एक समय था जब पाकिस्तान भारत को परमाणु हमले की धमकी देकर अपनी हेकड़ी दिखाता था, लेकिन आज वही पाकिस्तान पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहा है। भारत द्वारा सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को निलंबित करने और अपने हिस्से के पानी का अधिकतम उपयोग करने की दिशा में उठाए गए ठोस कदमों ने पड़ोसी देश को गहरे जल संकट में धकेल दिया है। पिछले साल अप्रैल में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत ने यह कड़ा रुख अपनाया था, जिसका सीधा असर पाकिस्तान की जल आपूर्ति पर पड़ना शुरू हो गया है। यह घटनाक्रम न केवल भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक नया मोड़ है, बल्कि यह क्षेत्र के जल प्रबंधन और भू-राजनीति पर भी दूरगामी प्रभाव डालेगा।
भारत की 'वाटर स्ट्राइक': सिंधु जल संधि पर कड़ा रुख और पाकिस्तान की बेचैनी
भारत की जल प्रबंधन रणनीति और नई परियोजनाएं
भारत, अपनी नदियों के पानी का पूरा उपयोग करने के लिए युद्ध स्तर पर काम कर रहा है। नई जलविद्युत परियोजनाओं (hydroelectric projects) का निर्माण तेजी से जारी है, वहीं मौजूदा परियोजनाओं की भंडारण क्षमता और बिजली उत्पादन को बढ़ाने के लिए बैराजों से गाद (silt) निकालने का काम भी पूरी गति से चल रहा है। किश्तवाड़ में बन रही सबसे ऊंची मेरुसुदार परियोजना, जिसके पूरा होने पर चिनाब नदी (Chenab River) का बहाव नियंत्रित करने में मदद मिलेगी, इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 1960 से पाकिस्तान के साथ साझा किए जा रहे पानी के बहाव संबंधी डेटा (data) को भी भारत ने अब बंद कर दिया है, जो एक बड़ा रणनीतिक बदलाव है।
भारत की योजना केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। उत्तर भारत के राज्यों, जैसे दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब को पीने और सिंचाई का पानी पूरे साल उपलब्ध कराने के लिए नहरों और नए जलाशयों को जोड़ने की डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) तैयार कर ली गई है, जिसे जल्द ही मंजूरी मिलने की संभावना है। इसके तहत ब्यास नदी से 130 किलोमीटर की एक नहर गंगनहर तक पानी पहुंचाएगी। यमुना नदी को गंगासागर से जोड़ने के लिए 12 किलोमीटर लंबी सुरंग के साथ एक और नहर का प्रस्ताव भी है, जिससे इन राज्यों को बड़ा लाभ मिलेगा।
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पाकिस्तान की बौखलाहट और भारत का दो टूक जवाब
भारत के इन निर्णायक कदमों से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। वह अब उन प्रमुख परियोजनाओं पर भी सवाल उठा रहा है, जो वर्तमान में विश्व बैंक (World Bank) के मध्यस्थता संस्थानों के समक्ष विचाराधीन नहीं हैं। पाकिस्तान ने भारत को कई पत्र लिखकर अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है, लेकिन भारत का रुख स्पष्ट है। भारत ने साफ तौर पर कहा है कि 'ट्रेड और टेरर, पानी और खून, गोली और बोली एक साथ नहीं हो सकते।' यह संदेश पाकिस्तान को आतंकवाद के प्रति अपने रवैये में सुधार करने के लिए मजबूर करने का एक प्रयास है। भारत ने पर्मानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिटेशन (Permanent Court of Arbitration - PCA) की कार्यवाहियों का बहिष्कार किया है और तटस्थ विशेषज्ञ की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी है।
सिंधु जल संधि में सुधार की आवश्यकता और भविष्य की राह
भारत का जोर सिंधु जल संधि को ठीक करने पर है। भारत का मानना है कि यह संधि पचास और साठ के दशक की इंजीनियरिंग के हिसाब से बनी थी और 21वीं सदी की जरूरतों, जैसे मौजूदा मौसम परिवर्तन (climate change), ग्लेशियरों के पिघलने, नदियों में उपलब्ध जल की मात्रा, बढ़ती जनसंख्या और स्वच्छ ऊर्जा (clean energy) की आवश्यकता को देखते हुए इसे फिर से बातचीत (renegotiate) करना अनिवार्य है। पाकिस्तान इसमें अड़ंगे डाल रहा है, जिसे भारत संधि के प्रावधानों का उल्लंघन मानता है।
आने वाले वर्षों में, भारत जम्मू-कश्मीर की बिजली उत्पादन क्षमता में भारी वृद्धि करने का लक्ष्य रख रहा है। 2026 तक पक्कलडुल (1000 मेगावाट) और किरू (624 मेगावाट) जैसी बड़ी परियोजनाएं, जो चेनाब नदी पर स्थित हैं, शुरू होने वाली हैं। ये परियोजनाएं न केवल भारत के ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करेंगी बल्कि पाकिस्तान के लिए जल उपलब्धता के परिदृश्य को भी बदल देंगी।
भारत द्वारा सिंधु जल संधि पर अपना रुख कड़ा करना और अपने हिस्से के जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना एक रणनीतिक और आवश्यक कदम है। यह पाकिस्तान पर आतंकवाद के मुद्दे पर दबाव बनाने और भारत की जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान का पानी के लिए तरसना भारत की 'वाटर स्ट्राइक' का सीधा परिणाम है, जो दर्शाता है कि भारत अब अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। भविष्य में इस संधि को लेकर भारत का रुख और भी मजबूत होने की संभावना है, जब तक कि पाकिस्तान आतंकवाद के प्रति अपना रवैया नहीं बदलता।
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