लखीसराय में ANM का 'पति-सेवा' मॉडल: मरीज हैरान, विभाग एक्शन में... परदे के पीछे क्या पक रहा?
भारत में सरकारी नौकरी को अक्सर 'सम्पत्ति' माना जाता है, पर लखीसराय के सहूर गांव में तो एक एएनएम ने इसे सचमुच 'पारिवारिक व्यवसाय' बना डाला। खबर ऐसी आई है कि हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर में पदस्थ एएनएम रूपम रति की ड्यूटी उनके पति पंकज कुमार जी निभा रहे थे! जी हाँ, आपने बिल्कुल ठीक पढ़ा। पंकज कुमार जी न केवल ओपीडी में मरीजों को दवा बांट रहे थे, बल्कि बच्चों को टीके भी लगा रहे थे। शायद ये सरकारी सेवाओं में 'वर्क फ्रॉम होम' का नया और अनोखा मॉडल है, जिसमें बीवी काम पर नहीं, पति 'घर' से सेंटर चला रहा था!
दैनिक जागरण में फोटो और वीडियो सहित यह खबर क्या छपी, स्वास्थ्य विभाग में मानो भूचाल आ गया। प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. वाईके दिवाकर ने तुरंत रूपम रति से 24 घंटे में स्पष्टीकरण मांगा है, और इसे 'गंभीर मामला' बताया है। अरे डॉक्टर साहब, गंभीर तो है ही, बच्चों को अप्रशिक्षित हाथों से सूई लगवाना तो सीधे-सीधे 'हेल्थ लॉटरी' खेलने जैसा है! इस पर हड़कंप मचने में इतनी देर क्यों लग गई, जब मीडिया ने पर्दा नहीं उठाया था?
क्या स्वास्थ्य सेवाओं का 'फैमिली पैकेज' भी मिलता है?
ग्रामीणों का आरोप है कि एएनएम मैडम अक्सर ड्यूटी से गायब रहती थीं, और उनकी जगह 'प्रशिक्षित पति' ही मोर्चा संभाले रहते थे। इम्यूनाइजेशन जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी श्रीमान जी ही करते थे। क्या अब स्वास्थ्य विभाग यह सोचेगा कि पति को भी कम से कम फर्स्ट-एड का डिप्लोमा करवा दिया जाए, ताकि भविष्य में ऐसे 'कठिन' हालात में 'सरकारी काम' बाधित न हो? वैसे, सिविल सर्जन डा. जयप्रकाश सिंह का कहना है कि यह मामला उनके संज्ञान में नहीं था। यह बात भारतीय सरकारी सिस्टम की आत्मा बन चुकी है, जहां सब कुछ 'संज्ञान में तब आता है', जब पानी सिर से ऊपर चला जाए और मीडिया हेडलाइन बन जाए।
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अब विभाग ने मैडम को सभी कार्यों का प्रतिवेदन लेकर स्वयं उपस्थित होने को कहा है। साथ ही चेतावनी भी दी है कि संतोषजनक जवाब न मिलने पर विभागीय कार्रवाई और पति पर FIR तक हो सकती है। यह तो सरासर नाइंसाफी हुई! एक तरफ पतिदेव सरकारी काम में हाथ बंटा रहे थे, और अब उन पर ही कार्रवाई की तलवार लटक रही है। क्या यह 'सरकारी सेवाभाव' का अपमान नहीं?
'यह सिर्फ एक एपिसोड है, ट्रेलर तो अभी बाकी है'
यह घटना सिर्फ एक एएनएम और उनके पति की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे सरकारी स्वास्थ्य सेवा सिस्टम की पोल खोलती है। यह दिखाता है कि ज़मीनी स्तर पर कितनी लापरवाही और जवाबदेही की कमी है। क्या सरकार सच में दूर-दराज के इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना चाहती है, या बस कागजों पर दुरुस्त दिखाकर संतोष कर लेती है? यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि अगर एक हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर में यह हाल है, तो उन जगहों का क्या, जहां तक शायद मीडिया की नज़र भी नहीं पहुंच पाती?
यह सिर्फ एक और 'भारतीय ड्रामा एपिसोड' नहीं है, बल्कि यह एक खतरनाक ट्रेंड की ओर इशारा करता है। जब तक सिस्टम खुद को अंदर से दुरुस्त नहीं करेगा, ऐसी खबरें आती रहेंगी, विभाग 'हड़कंप' मचाता रहेगा, और आम जनता का सरकारी सेवाओं से भरोसा उठता रहेगा। उम्मीद है कि इस एक घटना से सरकारी बाबू सबक लेंगे, वरना कल को कहीं डॉक्टर की जगह उनका बेटा ऑपरेशन करता न मिल जाए, या इंजीनियर की जगह उनकी बेटी पुल का डिज़ाइन पास करती न दिखे!
तो लखीसराय के इस प्रकरण ने हमें सिखाया है कि सरकारी सेवाओं में 'पार्टनरशिप' कभी भी हो सकती है, बस पकड़े जाने पर 'हड़कंप' मचाने के लिए तैयार रहना चाहिए। क्या सरकार इस 'पति-सेवा' मॉडल को बंद करने के लिए कोई नया नियम लाएगी, या फिर इसे भी 'परिवार कल्याण योजना' का हिस्सा मान लिया जाएगा? समय ही बताएगा, लेकिन तब तक ग्रामीण क्षेत्रों के मरीज और बच्चे ईश्वर भरोसे!
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.