भारत के अपर्याप्त रणनीतिक पेट्रोलियम व गैस रिजर्व: ऊर्जा सुरक्षा पर मंडराता खतरा

India's limited strategic petroleum and gas reserves compared to global powers, highlighting energy security concerns and rising fuel prices.

पिछले हफ्ते, केंद्र सरकार ने चार साल बाद पेट्रोलियम उत्पादों (petroleum products) की खुदरा कीमतें बढ़ाईं, जिसका अनुमान पहले से था। कच्चे तेल (crude oil) की बढ़ती कीमतों और तेल मार्केटिंग कंपनियों (Oil Marketing Companies - OMCs) को हो रहे घाटे की चेतावनियों के बीच, पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद यह कदम उठाया गया। हालांकि, विदेशी मुद्रा (foreign exchange) के बढ़ते खर्च, रुपये के तीव्र अवमूल्यन (rupee devaluation) और बढ़ती मुद्रास्फीति (inflation) के मद्देनजर प्रधानमंत्री द्वारा की गई किफायत बरतने की अपील एक गहरी समस्या की ओर इशारा करती है, जिसे भारत दशकों पहले अपने अपर्याप्त रणनीतिक पेट्रोलियम व गैस रिजर्व बनाकर हल कर सकता था। यह सिर्फ तात्कालिक वित्तीय दबाव का मामला नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा (energy security) और रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा है, जिसका सीधा असर आम नागरिक की जेब और देश की अर्थव्यवस्था (economy) पर पड़ता है।

भारत के अपर्याप्त रणनीतिक पेट्रोलियम व गैस रिजर्व: एक गंभीर चुनौती

भारत ने 1991 के खाड़ी युद्ध (Gulf War) के बाद महसूस किए गए जोखिम से सबक लेते हुए, 2000 के दशक की शुरुआत में रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (Strategic Petroleum Reserve - SPR) कार्यक्रम की परिकल्पना की। इसके तहत लगभग 36.7 मिलियन से 39 मिलियन बैरल का भंडार बनाया गया। लेकिन, आज 5.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन (MBPD) की दर से यह रिजर्व मुश्किल से सात दिनों की खपत को ही पूरा कर पाता है। यदि इसमें तेल विपणन कंपनियों (OMCs) की वाणिज्यिक इन्वेंट्री (commercial inventory) और आयात कवर (import cover) को भी जोड़ लिया जाए, तो यह कुल 70 दिन से अधिक का स्टॉक बनता है। हालांकि, दुनिया के तीसरे सबसे बड़े वाहन बाजार (third largest vehicle market) के रूप में भारत की स्थिति को देखते हुए, यह भंडार अमेरिका (USA) और चीन (China) जैसे देशों की तुलना में काफी कम है।

अमेरिका ने 1973 के तेल संकट (oil crisis) के बाद अपना एसपीआर (SPR) बनाया, जिसकी क्षमता 714 मिलियन बैरल है, जो भारत के भंडार से 18 गुना अधिक है। चीन का भंडार और भी विशाल है, जो लगभग 900 मिलियन बैरल तक पहुंचता है। आज भी, अमेरिका के पास अपने रिजर्व तंत्र में लगभग 400 मिलियन बैरल तेल है, जो मोटे तौर पर 20 दिनों की खपत को पूरा कर सकता है। इसके अलावा, अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक (largest oil producer) है और उसके वाणिज्यिक तंत्र में भी पर्याप्त इन्वेंट्री है, जो उसे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (International Energy Agency - IEA) द्वारा अनुशंसित 90 दिन के भंडार से कहीं ऊपर ले जाती है। चीन भी, जो तेल के मामले में भारत की तरह आयात-निर्भर (import-dependent) है, उसने अपने रणनीतिक भंडार को मजबूत किया है। यह तुलना भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा के बड़े जोखिम को उजागर करती है।

एलपीजी और एलएनजी: भारत की सबसे बड़ी कमजोरी

रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व की तुलना में, तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (Liquefied Petroleum Gas - LPG) और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (Liquefied Natural Gas - LNG) के मामले में भारत की स्थिति और भी चिंताजनक है। भारत के पास लगभग 1.4 लाख टन की एलपीजी भंडारण सुविधा (LPG storage facility) है, जबकि उसकी दैनिक खपत लगभग 80,000 टन है, यानी उसकी रिजर्व क्षमता उसकी दैनिक खपत के आधे से थोड़ी अधिक है। एलएनजी की बात करें तो, भारत मुख्य रूप से पेट्रोनेट एलएनजी (Petronet LNG) और बीपीसीएल (BPCL) जैसी कंपनियों की रीगैसीफिकेशन सुविधाओं (regasification facilities) पर मौजूद स्टॉक पर निर्भर करता है। उर्वरक उत्पादन (fertilizer production) जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए बेहद अहम इस ईंधन के लिए देश में कोई भूमिगत भंडारण सुविधा (underground storage facility) मौजूद नहीं है। इसके विपरीत, अमेरिका और चीन दोनों ने भूमिगत एलएनजी भंडारण सुविधाओं में भारी निवेश किया है, जिससे वे आपूर्ति में व्यवधान (supply disruptions) के समय अधिक लचीलेपन (flexibility) का प्रदर्शन कर पाते हैं।

वैश्विक घटनाक्रमों से सबक और आगे की राह

हाल के वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia-Ukraine war) जैसे वैश्विक घटनाक्रमों ने ऊर्जा सुरक्षा के महत्व को रेखांकित किया है। यूरोपीय संघ (European Union) ने रूसी गैस पर अपनी निर्भरता कम करते हुए तेजी से नई स्थितियों के अनुरूप अनुकूलन किया है। जिन देशों के पास पर्याप्त रणनीतिक रिजर्व थे, वे आपूर्ति में व्यवधान के खिलाफ एक मजबूत बाड़बंदी (hedging) करने में सक्षम रहे हैं। इन भंडारों ने उन्हें हाजिर बाजार (spot market) में ऊंची कीमतें चुकाने से बचाया है और दीर्घकालिक अनुबंधों (long-term contracts) पर निर्भरता बनाए रखने में मदद की है। उदाहरण के लिए, अमेरिकी प्रतिबंधों (US sanctions) के बावजूद रूसी तेल खरीदने का चीन को अच्छा फायदा हुआ, क्योंकि उसके पास पर्याप्त रणनीतिक स्वायत्तता थी। यदि भारत ने भी अपने रणनीतिक भंडार को मजबूत किया होता, तो उसे भी ऐसे वैश्विक झटकों से निपटने में अधिक फायदा मिलता। प्रधानमंत्री की किफायत बरतने की अपील सिर्फ एक अल्पकालिक उपाय है, जबकि भारत के अपर्याप्त रणनीतिक पेट्रोलियम व गैस रिजर्व एक दीर्घकालिक और संरचनात्मक समस्या है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।

भारत को अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता (geopolitical instability) को देखते हुए अपने रणनीतिक पेट्रोलियम और गैस रिजर्व को बढ़ाने पर गंभीरता से विचार करना होगा। यह कदम न केवल भविष्य में ईंधन की कीमतों में होने वाली अप्रत्याशित वृद्धि से देश को बचाएगा, बल्कि राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा को भी सुनिश्चित करेगा। पर्याप्त भंडार देश को वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं से निपटने और एक मजबूत रणनीतिक स्थिति बनाए रखने में मदद करेगा, जिससे आर्थिक स्थिरता और विकास को बढ़ावा मिलेगा।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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