बंगाल चुनाव: 'SIR + एंटी इनकंबेंसी' का खेल, NDTV के 'नंबर गेम' में क्या बोले एक्सपर्ट?

पश्चिम बंगाल चुनाव में SIR और एंटी-इनकंबेंसी के प्रभाव का विश्लेषण

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (West Bengal Assembly Elections) में इस बार 'SIR + एंटी इनकंबेंसी' (SIR + Anti-Incumbency) का प्रभाव निर्णायक साबित हो सकता है। हाल ही में एनडीटीवी (NDTV) के 'नंबर गेम' शो में चुनावी विश्लेषकों ने इस जटिल समीकरण पर गहन चर्चा की, जिसमें यह जानने का प्रयास किया गया कि क्या ये दोनों कारक राज्य की राजनीतिक तस्वीर बदल सकते हैं। शो के दौरान सीईओ और एडिटर इन चीफ राहुल कंवल ने विशेषज्ञों के साथ मिलकर इन पहलुओं पर प्रकाश डाला, जो आगामी चुनाव परिणामों पर गहरा असर डाल सकते हैं।

बंगाल चुनाव: SIR और एंटी-इनकंबेंसी का जटिल समीकरण

विशेष सारांश पुनरीक्षण (Special Summary Revision - SIR) के तहत पश्चिम बंगाल में 11.6 फीसदी यानी 89 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट (Voter List) से हटाए गए हैं। चुनावी विश्लेषकों ने इस प्रक्रिया को आवश्यक बताया, क्योंकि इसका उद्देश्य मृत मतदाताओं, फर्जी मतदाताओं और बाहर से आए लोगों के नाम हटाना था। हालांकि, इसके प्रभाव को लेकर विशेषज्ञों की राय अलग-अलग दिखी। एनडीटीवी की मैनेजिंग एडिटर पद्मजा जोशी ने बताया कि सबसे ज्यादा नाम मुस्लिम बहुल इलाकों से कटे हैं, जिससे इन क्षेत्रों में काफी नाराजगी है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि इन इलाकों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की पकड़ कमजोर है। 2021 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने मुर्शिदाबाद में 2 और उत्तरी 24 परगना में 3 सीटें जीती थीं, इसलिए यह कहना मुश्किल है कि SIR से बीजेपी को इन क्षेत्रों में बड़ा फायदा मिलेगा। उत्तरी 24 परगना में मतुआ समुदाय (Matua Community) के 30 फीसदी वोट हैं, जिन्होंने पहले बीजेपी को वोट दिया था, लेकिन इस बार उनका रुख देखना दिलचस्प होगा।

वरिष्ठ पत्रकार सतीश के. सिंह ने मौजूदा चुनाव को 'जादुई और असाधारण' बताते हुए कहा कि आजकल के चुनावों के नतीजे चमत्कारी होते हैं। उनके अनुसार, ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) को कड़ी टक्कर मिलेगी और एंटी-इनकंबेंसी (Anti-Incumbency) का प्रभाव भी है, लेकिन वे अभी भी आगे नजर आती हैं। वहीं, वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता ने SIR को जरूरी बताया, ताकि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित की जा सके।

वोट वाइब (Vote Vibe) के संस्थापक अमिताभ तिवारी ने SIR के प्रभाव पर गहराई से विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि केवल SIR की वजह से बीजेपी चुनाव जीत जाएगी, ऐसा नहीं लगता। 2021 के चुनावों की तुलना में इस बार 52 लाख वोटर कम हुए हैं। औसत देखें तो हर सीट पर लगभग साढ़े 17 हजार वोट कम हुए हैं। पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) का औसत जीत का अंतर 33 हजार था। ऐसे में, कटे हुए वोटों को हटा भी दिया जाए तो टीएमसी अभी भी आगे दिखती है। तिवारी ने स्पष्ट किया कि बीजेपी को अगर बढ़त लेनी है, तो उसे टीएमसी के वोट बैंक में सेंध लगानी ही होगी, क्योंकि सिर्फ SIR किसी पार्टी को जीत नहीं दिला सकता।

