फिच ने घटाया भारत की GDP-ग्रोथ का अनुमान: अमेरिका-ईरान जंग से धीमी होगी रफ्तार, बढ़ेगी महंगाई

फिच ने अमेरिका-ईरान जंग के बीच भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान घटाया

अमेरिकी रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स (Fitch Ratings) ने चालू वित्त वर्ष (FY27) के लिए भारत की GDP-ग्रोथ का अनुमान घटा दिया है। फिच ने पहले 6.7% की वृद्धि का अनुमान लगाया था, जिसे अब संशोधित कर 6.4% कर दिया गया है। एजेंसी का कहना है कि अमेरिका-ईरान के बीच जारी तनाव और उसके परिणामस्वरूप पैदा हुए तेल संकट के कारण सितंबर और दिसंबर तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी होगी। यह खबर आम भारतीय नागरिक के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि धीमी आर्थिक वृद्धि का सीधा असर रोजगार, आय और जीवन स्तर पर पड़ सकता है, जबकि महंगाई का दबाव जेब पर भारी पड़ सकता है।

फिच ने क्यों घटाया भारत की GDP-ग्रोथ का अनुमान?

फिच रेटिंग्स ने अपनी जून ग्लोबल इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट (Global Economic Outlook Report) में भारत के विकास अनुमान में कटौती के पीछे तीन प्रमुख कारणों का उल्लेख किया है। ये कारण वैश्विक और घरेलू दोनों स्तरों पर अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।

अमेरिका-ईरान जंग और तेल संकट (US-Iran War and Oil Crisis)

रेटिंग एजेंसी के अनुसार, अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक तेल बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी है। इस तेल संकट का असर न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था पर, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी साफ तौर पर दिखेगा। फिच का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी (सितंबर) और तीसरी (दिसंबर) तिमाही में आर्थिक सुस्ती सबसे ज्यादा महसूस की जाएगी, क्योंकि इस दौरान तेल की कीमतों में अस्थिरता और आपूर्ति में बाधाएं बनी रह सकती हैं।

घटती आय और कमजोर उपभोक्ता खर्च (Declining Income and Weak Consumer Spending)

जंग के कारण बढ़ती कीमतें लोगों की वास्तविक आय (Real Income) को प्रभावित कर रही हैं। जब कीमतें बढ़ती हैं, तो लोगों की खर्च करने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे उपभोक्ता खर्च (Consumer Spending) में कमी आती है। यह अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है क्योंकि भारत में घरेलू मांग (Domestic Demand) विकास का एक प्रमुख चालक है। हालांकि, देश के भीतर पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) में मजबूती बनी हुई है, जो कुछ हद तक इस कमी को संतुलित कर सकती है।

होर्मुज स्ट्रेट का बंद होना और कच्चे तेल की कीमतें (Closure of Strait of Hormuz and Crude Oil Prices)

'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) का पिछले 14 हफ्तों से बंद होना तेल संकट को और गहरा रहा है। फिच का अनुमान है कि यह जुलाई से पहले नहीं खुलेगा। इस संकट के चलते फिच ने साल 2026 के लिए ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की औसत कीमत का अनुमान 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़ाकर 87 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है। हाल के हफ्तों में ही ईंधन की कीमतें 4-5% तक बढ़ चुकी हैं, जिसका सीधा असर परिवहन लागत और अन्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ रहा है।

महंगाई का बढ़ता दबाव और RBI की संभावित नीति (Rising Inflationary Pressure and RBI's Potential Policy)

भारत में अभी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित रिटेल महंगाई (Retail Inflation) 3.5% और थोक महंगाई (WPI) अप्रैल में सालाना आधार पर 8.3% रही है। रिटेल महंगाई अभी बहुत ज्यादा नहीं बढ़ी है, लेकिन दबाव लगातार बढ़ रहा है। फिच का अनुमान है कि बेस इफेक्ट (Base Effect) और महंगी एनर्जी (Energy) की वजह से इस कैलेंडर वर्ष के अंत तक महंगाई दर बढ़कर 5.3% तक पहुंच सकती है। इसके अलावा, देश के कुछ हिस्सों में जारी हीटवेव (Heatwave) और औसत से कम मानसून (Monsoon) के अनुमान ने भी महंगाई का जोखिम बढ़ा दिया है।

