ईरान संकट में BRICS की भूमिका: भारत की कूटनीति, रूस का साथ और ईरान का बदलता रुख

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मध्य पूर्व में जारी ईरान संकट (Iran Crisis) और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसके संभावित गंभीर प्रभावों के बीच, हाल ही में दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मंच के रूप में उभरा है। इस सम्मेलन ने न केवल वैश्विक भू-राजनीति में उभरते समीकरणों को उजागर किया, बल्कि ईरान संकट में BRICS की भूमिका और भारत की रणनीतिक चालों को भी स्पष्ट किया। जहां एक ओर भारत ने अपने पुराने मित्र रूस से अपनी ऊर्जा जरूरतों की गारंटी ली, वहीं दूसरी ओर ईरान के बदले हुए रुख ने भारतीय कूटनीति की सफलता को दर्शाया। यह घटनाक्रम आम नागरिकों के लिए तेल की कीमतों और देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।

ब्रिक्स मंच पर भारत-रूस की 'फौलादी' दोस्ती

दिल्ली में ब्रिक्स बैठक के दौरान रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भारत को यह गारंटी दी कि उसकी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस के तेल की आपूर्ति बाधित नहीं होगी। लावरोव के इन शब्दों ने 'हिंदी-रूसी, भाई-भाई' की पुरानी भावना को एक बार फिर मजबूत किया। रूस ने लगातार ईरान के होर्मुज की घेराबंदी जैसे वर्तमान संकट में भारत का साथ दिया है। मार्च में रूस ने भारत को प्रतिदिन लगभग 36 करोड़ लीटर तेल का निर्यात किया, जो मई में दोबारा बढ़कर इसी स्तर पर पहुंच गया है, भले ही अप्रैल में कुछ तकनीकी खराबी के कारण इसमें अस्थायी गिरावट आई थी।

यह आपूर्ति भारत के लिए कई मायनों में फायदेमंद है। रूसी तेल होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) के रास्ते नहीं आता, जिससे आपूर्ति की निरंतरता बनी रहती है और अरब देशों पर हमारी निर्भरता कम होती है। मई के पहले दो हफ्तों में भारत की कुल तेल खपत का 50 प्रतिशत हिस्सा रूस से आया, जिसने घरेलू बाजार में तेल की कीमतों को स्थिर रखने में मदद की है। ब्रिक्स मीटिंग के दौरान भारत और रूस ने अपनी दोस्ती को 'स्पेशल एंड प्रिविलेज्ड स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप' (Special and Privileged Strategic Partnership) का नया नाम दिया है। दोनों देशों ने अगले चार सालों में 9 लाख 57 हजार 300 करोड़ रुपए के व्यापार का लक्ष्य रखा है, जिसमें अमेरिकी डॉलर (US Dollar) पर निर्भरता कम करने के लिए रुपए और रूबल (Rupee and Ruble) को प्राथमिकता दी जाएगी। रूस ने भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौता (Free Trade Agreement - FTA) और पांचवीं पीढ़ी के सुखोई-57 फाइटर जेट (Sukhoi-57 Fighter Jet) की पेशकश भी की है, जिससे 'मेक इन इंडिया' (Make in India) को बढ़ावा मिलेगा। यह साझेदारी केवल वर्तमान तक सीमित नहीं है; 1991 में सोवियत संघ (Soviet Union) के विघटन के बाद जब रूस आर्थिक संकट में था, तब भारत ने 153 करोड़ रुपए की मानवीय और खाद्यान्न सहायता देकर अपनी दोस्ती का परिचय दिया था।

ईरान का बदलता रुख और भारत की कूटनीतिक जीत

ब्रिक्स सम्मेलन में ईरान के विदेश मंत्री सय्यद अब्बास अराघची की उपस्थिति और होर्मुज से एलपीजी (LPG) गैस जहाजों की निर्बाध आवाजाही की अनुमति देना, ईरान की ओर से एक बड़ा सद्भावना संकेत था। बैठक से पहले ईरान भारत से इजरायल और अमेरिका की निंदा करने की उम्मीद कर रहा था, लेकिन ब्रिक्स मंच पर अराघची ने इस मुद्दे को नहीं उठाया और सिर्फ इजरायली व अमेरिकी हमलों को गलत करार दिया। भारत पर आलोचना के लिए कोई दबाव नहीं बनाया गया।

ब्रिक्स की साइडलाइंस पर भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय वार्ता में भारत ने होर्मुज से स्वतंत्र आवाजाही को बेहद जरूरी बताया, जिस पर ईरान ने भारतीय जहाजों की आवाजाही की व्यवस्था करने का आश्वासन दिया। भारत ने चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) पर लंबित काम को पूरा करने का आग्रह किया, और ईरान ने युद्ध के बावजूद तेजी से काम करने का वादा किया। भारत ने ईरान पर लगाए गए एकतरफा प्रतिबंधों (Unilateral Sanctions) की आलोचना कर ईरान के स्टैंड का समर्थन भी किया। ईरान के रुख में इस बदलाव के पीछे दो मुख्य कारण माने जा रहे हैं: पहला, पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की मध्यस्थता भूमिका पर ईरान का शक; और दूसरा, युद्ध के बाद मानवीय मदद, विशेषकर दवाओं की भारी किल्लत। भारत की पहचान 'फार्मा कैपिटल' (Pharma Capital) के रूप में है, और ईरान जानता है कि दवाओं की आपूर्ति का समाधान भारत ही कर सकता है। आचार्य चाणक्य के अनुसार, राष्ट्र तभी साथ आते हैं जब उन्हें एक-दूसरे की आवश्यकता होती है, और यही आवश्यकता भारत को तेल और ईरान को मानवीय मदद के लिए एक साथ लाई है।

आगे क्या संकेत देती है यह कूटनीति?

यह घटनाक्रम भारतीय कूटनीति के लिए एक बड़ी सफलता को दर्शाता है, जिसने वैश्विक संकट के बीच अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की और महत्वपूर्ण क्षेत्रीय साझेदारों के साथ संबंधों को मजबूत किया। हालांकि, ब्रिक्स समूह के भीतर संयुक्त बयान (Joint Statement) को लेकर अभी भी मतभेद बने हुए हैं। ईरान चाहता है कि बयान में इजरायल और अमेरिका को हमलावर बताया जाए, जबकि यूएई (UAE) ईरान को भी हमलावर कहने पर जोर दे रहा है। इन मतभेदों के कारण ब्रिक्स का साझा बयान जारी करने में मुश्किलें आ सकती हैं।

दीर्घकालिक रूप से, भारत की यह रणनीति वैश्विक ऊर्जा बाजारों में उसकी स्थिति को मजबूत करेगी और मध्य पूर्व में तनाव के बावजूद अपनी आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में मदद करेगी। रूस के साथ मजबूत व्यापारिक और रणनीतिक संबंध, और ईरान के साथ एक संतुलित दृष्टिकोण, भारत को एक विश्वसनीय और स्वतंत्र वैश्विक खिलाड़ी के रूप में स्थापित करते हैं। यह ब्रिक्स समूह के भीतर भी भारत की नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है, जहां वह जटिल भू-राजनीतिक मुद्दों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भविष्य में, ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंच वैश्विक संकटों को नेविगेट करने और सदस्य देशों के हितों की रक्षा करने में और भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं, बशर्ते आंतरिक मतभेदों को प्रभावी ढंग से सुलझाया जा सके।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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