राहुल कंवल के नंबर गेम: एंटी-इनकंबेंसी का निर्णायक रोल

एनडीटीवी के सीईओ राहुल कंवल ने दो महत्वपूर्ण समीकरण प्रस्तुत किए, जो एंटी-इनकंबेंसी के संभावित प्रभाव को दर्शाते हैं। पहले समीकरण में, यदि यह मान लिया जाए कि SIR में टीएमसी के 70 प्रतिशत और बीजेपी के 30 प्रतिशत वोट कटे हैं, और इसके साथ ममता बनर्जी को एंटी-इनकंबेंसी के कारण डेढ़ प्रतिशत वोटों का घाटा होता है, तो तस्वीर क्या हो सकती है? इस स्थिति में, 42 सीटें प्रभावित होंगी, जिनमें से 2021 में बीजेपी 39 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी। यदि बीजेपी की पिछली 77 जीती सीटों और इन 39 सीटों को जोड़ा जाए, तो संभावित जीत का आंकड़ा 116 बनता है, जो बहुमत के 147 से काफी पीछे है।

हालांकि, दूसरे समीकरण में, यदि एंटी-इनकंबेंसी वोटों का नुकसान बढ़कर 3 प्रतिशत हो जाता है, तो प्रभावित सीटों की संख्या 92 हो जाती है। इनमें से 77 सीटों पर बीजेपी पिछले चुनाव में रनर-अप रही थी। बीजेपी की जीती हुई 77 सीटें और इन 77 सीटों को मिलाकर कुल आंकड़ा 154 तक पहुंच जाता है, जो बहुमत के 147 से ऊपर निकल जाता है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि बीजेपी को टीएमसी पर बढ़त बनाने के लिए यह उम्मीद करनी होगी कि एंटी-इनकंबेंसी के कारण ज्यादा से ज्यादा वोट ममता बनर्जी से छिटक जाएं, तभी चुनावी तस्वीर उनके पक्ष में बन सकती है।

विशेषज्ञों का आकलन: क्या कहती है भविष्य की रणनीति?

सीएसडीएस (CSDS) के संजय कुमार ने कहा कि SIR के प्रभाव की तुलना 2021 के विधानसभा चुनाव से ही होनी चाहिए, न कि लोकसभा चुनाव से। उनका अनुमान है कि यदि SIR में टीएमसी के 80 नहीं बल्कि 75 फीसदी वोट भी कटे हैं, तब भी टीएमसी की बढ़त बनी रह सकती है। यह विश्लेषण इस बात पर जोर देता है कि SIR एक अहम कारक है, लेकिन यह अपने आप में निर्णायक नहीं है। बीजेपी को अगर सत्ता तक पहुंचना है, तो उसे टीएमसी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने और एंटी-इनकंबेंसी को अपने पक्ष में भुनाने के लिए एक मजबूत रणनीति बनानी होगी। केवल वोटर लिस्ट से नाम हटने भर से किसी पार्टी को स्पष्ट लाभ नहीं मिल सकता, जब तक कि वह मतदाताओं के बीच अपनी पैठ न बना ले।

कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल चुनाव में SIR और एंटी-इनकंबेंसी दोनों ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। SIR ने मतदाता सूची को शुद्ध करने का काम किया है, लेकिन इसका सीधा चुनावी लाभ किस पार्टी को मिलेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। वहीं, एंटी-इनकंबेंसी की लहर कितनी मजबूत होगी और वह कितने वोटों को ममता बनर्जी से दूर कर पाएगी, यही चुनाव का सबसे बड़ा 'गेम चेंजर' साबित हो सकता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि ये दोनों कारक किस तरह से मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित करते हैं और पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक नई दिशा देते हैं।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

एक टिप्पणी भेजें