महंगाई के बढ़ते दबाव को देखते हुए फिच का मानना है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) अपनी नीति में बदलाव कर सकता है। हालांकि अप्रैल की बैठक में आरबीआई ने रेपो रेट (Repo Rate) को 5.25% पर स्थिर रखा था, लेकिन फिच के मुताबिक, सप्लाई शॉक (Supply Shock) से पैदा हुए मूल्य दबाव से निपटने के लिए आरबीआई इस साल ब्याज दरों (Interest Rates) में एक बार बढ़ोतरी करके इसे 5.5% कर सकता है। गौरतलब है कि पिछले हफ्ते ही आरबीआई ने भी देश की ग्रोथ का अनुमान घटाकर 6.6% किया था और महंगाई दर 5.1% रहने का अनुमान जताया था।

घरेलू मांग और रुपए की स्थिरता: राहत भरी खबरें

इन चुनौतियों के बावजूद, फिच ने कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 में जीडीपी ग्रोथ का मुख्य चालक घरेलू मांग (Domestic Demand) ही बनी रहेगी। इसके साथ ही, वास्तविक रूप से कम आयात होने के कारण नेट एक्सटर्नल डिमांड (Net External Demand) का ग्रोथ में सकारात्मक योगदान रहेगा। करेंसी मार्केट (Currency Market) को लेकर फिच ने भारतीय बाजार के लिए राहत भरी बात कही है। फिच के अनुसार, इस साल के बचे हुए महीनों में भारतीय रुपए (Indian Rupee) में किसी बड़े अवमूल्यन (Depreciation) की आशंका नहीं है। चालू वित्त वर्ष में डॉलर (Dollar) के मुकाबले रुपए का एक्सचेंज रेट (Exchange Rate) औसतन 97.50 के स्तर पर रहने की उम्मीद है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर, पर 1970 के दशक जैसा नहीं

तेल संकट की मार सिर्फ भारत पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ रही है। फिच ने साल 2026 के लिए वैश्विक विकास दर (Global Growth) का अनुमान भी 0.2% घटाकर 2.4% कर दिया है। हालांकि, फिच के चीफ इकोनॉमिस्ट (Chief Economist) ब्रायन कुल्टन (Brian Coulton) ने कहा कि ऑयल प्राइस शॉक (Oil Price Shock) से वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान हो रहा है, लेकिन दुनिया भर में आईटी (IT) सेक्टर पर हो रहे भारी खर्च से इस झटके का असर थोड़ा कम जरूर हुआ है, खासकर एशिया में इसका फायदा मिल रहा है। फिच का मानना है कि मौजूदा तेल संकट 1970 के दशक के खतरनाक तेल संकटों जितना गंभीर नहीं है, जब कच्चे तेल की वास्तविक कीमतें 170 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। आज वैश्विक जीडीपी (Global GDP) में तेल की कुल खपत की हिस्सेदारी घटकर आधी रह गई है।

फिच को उम्मीद है कि आगामी वित्त वर्ष 2027-28 में भारतीय अर्थव्यवस्था एक बार फिर रफ्तार पकड़ेगी। एनर्जी संकट का असर कम होने से उपभोक्ता खर्च और निवेश (Investment) में सुधार होगा, जिससे इस पूरे वित्त वर्ष में जीडीपी ग्रोथ सुधरकर 6.7% पर पहुंच सकती है। हालांकि, इसके बाद वित्त वर्ष 2028-29 में यह दोबारा अपने ट्रेंड ग्रोथ रेट (Trend Growth Rate) 6.4% के स्तर पर आ जाएगी। यह दर्शाता है कि मौजूदा चुनौतियां अल्पकालिक हो सकती हैं, और भारत की अर्थव्यवस्था में दीर्घकालिक लचीलापन मौजूद है।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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