जब रमजान के पाक महीने में, मेरठ की एक इफ्तार पार्टी में, भाईचारे की जगह 'मिठाई-चारा' हावी हो गया, तो क्या कहने! खबर है कि रोजा खोलने पहुंचे लोगों की तादाद अधिक थी और मिठाई की संख्या सीमित। बस, यहीं से शुरू हुई एक 'मीठी' लड़ाई, जिसने देखते ही देखते पूरे माहौल को 'कड़वा' कर दिया। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा वीडियो बताता है कि कैसे एक मिठाई के टुकड़े के लिए इंसानियत के कुछ 'ठेकेदारों' ने संयम और धैर्य को ताक पर रख दिया। यह सिर्फ मेरठ की बात नहीं, यह हमारे आज के समाज की एक छोटी, लेकिन गहरी तस्वीर है, जहां छोटी सी कमी भी बड़े बवाल का कारण बन सकती है।
मिठाई पर बवाल: जब 'मीठा' बन गया 'कड़वा' संग्राम!
रमजान का महीना, जो संयम, त्याग और भाईचारे का संदेश देता है, उसी मेरठ में कुछ 'संयमी' लोगों का धैर्य मिठाई की प्लेट से फिसल गया। हुआ यूं कि इफ्तारी का समय हुआ और रोजेदार खाने-पीने के सामान की ओर बढ़े। समस्या यह थी कि मिठाई की मात्रा सीमित थी, जबकि खाने वाले अधिक। अब जब पेट में चूहे कूद रहे हों और आंखों के सामने 'सीमित संस्करण' की मिठाई हो, तो भला कौन संयम रखे? 'पहले आप, पहले आप' की जगह 'पहले मैं, पहले मैं' का नारा गूंज उठा।
प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो पहले तो मिठाई को लेकर छीना-झपटी शुरू हुई, फिर बात बहस तक पहुंची, और देखते ही देखते यह बहस धक्का-मुक्की में बदल गई। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि इफ्तारी कार्यक्रम स्थल किसी जंग के मैदान जैसा नजर आने लगा। कुर्सियां खिसकती दिखीं, लोग एक-दूसरे को पीटते हुए नजर आए। इस पूरे 'मीठे' बवाल का किसी ने वीडियो बना लिया और उसे सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। अब यह वीडियो आग की तरह फैल रहा है, और हर कोई अपनी-अपनी 'अहिंसक' टिप्पणी दे रहा है।
पुलिस की ओर से इस मामले पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, शायद वे भी सोच रहे होंगे कि इस 'मीठे' विवाद में क्या बयान दें। स्थानीय स्तर पर भी वीडियो की पुष्टि नहीं हो पाई है कि यह मेरठ के किस थाना क्षेत्र का है। वहीं, मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवियों का कहना है कि रमजान का महीना संयम, धैर्य और भाईचारे का संदेश देता है, लेकिन ऐसी घटनाएं समाज में गलत संदेश देती हैं। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक मिठाई की कमी का नतीजा था, या हमारी 'सब्र' की मीठी गोली खत्म हो चुकी है?
क्या यह 'शुगर-रश' है या हमारी 'सब्र' की नई परिभाषा?
यह घटना सिर्फ एक इफ्तार पार्टी में मिठाई की कमी का किस्सा नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक ताने-बाने पर एक कटाक्ष है, जहां छोटी सी असुविधा भी बड़े टकराव का कारण बन जाती है। क्या हम इतने असहिष्णु हो चुके हैं कि अब एक-दूसरे के हक की मिठाई भी बर्दाश्त नहीं कर सकते? या फिर सोशल मीडिया पर 'वायरल' होने की होड़ ने हमें हर छोटी बात को 'ड्रामा' बनाने पर मजबूर कर दिया है?
यह घटना आयोजकों के लिए भी एक सबक है कि जब आप 'दावत-ए-इफ्तार' रखें, तो 'मिठाई-ए-इंतजाम' भी पुख्ता रखें। वरना, यह 'भारतीय ड्रामा एपिसोड' सिर्फ एक ट्रेंड बनकर रह जाएगा, जहां हर छोटी बात पर लोग लड़ने-झगड़ने को तैयार बैठे हैं। यह घटना दिखाती है कि कैसे सामाजिक मेलजोल के कार्यक्रमों में 'प्लानिंग' की कमी, या शायद 'संयम' की कमी, हमें 'मीठे' से 'कड़वे' अंजाम तक ले जा सकती है।
तो अगली बार जब आप किसी दावत में जाएं, तो याद रखें: मिठाई खाने का हक सबका है, लेकिन उससे पहले इंसानियत और भाईचारे का। वरना कहीं 'मीठे' से शुरू हुई बात, 'कड़वे' अंजाम तक न पहुंच जाए और आपका वीडियो भी सोशल मीडिया पर 'वायरल' हो जाए...
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