कभी वॉशिंगटन में हाशिए पर धकेला जा चुका पाकिस्तान, ट्रंप प्रशासन के दौरान अपनी कूटनीतिक पैठ बनाने में कैसे कामयाब रहा, यह कहानी रियल एस्टेट के एक सौदे से शुरू हुई थी। न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीब आने का रास्ता तैयार किया। यह सिर्फ एक व्यावसायिक समझौता नहीं था, बल्कि ट्रंप प्रशासन से पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकी की नींव रखने वाला एक महत्वपूर्ण कदम था। इस चाल से पाकिस्तान ने न केवल अमेरिका का आर्थिक सहयोगी बनने का अवसर पाया, बल्कि ट्रंप के खास सहयोगियों के साथ अपनी पैठ भी मजबूत की, जिससे वॉशिंगटन में उसकी पूछ-परख बढ़ गई।
रियल एस्टेट से डिप्लोमेसी तक: पाकिस्तान की रणनीतिक चाल
मामला वॉशिंगटन में बोर्ड ऑफ पीस बैठक के दौरान सामने आया, जब ट्रंप के करीबी स्टीव विटकॉफ ने न्यूयॉर्क में पाकिस्तान के स्वामित्व वाले रूजवेल्ट होटल की मरम्मत के लिए एक साझेदारी का प्रस्ताव रखा। यह डील पाकिस्तान के लिए ट्रंप प्रशासन का विश्वास जीतने का पहला कदम साबित हुई। इस समझौते ने पाकिस्तान को अमेरिकी आर्थिक सहयोगी के रूप में स्थापित किया और उसे ट्रंप के आंतरिक सर्किल के करीब ला दिया। यहीं से पाकिस्तान की कूटनीतिक चालों का सिलसिला शुरू हुआ, जिसने उसे अमेरिकी विदेश नीति के निर्णयकर्ताओं तक पहुंचने का मौका दिया।
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान सिर्फ इस डील पर ही नहीं रुका। उसने ट्रंप के आंतरिक सर्किल की चाटुकारिता का सहारा लिया। इसके तहत, ट्रंप के नेटवर्क से जुड़े लॉबिस्ट्स को काम पर रखा गया और ट्रंप के सहयोगियों जैसे कुशनर और विटकॉफ की व्यावसायिक कंपनियों में अपनी भागीदारी बढ़ाई। यहां तक कि डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित करना भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा था। इन प्रयासों के दम पर पाकिस्तान उन प्रभावशाली व्यक्तियों तक पहुंचने में सफल रहा, जो अमेरिकी विदेश नीति की दिशा और दशा तय करते हैं।
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ट्रंप प्रशासन से पाकिस्तान की नजदीकी: प्राथमिकताओं का तालमेल
पाकिस्तान ने अमेरिकी प्राथमिकताओं को समझने और उनके साथ तालमेल बिठाने पर भी विशेष ध्यान दिया। उसने खुद को आतंकवाद के खिलाफ एक मजबूत सहयोगी के रूप में पेश किया, जिसके लिए एक वरिष्ठ इस्लामिक व्यक्ति की गिरफ्तारी जैसे कदम उठाए गए। उसने एक महत्वपूर्ण खनन परियोजना में अमेरिका का निवेश भी हासिल किया और खुद को अमेरिका के भू-राजनीतिक लक्ष्यों में एक भरोसेमंद सहयोगी के तौर पर प्रस्तुत किया। जहां पाकिस्तान हमेशा अमेरिका के करीब रहने की कोशिश करता रहा है, वहीं ट्रंप के कार्यकाल में इस संबंध ने एक नया मोड़ लिया। सिर्फ एक साल पहले, अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद पाकिस्तान वॉशिंगटन में पूरी तरह से दरकिनार हो चुका था, क्योंकि रणनीतिक रूप से उसकी अहमियत कम हो गई थी। लेकिन ट्रंप की वापसी की संभावना ने नई विदेश नीति में संबंधों और डील्स को महत्व दिया, जिससे पाकिस्तान के लिए नए रास्ते खुल गए। ट्रंप की ‘सहयोगियों को फिर से एकजुट करने’ की रणनीति ने भी पाकिस्तान को इस मौके को दोनों हाथों से लपकने का अवसर दिया।
ईरान संकट: पाकिस्तान के लिए अप्रत्याशित अवसर
पाकिस्तान की अमेरिका से बढ़ती नजदीकियों के बीच एक ऐसा घटनाक्रम हुआ, जिस पर 'बिल्ली के भाग से छींका टूटा' वाली कहावत पूरी तरह से लागू होती है। ईरान के खिलाफ अमेरिका ने जब युद्ध छेड़ा, तो पाकिस्तान की अहमियत एक बार फिर से बढ़ गई। पाकिस्तान, ईरान के साथ 565 मील की लंबी सीमा साझा करता है और तेहरान के साथ उसके अच्छे राजनयिक संबंध भी हैं। इन सभी कारकों ने पाकिस्तान को अमेरिका के लिए एक अनिवार्य खिलाड़ी बना दिया।
अब पाकिस्तान, ईरान में ट्रंप का संदेशवाहक बन रहा है और शांति वार्ता का प्रस्ताव दे रहा है। बदले में, उसके अपने कई स्वार्थ भी पूरे हो रहे हैं। मसलन, पाकिस्तान खुद को आर्थिक रूप से मजबूत बना रहा है, रणनीतिक तौर पर अपनी स्थिति उभार रहा है, और वैश्विक स्तर पर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में भी जुटा हुआ है।
इस प्रकार, रियल एस्टेट डील से शुरू हुई पाकिस्तान की यह यात्रा, कूटनीति के जटिल रास्तों से गुजरते हुए, उसे ट्रंप प्रशासन में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में सफल रही। यह दर्शाता है कि कैसे एक देश, रणनीतिक सूझबूझ और बदलते वैश्विक परिदृश्य का लाभ उठाकर, अपनी स्थिति को मजबूत कर सकता है।
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