ईरान-अमेरिका सीजफायर: पाकिस्तान की मध्यस्थता पर उठे सवाल, रिपोर्ट में अमेरिकी दबाव का खुलासा

Iran America Ceasefire mein Pakistan par America ka dabav

हाल ही में एक सनसनीखेज रिपोर्ट ने ईरान और अमेरिका के बीच हुए अस्थायी युद्धविराम (temporary ceasefire) में पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लंबे समय से पाकिस्तान यह दावा करता रहा है कि उसने अपनी स्वतंत्र कूटनीति (independent diplomacy) के दम पर दोनों देशों के बीच तनाव कम किया और ईरान-अमेरिका सीजफायर को संभव बनाया। लेकिन अब यह सामने आया है कि यह पहल उसकी अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि अमेरिका के भारी दबाव का नतीजा थी। इस खुलासे ने पाकिस्तान की वैश्विक मध्यस्थता की छवि को गहरा धक्का पहुंचाया है और यह समझने के लिए मजबूर किया है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पर्दे के पीछे क्या चल रहा होता है।

पाकिस्तान ने खुद को अमेरिका और ईरान के बीच 'सरपंच' (peacemaker) के रूप में पेश किया था, यह जताते हुए कि उसकी मध्यस्थता और कूटनीति से ही युद्ध पर विराम लग पाया। हालांकि, 'फाइनेंशियल टाइम्स' (Financial Times) की एक रिपोर्ट ने इस दावे की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने ही इस्लामाबाद पर दबाव बनाया था कि वह किसी भी तरह ईरान से अस्थायी युद्धविराम (temporary ceasefire) कराए। अमेरिका के इस कदम के पीछे तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि (soaring oil prices) और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति (global energy supply) की स्थिरता को लेकर गहरा डर था।

दरअसल, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने अपनी कूटनीतिक सूझबूझ से यह काम नहीं किया, बल्कि अमेरिका के 'रट्टू तोता' (parrot) की तरह काम किया। अमेरिका ने जो निर्देश दिए, पाकिस्तान ने केवल उनका पालन किया। रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिकी दबाव का मुख्य मकसद ईरान को लड़ाई रोकने और तेल परिवहन के बेहद अहम वैश्विक मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने के लिए राजी करना था।

पाकिस्तान ने इस प्रक्रिया में मुख्य रूप से अमेरिकी संदेशों को ईरान तक पहुंचाने का काम किया। उसकी भूमिका तेहरान को ऐसे प्रस्ताव देना था जो ईरानी नेतृत्व के लिए अधिक स्वीकार्य लगें, खासकर इसलिए क्योंकि ये प्रस्ताव एक मुस्लिम बहुल देश (Muslim majority country) की ओर से पेश किए जा रहे थे। इस प्रकार, पाकिस्तान की भागीदारी शांति की शर्तों को तय करने से अधिक, अमेरिका द्वारा तैयार किए गए संदेश को संप्रेषित करने तक सीमित थी। इस व्यवस्था ने अमेरिका को सीधे टकराव से बचते हुए भी संवेदनशील मोड़ पर दबाव बनाए रखने में मदद की।

पाकिस्तान की मध्यस्थता: स्वतंत्र पहल या अमेरिकी दबाव?

यह रिपोर्ट पाकिस्तान की स्वतंत्र कूटनीतिक स्थिति पर गंभीर सवाल उठाती है। इससे स्पष्ट होता है कि इस्लामाबाद एक तटस्थ मध्यस्थ (neutral mediator) नहीं था, बल्कि वाशिंगटन (Washington) के लिए अस्थायी युद्धविराम समझौता (temporary ceasefire agreement) आगे बढ़ाने का एक सुविधाजनक चैनल (convenient channel) मात्र था। जब अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपना रुख कड़ा किया, तो इस्लामाबाद ने तेजी से खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश किया, लेकिन उसके प्रस्ताव ज्यादातर अमेरिकी रणनीतिक हितों (US strategic interests) के अनुरूप थे, न कि कोई स्वतंत्र या संतुलित शांति पहल।

पर्दे के पीछे का अमेरिकी दबाव और मुनीर की भूमिका

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने पहले दो सप्ताह के युद्धविराम की घोषणा की थी और ईरान के प्रस्ताव को वार्ता के लिए व्यावहारिक आधार बताया था। लेकिन हकीकत यह थी कि वाशिंगटन कई हफ्तों से इस्लामाबाद पर युद्धविराम सुनिश्चित करने के लिए दबाव डाल रहा था।

मुनीर की बैकचैनल कूटनीति

पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर (Field Marshal Asim Munir) ने इस बैकचैनल कूटनीति (backchannel diplomacy) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ (Steve Witkoff) सहित कई वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों से बातचीत की। पाकिस्तान ने सार्वजनिक रूप से खुद को तटस्थ शांति निर्माता (neutral peacemaker) के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार उसकी भूमिका सीमित थी – वह समझौते की शर्तें तय करने के बजाय अमेरिकी प्रस्तावों को पहुंचाने का माध्यम था। इस्लामाबाद ने कथित तौर पर अमेरिका द्वारा तैयार की गई रूपरेखा (framework) साझा की, ईरान की प्रतिक्रियाएं अमेरिका तक पहुंचाईं और युद्धविराम की समयसीमा (ceasefire timeline) पर चर्चा की। इस घटनाक्रम से पाकिस्तान की कूटनीतिक विश्वसनीयता पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।

संक्षेप में, ईरान-अमेरिका के बीच अस्थायी सीजफायर में पाकिस्तान की भूमिका स्वतंत्र कूटनीति का प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि अमेरिकी दबाव का परिणाम थी। यह खुलासा पाकिस्तान के उन दावों को खारिज करता है जिसमें वह खुद को एक शक्तिशाली वैश्विक मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। यह घटना भविष्य में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है और यह संकेत देती है कि कुछ देशों की 'स्वतंत्र' विदेश नीति अक्सर बड़ी शक्तियों के रणनीतिक हितों से प्रभावित होती है।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

एक टिप्पणी भेजें