कभी हमारी दादी-नानी की रसोई का अभिन्न अंग रहे मोटे अनाज (Millets), जिन्हें अब आदर के साथ ‘श्रीअन्न’ कहा जाता है, आज एक बार फिर भारतीय थाली में अपनी मज़बूत जगह बना रहे हैं। यह सिर्फ़ कोई पुराना चलन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरुकता और एक टिकाऊ जीवनशैली की ओर लौटने का संकेत है। हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण (survey) की रिपोर्ट बताती है कि 70 प्रतिशत से ज़्यादा भारतीय परिवार नियमित रूप से किसी न किसी रूप में इन पौष्टिक अनाजों को अपने आहार में शामिल कर रहे हैं। चाहे वह रागी (Ragi) की रोटी हो, बाजरे (Bajra) की खिचड़ी या ज्वार (Jowar) का डोसा, श्रीअन्न अब हमारे खानपान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
मोटे अनाज का कमबैक: क्यों बन रहा है यह हर घर की ज़रूरत?
मिलेट्स का यह पुनरुत्थान महज़ स्वाद के लिए नहीं, बल्कि सेहत के लिए है। लोकल सर्कल्स (Local Circles) की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 43 प्रतिशत लोग स्वास्थ्य कारणों से मोटे अनाज खाते हैं। कोविड-19 (COVID-19) महामारी के बाद से लोगों में अपने स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता (health awareness) बढ़ी है, जिससे वे पारंपरिक और पौष्टिक विकल्पों की ओर लौट रहे हैं। मसाला मेवा एवं किराना एसोसिएशन (Masala Mewa & Kirana Association) के अध्यक्ष योगेश गणत्रा बताते हैं कि लोग अब शाम की हल्की भूख के लिए भी मखाने (Makhane), भुने चने (Roasted Chana), कुरमुरा (Kurmura), भेल (Bhel) और मूंगफली (Peanuts) जैसे पारंपरिक और स्वस्थ स्नैक्स (snacks) को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिनकी मांग में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है।
इन अनाजों में रागी, बाजरा, ज्वार के साथ-साथ जौ (Barley) और मक्का (Maize) जैसे विकल्प शामिल हैं। ये ग्लूटेन-मुक्त (gluten-free) होने के साथ-साथ फाइबर (fiber), प्रोटीन (protein) और आवश्यक खनिजों (essential minerals) से भरपूर होते हैं। जहाँ कुछ लोग इन्हें भोजन में विविधता (dietary diversity) लाने के लिए अपना रहे हैं, वहीं 15 प्रतिशत लोग धार्मिक उपवास (religious fasting) के दौरान और कुछ स्थानीय उपलब्धता (local availability) के कारण भी इनका सेवन कर रहे हैं।
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सरकारी प्रोत्साहन से जन-जागरूकता तक: श्रीअन्न का बढ़ता दायरा
भारत सरकार ने भी श्रीअन्न को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रधानमंत्री (Prime Minister) की नागरिकों से अपील के बाद इनकी मांग में और इज़ाफ़ा हुआ है। कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (Confederation of All India Traders - CAIT) के राष्ट्रीय मंत्री शंकर ठक्कर के अनुसार, यह मुहिम लगातार मज़बूत हो रही है। संयुक्त राष्ट्र (United Nations) ने साल 2023 को 'अंतर्राष्ट्रीय मिलेट वर्ष' (International Year of Millets) घोषित करके वैश्विक स्तर (global level) पर भी इनके महत्व को उजागर किया।
सरकारें अब किसानों के लिए जौ, बाजरा और मक्का जैसी मोटे अनाज की फसलों पर विशेष ध्यान दे रही हैं। भारतीय कृषि मंत्रालय (Ministry of Agriculture, India) के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024-25 में भारत ने 180.15 लाख टन मिलेट्स का उत्पादन किया, जिसमें राजस्थान (Rajasthan), महाराष्ट्र (Maharashtra) और कर्नाटक (Karnataka) शीर्ष पर रहे। इतना ही नहीं, भारत ने इसी अवधि में 37 मिलियन डॉलर (million dollars) मूल्य के 89,164.96 टन मिलेट्स का निर्यात (export) भी किया। यह दर्शाता है कि मोटे अनाज अब न केवल घरेलू खपत बल्कि वैश्विक बाज़ार (global market) में भी अपनी पहचान बना रहे हैं। अध्ययन से पता चलता है कि 68 प्रतिशत परिवार सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public Distribution System - PDS) में मोटे अनाजों को चावल और गेहूं की तरह शामिल करने की मांग कर रहे हैं। इस सर्वेक्षण में देश के 346 ज़िलों के 44 हज़ार से अधिक लोगों की राय ली गई, जिसमें 48 प्रतिशत परिवारों ने रागी और 32 प्रतिशत ने ज्वार को आहार में शामिल करने की बात स्वीकार की। हालाँकि, अभी भी 23 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं जिन्होंने मोटे अनाज को अपने भोजन का हिस्सा नहीं बनाया है, जो जागरूकता के लिए एक अवसर पैदा करता है।
यह बदलाव केवल एक खानपान की आदत नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली पर पड़ने वाला एक सकारात्मक दीर्घकालिक प्रभाव (long-term positive impact) है। यह हमें बेहतर पोषण, बेहतर स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति अधिक ज़िम्मेदारी की ओर ले जाता है। श्रीअन्न का यह पुनरुत्थान हमें अपनी जड़ों से जुड़ने और आधुनिक जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रकृति प्रदत्त शक्ति का उपयोग करने का मौका दे रहा है। तो, अपनी थाली में इस पौष्टिक क्रांति को अपनाएँ और सेहतमंद भविष्य की ओर एक कदम बढ़ाएँ।
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.