चेन्नई: भारत में महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों (critical and strategic minerals) की खोज तथा उनके कुशल उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, एनएलसी इंडिया लिमिटेड (NLC India Limited) और सीएसआईआर-केंद्रीय विद्युत रासायनिक अनुसंधान संस्थान (CSIR-CECRI) के बीच एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं। यह समझौता 10 जून 2026 को तमिलनाडु के नेवेली (Neyveli) में हुआ, जिसका प्राथमिक उद्देश्य महत्वपूर्ण खनिज अनुसंधान (महत्वपूर्ण खनिज अनुसंधान) को गति देना है। इसका लक्ष्य इन खनिजों के लाभकारी प्रसंस्करण, निष्कर्षण तकनीकों के विकास और खनन अपशिष्टों (mining wastes) से मूल्यवान तत्वों की पहचान तथा पुनर्प्राप्ति पर संयुक्त अनुसंधान करना है। यह पहल देश की खनिज सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा प्रयास मानी जा रही है।
यह समझौता एनएलसी इंडिया और सीएसआईआर-सीईसीआरआई के बीच वैज्ञानिक एवं तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देगा। इसके तहत नेवेली खदानों से प्राप्त ओवरबर्डन (overburden) और टेलिंग्स (tailings) का गहन अध्ययन किया जाएगा, ताकि उनमें छिपे दुर्लभ और रणनीतिक खनिजों (rare and strategic minerals) की पहचान की जा सके। विशेष रूप से, खनिज लाभकारीकरण (mineral beneficiation) और उन्नत निष्कर्षण तकनीकों (advanced extraction techniques) के विकास पर जोर दिया जाएगा, जो इन खनिजों को प्रभावी ढंग से निकालने में सहायक होंगी। यह सहयोग भविष्य में एनएलसी इंडिया की अन्य खनन और अन्वेषण परियोजनाओं (mining and exploration projects) तक भी विस्तारित किया जा सकता है, जिससे पूरे देश में महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों की उपलब्धता बढ़ाई जा सके।
महत्वपूर्ण खनिजों का राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक महत्व
आधुनिक औद्योगिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण खनिज (critical minerals) अत्यंत आवश्यक हैं। ये खनिज स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों (clean energy systems), उच्च-तकनीकी इलेक्ट्रॉनिक्स (high-tech electronics) और रक्षा उपकरणों (defense equipment) के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वर्तमान में, भारत इन खनिजों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला में जोखिम बना रहता है। इस समझौते के माध्यम से भारत सरकार की महत्वपूर्ण खनिजों की घरेलू उपलब्धता बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने की रणनीतिक पहल को बल मिलेगा। यह कदम देश को वैश्विक आपूर्ति झटकों से बचाने और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने में सहायक होगा।
समझौते के तहत दुर्लभ मृदा तत्वों (Rare Earth Elements - REEs) की संभावनाओं का भी विशेष रूप से अध्ययन किया जाएगा। दुर्लभ मृदा तत्व, जो 17 रासायनिक तत्वों का एक समूह हैं, इलेक्ट्रॉनिक्स, उच्च क्षमता वाले चुंबकों (high-strength magnets), बैटरियों (batteries), पवन ऊर्जा उपकरणों (wind energy devices), इलेक्ट्रिक वाहनों (electric vehicles) और रक्षा प्रणालियों में व्यापक रूप से उपयोग होते हैं। वैश्विक स्तर पर इनकी मांग लगातार बढ़ रही है, और भारत के लिए इनकी घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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खनन प्रक्रिया के दौरान अयस्क तक पहुंचने के लिए हटाई गई मिट्टी और चट्टानों को ओवरबर्डन कहा जाता है, जबकि खनिज प्रसंस्करण के बाद बचने वाले महीन अपशिष्ट पदार्थों को टेलिंग्स कहते हैं। आधुनिक अनुसंधान ने यह सिद्ध किया है कि इन अपशिष्ट पदार्थों में अक्सर मूल्यवान खनिज और दुर्लभ मृदा तत्व मौजूद होते हैं, जिन्हें नई तकनीकों की सहायता से पुनः प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए, इन्हें अब 'द्वितीयक संसाधन' (secondary resources) के रूप में देखा जा रहा है, जो पर्यावरणीय दृष्टि से भी लाभकारी है क्योंकि यह अपशिष्टों के प्रबंधन में मदद करता है और नए खनन की आवश्यकता को कम करता है।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम
एनएलसी इंडिया और सीएसआईआर-सीईसीआरआई के बीच यह सहयोग भारत सरकार के राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (National Critical Mineral Mission) के उद्देश्यों के अनुरूप है। एनएलसी इंडिया के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, प्रसन्न कुमार मोटुपल्ली (Prasanna Kumar Motupalli), नीति आयोग (NITI Aayog) की उस समिति के सदस्य भी हैं, जो द्वितीयक संसाधनों से महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों की पुनर्प्राप्ति पर कार्य कर रही है। यह पहल देश की खनिज सुरक्षा (mineral security) को मजबूत करने और 'आत्मनिर्भर भारत' (Atmanirbhar Bharat) के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में सीधे तौर पर सहायक हो सकती है। खनन अपशिष्टों से मूल्यवान संसाधनों की पहचान और उपयोग न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से लाभकारी होगा, बल्कि देश की रणनीतिक और औद्योगिक आवश्यकताओं को पूरा करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा। यह समझौता भारत को वैश्विक खनिज आपूर्ति श्रृंखला में एक मजबूत स्थिति प्रदान करने की क्षमता रखता है।
यह समझौता भारत में महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और पुनर्प्राप्ति के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोलता है। यह न केवल हमारी औद्योगिक आवश्यकताओं को पूरा करेगा बल्कि हमें वैश्विक स्तर पर एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में भी स्थापित करेगा, जिससे आने वाले दशकों में देश की तकनीकी और आर्थिक प्रगति सुनिश्चित होगी।
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.