स्ट्रॉन्ग रूम पर सियासत: EVM सुरक्षा पर क्यों उठते हैं सवाल और क्या कहते हैं नियम?

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स्ट्रॉन्ग रूम पर सियासत: EVM सुरक्षा पर क्यों उठते हैं सवाल और क्या कहते हैं नियम?

हाल ही में पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न हुए हैं, और अब 4 मई को नतीजों का इंतजार है। इन चुनावों के मतदान खत्म होते ही एक बार फिर स्ट्रॉन्ग रूम पर सियासत गरमा गई है। कोलकाता में गुरुवार रात तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेताओं ने एक स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर धरना दिया, जिसमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी शामिल हुईं। आरोप था कि बीजेपी कार्यकर्ता ईवीएम (EVM) से छेड़छाड़ कर रहे थे। हालांकि, चुनाव आयोग (Election Commission) ने बाद में सीसीटीवी फुटेज को झूठा बताते हुए स्पष्टीकरण जारी किया, जिसके बाद यह धरना खत्म हुआ। यह घटना एक बार फिर ईवीएम और स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा तथा विश्वसनीयता को लेकर उठने वाले सवालों को केंद्र में ले आई है। आखिर क्या है यह स्ट्रॉन्ग रूम, इसकी सुरक्षा के क्या नियम हैं, और क्यों हर चुनाव के बाद यह मुद्दा सुर्खियों में आ जाता है, आइए जानते हैं विस्तार से।

क्या होता है स्ट्रॉन्ग रूम और इसकी बहु-स्तरीय सुरक्षा (Multi-Layer Security)?

स्ट्रॉन्ग रूम चुनाव प्रक्रिया का एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह कोई साधारण कमरा नहीं, बल्कि एक उच्च सुरक्षा (high security) वाला नियंत्रित क्षेत्र (controlled area) होता है, जहाँ मतदान के बाद ईवीएम (EVM) और वीवीपैट (VVPAT) मशीनों को मतगणना (counting) तक सुरक्षित रखा जाता है। आमतौर पर इन्हें सरकारी इमारतों, कॉलेज या पॉलिटेक्निक संस्थानों और प्रशासनिक परिसरों में जिला निर्वाचन अधिकारी (District Election Officer) द्वारा सुरक्षा मानकों के आधार पर चुना जाता है।

मतदान खत्म होने के बाद पूरी प्रक्रिया बेहद व्यवस्थित और नियमबद्ध होती है। पोलिंग बूथ पर ही ईवीएम और वीवीपैट मशीनों को सील किया जाता है। इन मशीनों को कड़ी सुरक्षा के बीच स्ट्रॉन्ग रूम तक लाया जाता है और उम्मीदवारों या उनके एजेंटों (agents) की मौजूदगी में जमा किया जाता है। इसके बाद स्ट्रॉन्ग रूम को सील कर दिया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड की जाती है और कई जगह वीडियो रिकॉर्डिंग (video recording) भी अनिवार्य होती है। स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा बहु-स्तरीय होती है:

  • फिजिकल सिक्यॉरिटी (Physical Security): कमरे के बाहर पुलिस और अर्धसैनिक बलों की 24 घंटे तैनाती होती है।
  • सीसीटीवी निगरानी (CCTV Surveillance): हर गतिविधि कैमरे में रिकॉर्ड होती है, और कई जगह लाइव फीड (live feed) उम्मीदवारों को भी दिखाई जाती है।
  • सीलिंग सिस्टम (Sealing System): कमरे के दरवाजे पर विशेष सील लगाई जाती है, जिस पर उम्मीदवारों के हस्ताक्षर होते हैं।
  • डबल लॉक सिस्टम (Double Lock System): कमरे में अक्सर दो ताले लगाए जाते हैं, जिनकी चाबी अलग-अलग अधिकारियों के पास होती है।

स्ट्रॉन्ग रूम में हर किसी को जाने की अनुमति नहीं होती। प्रवेश सख्ती से नियंत्रित होता है। केवल रिटर्निंग ऑफिसर (Returning Officer), जिला निर्वाचन अधिकारी, अधिकृत चुनाव कर्मचारी और मतगणना के दिन नियुक्त स्टाफ ही अंदर जा सकते हैं। आम नागरिकों, मीडिया और उम्मीदवारों को अंदर जाने की अनुमति नहीं होती है। हालांकि, उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के एजेंटों को स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर 24 घंटे निगरानी करने की अनुमति होती है। मतगणना वाले दिन सुबह लगभग 7 बजे स्ट्रांग रूम खोला जाता है, इस दौरान रिटर्निंग ऑफिसर और चुनाव आयोग के ऑब्जर्वर (Observer) मौजूद रहते हैं।

स्ट्रॉन्ग रूम पर विवाद क्यों और पश्चिम बंगाल में अधिक बवाल की वजह

चुनाव आयोग के अनुसार, पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी (transparent) रखने के लिए हर कदम पर राजनीतिक दलों को शामिल किया जाता है, सीसीटीवी निगरानी होती है और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की शिकायत तुरंत दर्ज की जा सकती है। इसके बावजूद स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर विवाद होते रहते हैं। इसकी मुख्य वजहें हैं: भारतीय राजनीति में भरोसे की कमी, ईवीएम पर लगातार उठने वाले सवाल, और कभी-कभी छोटी प्रशासनिक चूक (administrative error) जैसे गलत जगह ईवीएम का मिलना या सुरक्षा में कमी, जो बड़े विवाद का कारण बन जाती हैं।

पश्चिम बंगाल में स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर विवाद बाकी राज्यों की तुलना में ज्यादा देखने को मिलते हैं। इसके पीछे कई कारण हैं, जैसे राज्य में कड़ा राजनीतिक मुकाबला, चुनाव के दौरान हिंसा और तनाव का इतिहास, और पार्टियों द्वारा एक-दूसरे पर लगातार लगाए जाने वाले आरोप। आज के दौर में सोशल मीडिया (social media) भी एक बड़ा फैक्टर बन गया है, जहाँ अधूरी जानकारी या फेक (fake) वीडियो/फोटो माहौल को गरमा सकते हैं, जैसा कि हाल ही में कोलकाता में देखा गया।

चुनाव आयोग बार-बार यह स्पष्ट करता रहा है कि ईवीएम पूरी तरह सुरक्षित हैं और स्ट्रॉन्ग रूम में छेड़छाड़ लगभग असंभव है। आयोग का कहना है कि ज्यादातर विवाद 'गलतफहमी' या 'अधूरी जानकारी' के कारण होते हैं। तकनीकी रूप से सिस्टम मजबूत है, लेकिन स्थानीय स्तर पर मानवीय त्रुटि (human error) की संभावना बनी रहती है। हालांकि, अब तक ऐसे कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आए हैं, जो यह साबित करें कि स्ट्रॉन्ग रूम के जरिए चुनाव परिणाम बदले गए हों।

चुनाव खत्म होने के बाद असली लड़ाई स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर शुरू होती है, जहाँ राजनीति, भरोसा और टेक्नोलॉजी तीनों आमने-सामने होते हैं। चुनाव आयोग लगातार पारदर्शिता सुनिश्चित करने का प्रयास करता है, लेकिन राजनीतिक अविश्वास अक्सर इन प्रयासों पर भारी पड़ता है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सतत चुनौती है, जिसे सुलझाने के लिए सभी पक्षों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है, ताकि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनी रहे।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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