हरिदेव जोशी यूनिवर्सिटी: 'बेइज्जत कर, इज्जत देने का शुक्रिया' और फिर बवाल... कुलगुरु बोले- ये निंदनीय कृत्य!

हरिदेव जोशी यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में मंच पर छात्रा सारा इस्माइल अपने बयान से अधिकारियों को हैरान करते हुए।

हरिदेव जोशी यूनिवर्सिटी: 'बेइज्जत कर, इज्जत देने का शुक्रिया' और फिर बवाल... कुलगुरु बोले- ये निंदनीय कृत्य!

हाल ही में राजस्थान के हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में एक ऐसा 'संस्कारी' दीक्षांत समारोह हुआ, जिसने डिग्री देने की सदियों पुरानी परंपरा को नया आयाम दे दिया है। यहाँ छात्रों को डिग्री तो मिली, लेकिन कुछ इस अंदाज़ में कि समारोह खुद ही विवादों का हिस्सा बन गया। कहानी एक छात्रा, सारा इस्माइल, के मंच से दिए गए उस 'विद्रोही' बयान से शुरू होती है, जिसने पूरे देश के 'समारोहों' की पोल खोल दी। 'बेइज्जत कर, इज्जत देने का शुक्रिया' कहने के बाद, उनका वीडियो क्या वायरल हुआ, मानो शिक्षा जगत में भूचाल ही आ गया हो!

तो भैया, हुआ यूँ कि जयपुर की इस प्रतिष्ठित जर्नलिज्म यूनिवर्सिटी में 271 छात्रों को डिग्री देने का बुलावा आया था। दूर-दराज़ से, राजस्थान के कोने-कोने से छात्र अपने मम्मी-पापा को लेकर पहुँचे। सबके मन में यही उत्साह कि बच्चे की डिग्री हाथ में आएगी, मंच पर उसे डिग्री लेते देखेंगे। ड्रेस कोड भी फिक्स था, एकदम शान से सब सजे-धजे पहुँचे। भाषण हुए, गोल्ड मेडलिस्टों को चमकते मेडल पहनाए गए, और फिर... बस कार्यक्रम खत्म!

जी हाँ, आपने सही पढ़ा, खत्म! उन हज़ारों आँखों का क्या, जो अपने बच्चों को मंच पर डिग्री लेते देखने के लिए तीन साल की पढ़ाई और लाखों रुपये के खर्च का हिसाब लगा रही थीं? छात्रों का आरोप है कि उन्हें मंच पर अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि लेने का मौका ही नहीं मिला। सोचिए, तीन साल की तपस्या, प्रोजेक्ट की माथापच्ची, और परीक्षा की टेंशन के बाद जब डिग्री का समय आया, तो मंच पर 15 मिनट भी नसीब नहीं हुए। इसे देखकर अभिभावक तो भड़क गए, बोले- “यह हमारी भावनाओं का अपमान है!” लेकिन तब तक, माननीय राज्यपाल महोदय जा चुके थे।

जब 'परंपरा' से टकराई 'परेशानी': कुलगुरु का 'निंदनीय' फ़ैसला

जब हंगामा बढ़ा और सोशल मीडिया पर सारा का वीडियो आग की तरह फैला, तो उप मुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा और कुलगुरु प्रोफेसर नंदकिशोर पांडे को मैदान में उतरना पड़ा। उन्होंने मंच पर आकर बच्चों को डिग्रियाँ दीं। लेकिन फिर जो बयान कुलगुरु साहब ने दिया, वो तो पीएचडी की डिग्रियाँ लेने वालों के लिए भी नया ज्ञान था। उन्होंने कहा, "परंपरा के अनुसार दीक्षांत समारोह में केवल पीएचडी धारकों और स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले छात्रों को ही मंच पर सम्मानित किया जाता है। सभी छात्रों को मंच पर बुलाकर डिग्री देना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है।" और रही बात छात्रा सारा के बयान की, तो उसे उन्होंने 'निंदनीय कृत्य' बता डाला!

अब आप ही सोचिए, एक छात्रा अपनी पीड़ा व्यक्त करे, व्यवस्था पर सवाल उठाए, और कुलगुरु उसे 'निंदनीय कृत्य' बता दें! क्या छात्रों का 'बेइज्जत होकर इज्जत' लेना ही हमारी शिक्षा की नई 'परंपरा' है? यह सिर्फ हरिदेव जोशी यूनिवर्सिटी का मामला नहीं है, यह तो हर उस संस्था का हाल है जहाँ 'बड़े' लोगों के लिए समय और मंच होता है, पर उन 'छोटे' छात्रों के लिए नहीं, जिनके दम पर वो संस्था चलती है। क्या हमारी 'परंपरा' अब इतनी भारी हो गई है कि छात्रों की मेहनत और उनके माता-पिता की भावनाओं से भी बड़ी हो जाए?

यह सिर्फ एक 'नाटक' या बदलते भारत का संकेत?

यह घटना सिर्फ एक दीक्षांत समारोह का विवाद नहीं, बल्कि भारतीय व्यवस्था में व्याप्त एक बड़े विरोधाभास का प्रतीक है। एक तरफ भव्य समारोहों और 'परंपरा' का ढोंग, दूसरी तरफ आम आदमी और छात्रों की अनदेखी। क्या यह 'परंपरा' के नाम पर छात्रों को मंच से दूर रखने का एक बहाना है, या सचमुच हमारी यूनिवर्सिटीज के पास इतनी व्यवस्था नहीं कि वे अपने सभी 'सफल' छात्रों को उनके हक का सम्मान दे सकें? यह सोचने वाली बात है कि जिस देश में 'अतिथि देवो भव' कहा जाता है, वहाँ अपने ही छात्रों को मंच पर डिग्री लेने के लिए 15 मिनट भी नसीब नहीं होते। शायद अब समय आ गया है जब हमारी शिक्षा व्यवस्था सिर्फ डिग्रियाँ बाँटने वाली मशीन न बनकर, छात्रों की भावनाओं का भी सम्मान करना सीखे। वरना, ऐसी 'बेइज्जत कर इज्जत' देने वाली परंपराएँ तो आए दिन वायरल होती रहेंगी।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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