दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: सैनिकों की दिव्यांगता पेंशन से 'लाइफस्टाइल डिसऑर्डर' का तर्क खारिज

दिल्ली हाईकोर्ट ने सैनिकों की दिव्यांगता पेंशन पर 'लाइफस्टाइल डिसऑर्डर' तर्क को खारिज किया

दिल्ली हाईकोर्ट ने सशस्त्र बलों के कर्मियों के हक में एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सैनिकों की दिव्यांगता पेंशन को इस आधार पर नहीं रोका जा सकता कि उनकी बीमारी 'लाइफस्टाइल डिसऑर्डर' है। यह निर्णय सैन्य सेवा की अनूठी प्रकृति और उससे जुड़े तनावपूर्ण माहौल को स्वीकार करता है, जो सैनिकों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। यह फैसला लाखों सेवारत और सेवानिवृत्त सैनिकों के लिए न्याय और सम्मान की नई राह खोलेगा, जिनके स्वास्थ्य को अक्सर उनकी सेवा की कठोर परिस्थितियों का परिणाम माना जाता है।

जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की बेंच ने आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक रिटायर्ड वायुसेना अधिकारी की दिव्यांगता पेंशन की याचिका खारिज कर दी गई थी। यह अधिकारी उच्च रक्तचाप (Hypertension) और कोरोनरी आर्टरी डिजीज (CAD) जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित थे। कोर्ट ने अपने फैसले में जोर दिया कि यह मायने नहीं रखता कि ये बीमारियाँ फील्ड एरिया में हुईं या पीस पोस्टिंग में; महत्वपूर्ण यह है कि क्या उनका संबंध सेवा की परिस्थितियों से है।

सैनिकों की दिव्यांगता पेंशन: 'लाइफस्टाइल डिसऑर्डर' तर्क खारिज

अदालत ने कहा कि सैन्य सेवा की परिस्थितियां, चाहे वे कितनी भी अलग क्यों न हों, हमेशा तनावपूर्ण होती हैं। सैन्य जीवन की कठिनाइयां, जैसे कड़ा अनुशासन, लंबे कार्य घंटे, और स्थायी तैनाती के कारण होने वाला शारीरिक और मानसिक तनाव, स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकता है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि बिना ठोस चिकित्सीय सबूत के किसी बीमारी को केवल 'लाइफस्टाइल डिसऑर्डर' कहना कानूनी दृष्टि से सही नहीं है। मेडिकल बोर्ड ने खुद स्वीकार किया था कि यह बीमारी अधिकारी की किसी लापरवाही या गलत आदतों की वजह से नहीं हुई, बल्कि यह उनकी सेवा के कारण बढ़ी।

कोर्ट ने उन तर्कों को भी खारिज कर दिया जिनमें मोटापा, धूम्रपान या शराब को बीमारी का कारण बताया गया था, क्योंकि मेडिकल रिपोर्ट में इन कारणों को स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं किया गया था। केवल वजन अधिक होना, उच्च रक्तचाप या हृदय रोग को खुद से उत्पन्न हुई बीमारी मान लेना उचित नहीं है, खासकर जब एएफटी ने बिना किसी वैज्ञानिक सबूत के निष्कर्ष निकाल लिया था। इस मामले में रिलीज मेडिकल बोर्ड यह साबित नहीं कर सका कि अधिकारी की बीमारियां सेवा से संबंधित नहीं थीं, जिससे कोर्ट ने सैनिक के पक्ष में फैसला सुनाया।

कोर्ट का निर्देश और व्यापक प्रभाव

इस ऐतिहासिक निर्णय के तहत, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की याचिका मंजूर करते हुए 50 प्रतिशत आजीवन दिव्यांगता पेंशन देने का आदेश दिया। इसके अतिरिक्त, रिटायरमेंट की तारीख से बकाया भुगतान 8 सप्ताह के भीतर जारी करने का निर्देश भी दिया गया है। यदि भुगतान में देरी होती है, तो 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। यह फैसला सिर्फ इस एक अधिकारी के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय सशस्त्र बलों के लाखों अन्य सैनिकों के लिए भी उम्मीद की एक नई किरण है, जो अपनी सेवा के दौरान उत्पन्न हुई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। यह निर्णय सैन्य कर्मियों के अधिकारों को मजबूत करता है और यह सुनिश्चित करता है कि उनकी सेवा के दौरान हुए स्वास्थ्य संबंधी त्याग को मान्यता दी जाए।

यह फैसला सरकार और संबंधित विभागों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है कि उन्हें सैन्य सेवा की प्रकृति और उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को अधिक गंभीरता से समझना होगा। भविष्य में, मेडिकल बोर्डों को बीमारियों और सेवा की परिस्थितियों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए अधिक वैज्ञानिक और साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण अपनाना होगा। यह निर्णय सैन्य कर्मियों के कल्याण और उनके सम्मानजनक जीवन के अधिकार को सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में अन्य सामाजिक मुद्दों पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं, जैसे कि फिजिकल रिलेशन के बाद शादी से मना करना एक अपराध है, जो धोखे से किया गया हो, भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत आ सकता है। ये टिप्पणियां दर्शाती हैं कि न्यायालय विभिन्न सामाजिक और व्यक्तिगत अधिकारों के प्रति सचेत और सक्रिय है, और न्यायपालिका समाज में संतुलन और नैतिकता बनाए रखने में अपनी भूमिका निभा रही है।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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