रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95 के पार निकला, कच्चे तेल और आयातकों की मांग ने बढ़ाया दबाव

Indian Rupee weakens to all-time low against US Dollar due to crude oil prices and importer demand

रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95 के पार, कच्चे तेल और आयातकों की मांग ने बढ़ाया दबाव

भारतीय रुपया (Indian Rupee) एक बार फिर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे अर्थव्यवस्था पर दबाव साफ दिख रहा है। बुधवार (29 अप्रैल) को 94.85 पर बंद होने के बाद, रुपया गुरुवार को डॉलर के मुकाबले 95.02 पर खुला और शुरुआती कारोबार में 95.26 तक फिसल गया। यह 30 मार्च के बाद पहली बार है जब भारतीय करेंसी (Indian Currency) अमेरिकी डॉलर (US Dollar) के मुकाबले 95 के स्तर को पार कर गई है। इस ताज़ा गिरावट ने आम नागरिकों और व्यापार जगत की चिंताएं बढ़ा दी हैं, क्योंकि इससे आयात महंगा होने और महंगाई बढ़ने की आशंका है।

इस महत्वपूर्ण गिरावट के पीछे कई प्रमुख कारक जिम्मेदार हैं। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल एक बड़ी वजह है। ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) $121 प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है, जो हर हफ्ते लगभग 14% की बढ़त के ट्रैक पर है। भारत अपनी तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, और तेल की ऊंची कीमतें स्वाभाविक रूप से देश के व्यापार घाटे (Trade Deficit) को बढ़ाती हैं और डॉलर की मांग (Dollar Demand) में इज़ाफा करती हैं, जिससे स्थानीय करेंसी (Local Currency) पर दबाव पड़ता है।

इसके साथ ही, आयातकों (Importers) की ओर से डॉलर की लगातार बढ़ती मांग भी रुपये की कमजोरी का एक प्रमुख कारण है। जब आयातक अधिक डॉलर खरीदते हैं, तो बाजार में डॉलर की कमी होती है और उसकी कीमत बढ़ती है, जिससे रुपये का मूल्य घटता है।

रुपये पर दबाव के अन्य प्रमुख कारण और विशेषज्ञ राय

रुपये पर बढ़ते दबाव का एक और महत्वपूर्ण कारण अमेरिकी फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) के कड़े संकेत हैं। फेडरल रिजर्व में नीति निर्माताओं द्वारा दिए गए संकेतों के बाद डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड (US Bond Yields) में वृद्धि हुई है। हालांकि केंद्रीय बैंक (Central Bank) ने नीतिगत दरों (Policy Rates) में कोई बदलाव नहीं किया, लेकिन इस फैसले से 1992 के बाद सबसे ज़्यादा मतभेद दिखे, जिसमें तीन अधिकारियों ने गाइडेंस (Guidance) पर असहमति जताई, जिससे नरमी की ओर झुकाव का संकेत मिलता रहा। मार्केट पार्टिसिपेंट्स (Market Participants) का मानना है कि अमेरिका में ज़्यादा यील्ड और मज़बूत डॉलर के कॉम्बिनेशन (Combination) ने रुपये समेत इमर्जिंग मार्केट करेंसी (Emerging Market Currencies) की अपील कम कर दी है।

विदेशी फंड का लगातार बाहर जाना भी रुपये की कमजोरी में योगदान दे रहा है। नेशनल सिक्योरिटीज़ डिपॉज़िटरी लिमिटेड (NSDL) के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशकों (Foreign Investors) ने 28 अप्रैल को भारतीय इक्विटीज़ (Indian Equities) में नेट $210.7 मिलियन और बॉन्ड (Bonds) में $10.9 मिलियन की बिकवाली की। यह लगातार तीसरा हफ्ता है जब रुपया गिरावट की ओर बढ़ रहा है, जिसने इस महीने की शुरुआत में रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) द्वारा करेंसी मार्केट में सट्टा पोजीशन (Speculative Positions) को रोकने के उपाय शुरू करने के बाद दर्ज की गई ज़्यादातर बढ़त को खत्म कर दिया है। इस बीच, सरकारी रिफाइनर कंपनियों (Government Refiners) ने तेल आयात के लिए स्पॉट डॉलर (Spot Dollar) की खरीद को कम करने के लिए डिज़ाइन की गई एक खास फॉरेन एक्सचेंज क्रेडिट लाइन (Foreign Exchange Credit Line) का इस्तेमाल कम कर दिया है, जिससे बाजार में शॉर्ट-टर्म डॉलर की डिमांड बढ़ गई है। डॉलर इंडेक्स (Dollar Index) 98.91 पर था, जबकि 10-साल के US ट्रेजरी नोट (US Treasury Note) पर यील्ड 4.42% के आसपास थी।

LKP सिक्योरिटीज में कमोडिटी और करेंसी के VP रिसर्च एनालिस्ट (VP Research Analyst) जतीन त्रिवेदी ने कहा कि तेल की ऊंची कीमतें भारत के आयात बिल (Import Bill) और महंगाई के जोखिम (Inflation Risk) को काफी बढ़ा रही हैं, जिससे रुपये में कोई खास रिकवरी नहीं हो पा रही है। उन्होंने कहा कि ट्रेंड कमजोर बना हुआ है, करेंसी पर लगातार रिबाउंड पर बिकवाली का दबाव है, जो ऊंचे लेवल पर मजबूत सपोर्ट (Support) की कमी दिखाता है। फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स LLP के ट्रेजरी हेड और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर (Treasury Head and Executive Director) अनिल कुमार भंसाली ने भी तेल की बढ़ती कीमतों और FPI (Foreign Portfolio Investors) के लगातार बाहर निकलने को रुपये की गिरावट का प्रमुख कारण बताया।

आगे की राह: चुनौतियां और संभावनाएं

रुपये का यह रिकॉर्ड निचला स्तर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कई चुनौतियां पेश करता है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और रुपये की कमजोरी मिलकर आयातित वस्तुओं को और महंगा कर देंगी, जिससे आम आदमी पर महंगाई का बोझ बढ़ेगा। इससे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पर ब्याज दरों (Interest Rates) को बढ़ाने का दबाव भी बढ़ सकता है, ताकि महंगाई को नियंत्रित किया जा सके। हालांकि, ब्याज दरों में वृद्धि आर्थिक विकास (Economic Growth) को धीमा कर सकती है। वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर की मजबूती और फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति (Monetary Policy) का रुख रुपये की चाल को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। सरकार और आरबीआई को रुपये को स्थिर करने और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए सावधानीपूर्वक कदम उठाने होंगे। अल्पकालिक (Short-term) में, रुपये में अस्थिरता (Volatility) बनी रहने की संभावना है, जबकि दीर्घकालिक (Long-term) सुधार वैश्विक आर्थिक स्थिति और घरेलू नीतियों पर निर्भर करेगा।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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