreign Affairs) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक आधिकारिक बयान जारी कर इस पर अपनी 'स्थायी स्थिति' (permanent position) को स्पष्ट किया है, जिससे क्षेत्रीय भू-राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है। यह घटनाक्रम दोनों पड़ोसी देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों की संवेदनशीलता को दर्शाता है और आम नागरिकों के लिए इस जटिल सीमा विवाद की गहरी समझ ज़रूरी हो जाती है।

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि "भारत और चीन के बीच नेपाली भूमि लिपुलेख से होकर संचालित होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा के संबंध में मीडिया के उठाए सवालों और चिंताओं पर मंत्रालय का ध्यान गया है।" बयान में आगे यह भी कहा गया कि नेपाल सरकार ने इस विषय में अपनी स्थायी स्थिति को पुनः दोहराया है और भारत व चीन दोनों को कूटनीतिक माध्यम (diplomatic channels) से इस संबंध में अवगत कराया है। नेपाल लगातार भारत सरकार से आग्रह करता रहा है कि वह इस क्षेत्र में सड़क निर्माण (road construction) या विस्तार, सीमा व्यापार (border trade) और यातायात जैसी कोई भी गतिविधि न करे। नेपाल की स्पष्ट नीति है कि भारत के साथ सीमा संबंधी विषयों का समाधान ऐतिहासिक तथ्यों (historical facts), मानचित्रों (maps) और प्रमाणों (evidence) के आधार पर कूटनीतिक माध्यम से किया जाए।

लिपुलेख विवाद: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मौजूदा स्थिति

यह विवाद मूल रूप से 1816 की सुगौली संधि (Sugauli Treaty) से जुड़ा है, जिसके आधार पर नेपाल दावा करता है कि महाकाली नदी (Mahakali River) के पूर्वी हिस्से में लिम्पियाधुरा (Limpiyadhura), कालापानी (Kalapani) और लिपुलेख सहित सभी क्षेत्र उसके भू-भाग का हिस्सा हैं। लिपुलेख नेपाल के उत्तर-पश्चिम में स्थित एक महत्वपूर्ण दर्रा है, जो भारत, नेपाल और चीन की सीमाओं से जुड़ा है। भारत इस इलाक़े को अपने उत्तराखंड (Uttarakhand) राज्य का अभिन्न अंग मानता है।

विवाद ने नवंबर 2019 में तब और ज़ोर पकड़ा जब भारत ने जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) का विभाजन कर दो केंद्र शासित प्रदेश (Union Territories) बनाए और इसके साथ ही एक नया नक्शा जारी किया, जिसमें ये विवादित इलाक़े शामिल थे। नेपाल ने इस पर तीखी आपत्ति जताई और भारत से अपना नक्शा बदलने का आग्रह किया। इसके ठीक पाँच महीने बाद, मई 2020 में, लिपुलेख को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव फिर बढ़ गया। जवाब में, 18 जून 2020 को नेपाल ने अपने संविधान में संशोधन कर देश के राजनीतिक नक्शे को अपडेट किया, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को अपने क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया। यह घटनाक्रम भारत-नेपाल संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने सीमा विवाद की गंभीरता को वैश्विक स्तर पर उजागर किया।

नेपाल का यह नवीनतम बयान दर्शाता है कि यह सीमा विवाद अभी भी अनसुलझा है और दोनों देशों के संबंधों में एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। कैलाश मानसरोवर यात्रा जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के कार्यक्रम का इस विवाद में आना, स्थिति को और जटिल बना देता है। यह भारत और नेपाल दोनों के लिए एक कूटनीतिक चुनौती है, जहाँ उन्हें अपने ऐतिहासिक दावों और मौजूदा भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के बीच संतुलन बनाना है। इस मुद्दे का स्थायी समाधान न केवल दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता (regional stability) और सहयोग के लिए भी आवश्यक है। भविष्य में, दोनों देशों के बीच उच्च-स्तरीय वार्ता और कूटनीतिक प्रयासों से ही इस संवेदनशील मुद्दे का कोई स्वीकार्य हल निकल सकता है।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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