जलवायु परिवर्तन से घट रही शारीरिक गतिविधियां, 2050 तक भारत में बढ़ सकती है मृत्युदर - लैंसेट अध्ययन

भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण शारीरिक गतिविधियों में कमी और बढ़ती मृत्युदर

नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन का मानव जीवन पर गहरा असर पड़ रहा है, और अब एक नए अध्ययन ने इस खतरे की गंभीरता को और बढ़ा दिया है। लैंसेट ग्लोबल हेल्थ जर्नल में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, बढ़ते तापमान के कारण लोगों की शारीरिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं, जिससे व्यायाम कम हो रहा है। यह प्रवृत्ति वैश्विक स्तर पर शारीरिक निष्क्रियता को बढ़ावा दे रही है, जिसका सीधा परिणाम मृत्युदर में वृद्धि और आर्थिक हानि के रूप में सामने आ सकता है। विशेष रूप से भारत में, जलवायु परिवर्तन शारीरिक गतिविधियों पर असर डालकर 2050 तक मृत्युदर में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकता है।

जलवायु परिवर्तन: शारीरिक निष्क्रियता और असमय मृत्यु का बढ़ता खतरा

अर्जेंटीना की कैथोलिक यूनिवर्सिटी सहित लैटिन अमेरिकी शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन के कारण उच्च तापमान से दुनिया भर में 2050 तक लाखों लोग शारीरिक रूप से निष्क्रिय हो सकते हैं। इसके भयावह परिणाम सामने आ सकते हैं: सालाना सात लाख अतिरिक्त असमय मौतें हो सकती हैं और वैश्विक उत्पादकता में 3.68 अरब डॉलर की भारी हानि हो सकती है। यह शोध वर्ष 2000 से 2022 के बीच 156 देशों के डेटा का विश्लेषण करके किया गया है, जिसमें 2050 तक बढ़ते तापमान के वैश्विक शारीरिक गतिविधि पर पड़ने वाले प्रभावों का अनुमान लगाया गया है।

अध्ययन के अनुसार, तापमान में लगातार बढ़ोतरी विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के उस महत्वपूर्ण लक्ष्य को कमजोर कर सकती है, जिसमें 2030 तक दुनिया भर में शारीरिक निष्क्रियता को 15 प्रतिशत कम करने का लक्ष्य रखा गया है। यह एक गंभीर चुनौती है, क्योंकि शारीरिक निष्क्रियता पहले से ही एक वैश्विक स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है। डब्ल्यूएचओ के मानकों के अनुसार, 18 से 64 साल के लोगों को प्रति सप्ताह 150 मिनट मध्यम स्तर के व्यायाम या 75 मिनट खूब पसीना बहाने वाले व्यायाम करने की सलाह दी जाती है, लेकिन वर्तमान में हर तीसरा वयस्क इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रहा है।

भारत पर गहराता मृत्युदर का संकट

भारत के लिए यह अध्ययन विशेष रूप से चिंताजनक आंकड़े प्रस्तुत करता है। अनुमान है कि शारीरिक निष्क्रियता के चलते भारत में मृत्युदर बढ़ सकती है। 2050 तक देश में शारीरिक निष्क्रियता के कारण एक लाख की आबादी पर मृत्युदर 10.62 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका है। यह आंकड़ा भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर भारी दबाव डालेगा और आर्थिक विकास को भी प्रभावित कर सकता है। बढ़ते तापमान के कारण, खासकर साल के सबसे गर्म घंटों के दौरान, गर्म और आर्द्र स्थितियां युवाओं और बुजुर्गों दोनों के लिए शारीरिक गतिविधियों को केवल बैठे रहने या सोने तक सीमित कर देती हैं, जिससे शारीरिक सक्रियता और भी कम हो जाती है।

नीतिगत हस्तक्षेप और जन-जागरूकता की आवश्यकता

यह अध्ययन स्पष्ट संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। उच्च तापमान के कारण होने वाली शारीरिक निष्क्रियता एक चक्र बनाती है, जहाँ कम व्यायाम से स्वास्थ्य बिगड़ता है, जिससे मृत्युदर बढ़ती है और उत्पादकता में कमी आती है। इस चुनौती का सामना करने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

नीति निर्माताओं को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के साथ-साथ ऐसे सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम बनाने होंगे जो लोगों को शारीरिक रूप से सक्रिय रहने के लिए प्रोत्साहित करें, भले ही तापमान बढ़ रहा हो। इसमें सुरक्षित और ठंडी व्यायाम सुविधाओं का विकास, जागरूकता अभियान और लचीली कार्य प्रणालियाँ शामिल हो सकती हैं। दीर्घकालिक रूप से, जलवायु परिवर्तन के मूल कारणों को संबोधित करना ही इस बढ़ती स्वास्थ्य समस्या का एकमात्र स्थायी समाधान है। यह केवल व्यक्तियों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सरकारों, समुदायों और वैश्विक संगठनों की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे इस आसन्न संकट को गंभीरता से लें और प्रभावी कदम उठाएं।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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