डिजिटल डिटॉक्स: गर्मियों की छुट्टियों में बच्चों को गैजेट्स की लत से कैसे बचाएं, विशेषज्ञ सलाह और पैरेंटिंग टिप्स

गर्मियों की छुट्टियों में बच्चों को गैजेट्स की लत से बचाने और डिजिटल डिटॉक्स के लिए प्रभावी पैरेंटिंग टिप्स

गर्मियों की छुट्टियां चल रही हैं, और इस दौरान बच्चों का गैजेट्स (gadgets) के साथ अधिक समय बिताना एक आम समस्या बन गया है। यह सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि उनकी आदतों और व्यवहार पर गहरा असर डाल रहा है। ऐसे में डिजिटल डिटॉक्स (digital detox) बच्चों के लिए बेहद ज़रूरी हो गया है। अभिभावकों के सामने यह चुनौती है कि वे कैसे इन छुट्टियों में अपने बच्चों की डिजिटल लत को खत्म करें, उनके मूड में सकारात्मक बदलाव लाएं और उनमें नई रुचियों का संचार करें। बदलते समय में, बच्चों की ज़रूरतों को समझना और उनके व्यवहार में सुधार लाना एक महत्वपूर्ण पैरेंटिंग (parenting) कार्य है।

बच्चों पर गैजेट्स की लत का गहराता असर: विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट (Clinical Psychologist) सोनी जैन बताती हैं कि आजकल बच्चे मोबाइल (mobile) की लत के इस कदर शिकार हो गए हैं कि उन्हें जागते-सोते मोबाइल चाहिए। कई बच्चे तो 10-10 घंटे तक भी मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में अगर उनका मोबाइल छीन लिया जाता है, तो उनका स्वभाव बदल जाता है और वे कई बार आक्रामक (aggressive) रूप भी ले लेते हैं। ऐसी दुखद घटनाएं भी सामने आई हैं, जब माता-पिता ने बच्चों का मोबाइल लेने की कोशिश की या उन्हें डांटा, तो बच्चों ने आत्मघाती कदम उठाने की कोशिश की।

मनोवैज्ञानिक यह भी बताती हैं कि बच्चों में सिर्फ मोबाइल एडिक्शन (mobile addiction) ही नहीं, बल्कि गेमिंग एडिक्शन (gaming addiction) और टीनएजर्स (teenagers) में पोर्नोग्राफी (pornography) का एडिक्शन भी बढ़ रहा है, जिससे उनका व्यवहार (behavior) तेज़ी से बदल रहा है। इस व्यवहार परिवर्तन के मूल को समझने के लिए, हमें उनके ब्रेन (brain) की कार्यप्रणाली को जानना होगा। सोनी जैन के अनुसार, हमारे ब्रेन के दो मुख्य हिस्से होते हैं - इमोशनल ब्रेन (emotional brain) और लॉजिकल ब्रेन (logical brain)। लॉजिकल ब्रेन लगभग 25-26 साल तक पूरी तरह विकसित होता है, जबकि इमोशनल ब्रेन सबसे पहले विकसित होता है। बच्चों का व्यवहार उनके इमोशन (emotion) से संचालित होता है। इसलिए, उन्हें समझाने के बजाय, उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ना ज़्यादा प्रभावी होता है।

अक्सर, जब बच्चे घर में अकेले होते हैं, तो वे अकेलेपन को दूर करने के लिए गैजेट्स का सहारा लेते हैं, और धीरे-धीरे यह आदत लत में बदल जाती है। एक बार लत लग जाने पर, इसे छुड़ाना आसान नहीं होता और यह एक गंभीर समस्या बन जाती है। दूसरा प्रमुख कारण शारीरिक गतिविधियों (physical activities) की कमी है। जब बच्चे खेल-कूद जैसी एक्टिविटीज (activities) में हिस्सा नहीं लेते, तो उनके सामने व्यवहार संबंधी समस्याएं आना स्वाभाविक है। सोनी जैन मानती हैं कि बच्चे देखकर सीखते हैं। यदि परिवार में कोई अन्य सदस्य भी किसी चीज़ का अत्यधिक इस्तेमाल करता है, तो उसका बच्चों पर सीधा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में, यदि समस्या गंभीर हो, तो किसी मनोवैज्ञानिक (psychologist) या मनोचिकित्सक (psychiatrist) से सलाह लेना और बच्चे के व्यवहार के विषय में खुलकर बात करना ज़रूरी है।

पैरेंटिंग के ज़रूरी टिप्स: बच्चों को समय दें और उनकी रुचियों को पहचानें

लाला लाजपत राय स्मारक मेडिकल कॉलेज (Lala Lajpat Rai Smarak Medical College) के मनोचिकित्सा विभाग (Psychiatry Department) में तैनात मनोचिकित्सक डॉ. तरुण पाल ने ईटीवी भारत (ETV Bharat) से बात करते हुए बताया कि छुट्टियों के मौसम में माता-पिता अक्सर बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते हैं, खासकर जब वे नौकरीपेशा होते हैं। समय की कमी के कारण बच्चे गैजेट्स के करीब पहुंच जाते हैं। छुट्टियों का मतलब यह होना चाहिए कि बच्चों को परिवार के सदस्य बाहर घुमाने ले जाएं, जिससे उन्हें गैजेट्स से दूर रहने का मौका मिले और यह आदत धीरे-धीरे छूट सके।

पहले के समय में, छुट्टियों में बच्चे अपने नाना-नानी या दादा-दादी के पास जाते थे। इससे उनका व्यवहार बदलता था, वे अन्य बच्चों से मिलते थे, उनमें रचनात्मकता (creativity) आती थी और वे अलग-अलग गतिविधियों में शामिल होते थे। डॉ. पाल सलाह देते हैं कि माता-पिता या अभिभावकों को सबसे पहले अपना स्क्रीन टाइम (screen time) घटाना होगा। बच्चों के साथ समय गुजारें और यह जानने की कोशिश करें कि उन्हें क्या पसंद है, किस खेल या एक्टिविटी में उनकी रुचि है। उसी के अनुसार उन्हें रचनात्मक कार्यों में रमने दें। अगर बच्चों को पेंटिंग (painting), म्यूजिक (music) या डांसिंग (dancing) का शौक है, तो उन्हें प्रेरित करें और इन रुचियों को निखारने के लिए संसाधन (resources) उपलब्ध कराएं। इस तरह की विभिन्न गतिविधियों से बच्चों का शारीरिक (physical), मानसिक (mental) विकास होगा और उनमें आत्मविश्वास (self-confidence) बढ़ेगा, साथ ही उनका बौद्धिक विकास (intellectual development) भी होगा।

छुट्टियों में बच्चों को बाहर घुमाने लेकर जाएं। इससे उन्हें देश-समाज में क्या कुछ हो रहा है, इसकी जानकारी मिलेगी, क्योंकि बच्चे देखकर बहुत कुछ सीखते हैं। नई चीजें देखने से उनकी जिज्ञासा (curiosity) बढ़ती है, वे सवाल पूछते हैं और उनकी सोचने-समझने की क्षमता (cognitive ability) भी बढ़ती है। सभ्यता और संस्कृति (culture) के बारे में भी उनकी समझ विकसित होती है। माता-पिता को इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि सोने से कम से कम 2 घंटे पहले मोबाइल फोन (mobile phone) या अन्य गैजेट्स का उपयोग बंद कर दें। इसी प्रकार, सुबह उठने के तुरंत बाद भी गैजेट्स से दूर रहना बेहतर होगा। इन छोटे-छोटे प्रयासों से बच्चों के व्यवहार में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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