होली पर गोंडा पुलिस का फरमान: जो रंग न खेलें, वे घर से न निकलें…
भारत, त्योहारों का देश है और त्योहारों पर 'अनोखे' सरकारी बयानों का भी! इस बार होली 2026 से पहले, उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले से एक ऐसा ही 'रंगीन' फरमान सामने आया है, जिसने सोशल मीडिया पर धूम मचा दी है। कर्नलगंज कोतवाली में आयोजित पीस कमेटी की बैठक में, अपर पुलिस अधीक्षक (पश्चिमी) राधेश्याम राय ने एक ऐसा बयान दिया है, जो सीधा दिल पर नहीं, बल्कि सीधे आपके घर के दरवाज़े पर दस्तक देता है।
'बुरा न मानो, होली है' को मिला सरकारी आशीर्वाद!
मामला कुछ यूं है कि अपर पुलिस अधीक्षक महोदय ने शांतिपूर्ण होली मनाने की अपील करते हुए एक ऐसी 'गाइडलाइन' दे डाली, जिसे सुनकर कुछ लोग हंसे, कुछ ने सिर खुजाया और कुछ ने सोचा, "वाह! क्या बात है।" उन्होंने फरमाया, "जो होली न खेले, वह अपने घर से ही न निकले, क्योंकि होली मस्ती का त्योहार है। यह नहीं देखता कि कौन हिंदू है, कौन मुसलमान, कौन ईसाई या कौन सिख। यह सिर्फ इतना देखता है कि होली है और हम अपने भाई पर रंग डालेंगे।"
अब बताइए, इससे ज़्यादा स्पष्ट और 'सेक्युलर' निर्देश भला और क्या हो सकता है? एएसपी साहब ने तो 'बुरा न मानो, होली है' की सदियों पुरानी परंपरा को एक तरह से सरकारी मान्यता ही दे दी है। उन्होंने आगे यह भी समझाया कि होली खुशियों और उत्साह का पर्व है, लेकिन कुछ लोग ज़्यादा उत्साह में आ जाते हैं, जिन्हें मौके पर समझाना मुश्किल हो जाता है। यानी, अगर कोई ज़्यादा जोश में आकर आपको रंगने आ जाए, तो उसके 'उत्साह' को समझें, न कि उसे रोकने की जुर्रत करें! अगर रंग से परहेज़ है, तो बेहतर है घर में ही रहें। बाहर की दुनिया रंगीन है, और अगर आप रंगीन नहीं होना चाहते, तो दुनिया आपकी नहीं है।
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जब मुस्लिम समुदाय ने भी कहा, "सही बात है!"
इस 'क्रांतिकारी' बयान का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि मुस्लिम समुदाय के सदस्यों, जैसे जावेद अख्तर, नसीब अली और साहिबान नियाजी ने भी इस बयान का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि आपसी सौहार्द बनाए रखना सबकी ज़िम्मेदारी है। एएसपी साहब ने तो मुस्लिम समुदाय से यह भी अपील कर डाली कि शाम को रोज़ा खोलने के समय यदि कोई गुजिया खिलाए, तो उसे स्वीकार करें। यह दिखाता है कि बयान के पीछे की मंशा कितनी पाक और भाईचारे वाली थी, भले ही शब्दों का चुनाव थोड़ा 'सीधा' था।
क्या यह एक नया 'भारतीय ड्रामा एपिसोड' है?
यह घटना सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि हमारे देश के सामाजिक ताने-बाने की एक मज़ेदार झलक है। एक तरफ अधिकारी शांति और भाईचारा बनाए रखने की कोशिश करते हैं, तो दूसरी तरफ उनके बयान सोशल मीडिया पर 'वायरल मसाले' बन जाते हैं। क्या यह एक नया ट्रेंड है, जहां हर त्योहार से पहले ऐसे 'अनोखे' सुरक्षा निर्देश सुनने को मिलेंगे? या यह सिर्फ 'भारतीय ड्रामा एपिसोड' का एक और मज़ेदार अंक है, जहां हर बात पर चर्चा, मीम और बहस अनिवार्य है?
गोंडा के एएसपी साहब ने शायद अनजाने में ही सही, लेकिन एक ऐसी बहस छेड़ दी है, जो त्योहारों पर व्यक्तिगत आज़ादी और सामाजिक ज़िम्मेदारी के बीच की पतली रेखा को उजागर करती है। अब देखना यह है कि अगले साल कौन सा अधिकारी, किस त्योहार पर, कौन सा 'नया नियम' लेकर आता है। क्या दिवाली पर पटाखे न जलाने वालों को घर में रहने को कहा जाएगा? या ईद पर बिरयानी न खाने वालों को? भारत में त्योहारों का मतलब सिर्फ जश्न नहीं, बल्कि 'सरकारी सलाह' का एक नया मौसम भी है!
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.