ग्रेट निकोबार परियोजना: क्या यह रणनीतिक अनिवार्यता है या पर्यावरण के लिए खतरा? रक्षा मंत्रालय ने दिया जवाब

Great Nicobar Island rainforest and transshipment port project conflict भारत के सुदूर दक्षिणी छोर पर स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप समूह इस समय एक बड़े राजनीतिक और पर्यावरण संबंधी विवाद के केंद्र में है। केंद्र सरकार ने लगभग 81,000 करोड़ रुपये की 'ग्रेट निकोबार परियोजना' (Great Nicobar Project) को लेकर उठ रही चिंताओं पर अपना रुख स्पष्ट किया है। रक्षा मंत्रालय (Ministry of Defence) के शीर्ष सूत्रों ने इस महत्वाकांक्षी पहल को भारत की एक रणनीतिक अनिवार्यता (Strategic Imperative) बताया है। मंत्रालय का तर्क है कि इस परियोजना की आलोचना "भौगोलिक समझ की कमी" के कारण हो रही है, जबकि यह क्षेत्र देश की सुरक्षा और समुद्री व्यापार के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

ग्रेट निकोबार परियोजना: रणनीतिक अनिवार्यता और सरकार का पक्ष

सरकार के अनुसार, ग्रेट निकोबार में एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (Transshipment Port) और लॉजिस्टिक्स हब (Logistics Hub) विकसित करना केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी अनिवार्य है। हिंद महासागर में वैश्विक व्यापार मार्गों पर नजर रखने और चीन की बढ़ती सक्रियता को संतुलित करने के लिए इस द्वीप का विकास एक सैन्य और वाणिज्यिक आधार (Military and Commercial Base) प्रदान करेगा। 

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारत के दीर्घकालिक लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। हाल ही में, कांग्रेस नेता राहुल गांधी के अंडमान और निकोबार दौरे के बाद इस बहस ने नया मोड़ ले लिया है। राहुल गांधी ने पर्यावरणविदों की उन चिंताओं को दोहराया है जो अद्वितीय वन्यजीवों और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (Marine Ecosystem) के संभावित विनाश की चेतावनी दे रहे हैं। केंद्र सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि परियोजना का खाका सभी आवश्यक सुरक्षा मानकों और राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (National Green Tribunal) की मंजूरी के बाद ही तैयार किया गया है।

राहुल गांधी का विरोध और पर्यावरण संबंधी आपत्तियां

विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस परियोजना के पीछे के उद्देश्यों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा मानने से इनकार करते हुए इसे एक "झूठ" करार दिया है। गांधी का आरोप है कि 160 वर्ग किलोमीटर में फैले वर्षावन (Rainforest) और "याद से भी पुराने" पेड़ों को केवल एक उद्योगपति को फायदा पहुंचाने के लिए काटा जा रहा है। उन्होंने अंदेशा जताया है कि इस बेशकीमती इकोलॉजिकल जमीन का इस्तेमाल होटल और कसीनो (Casinos) बनाने के लिए किया जा सकता है। 

विरोध को और तेज करते हुए राहुल गांधी ने 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर एक ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान (Online Signature Campaign) भी शुरू किया है। उनका तर्क है कि यह परियोजना न केवल प्रकृति का विनाश करेगी, बल्कि वहां पीढ़ियों से रह रहे स्वदेशी समुदायों के अधिकारों का भी हनन करेगी। इससे पहले सोनिया गांधी ने भी क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता (Biodiversity) का हवाला देते हुए केंद्र सरकार से इस योजना पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था।

रणनीतिक विकास बनाम पारिस्थितिक संतुलन: भविष्य की राह

यह संघर्ष दो बड़े विचारधाराओं के बीच का है—एक जो आर्थिक विकास और सीमा सुरक्षा (Border Security) को प्राथमिकता देती है, और दूसरी जो पर्यावरणीय स्थिरता (Environmental Sustainability) को अनिवार्य मानती है। ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के प्रवेश द्वार के पास है, जो इसे वैश्विक नौवहन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है। यदि भारत यहां अपनी उपस्थिति मजबूत नहीं करता है, तो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन (Regional Balance of Power) में गिरावट आ सकती है। 

हालांकि, पर्यावरणविदों का कहना है कि विकास की कीमत पर ऐसे वर्षावनों का विनाश करना, जो ग्लोबल वार्मिंग के दौर में कार्बन सोखने का काम करते हैं, आत्मघाती साबित हो सकता है। सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यह साबित करने की होगी कि वह किस प्रकार सुरक्षा और पारिस्थितिकी (Ecology) के बीच एक बारीक संतुलन बनाने में सक्षम है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार तकनीकी सुधारों के जरिए इन चिंताओं को शांत कर पाती है या विरोध का यह स्वर परियोजना की गति को धीमा कर देगा।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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