एआई समिट का बवाल: प्रियांक खड़गे का पलटवार, क्या कुप्रबंधन की विफलताएं छिपाने का प्रयास है या कुछ और...?

कर्नाटक मंत्री प्रियांक खड़गे एआई समिट में कुप्रबंधन और भाजपा के विरोध प्रदर्शन पर आलोचना का जवाब देते हुए

एआई समिट का बवाल: प्रियांक खड़गे का पलटवार, क्या कुप्रबंधन की विफलताएं छिपाने का प्रयास है या कुछ और...?

राजनीति का अखाड़ा हो और उसमें "तू-तू, मैं-मैं" न हो, ऐसा भला कैसे हो सकता है? ख़ासकर जब बात एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) जैसे 'मॉडर्न' टॉपिक पर हो, लेकिन बहस के मुद्दे 'एआई' से ज़्यादा 'आई-आई' (मैं-मैं) वाले हों। ताज़ा बखेड़ा बेंगलुरु से उठा है, जहाँ कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियांक खड़गे ने भाजपा पर ज़ोरदार पलटवार किया है। मुद्दा वही पुराना, लेकिन ट्विस्ट नया – दिल्ली में हुए एआई इम्पैक्ट समिट में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के विरोध प्रदर्शन का। प्रियांक खड़गे का सीधा आरोप है कि भाजपा बेवजह इस विरोध प्रदर्शन को इतना तूल दे रही है, सिर्फ़ अपनी नाकामियों और कुप्रबंधन को छिपाने के लिए। अब ये तो वही बात हो गई, जैसे कोई कहे कि "आजकल लोग फ़ोन पर ज़्यादा बातें करते हैं," और असल में वो ख़ुद ही घंटों रील्स देखता हो। आम भारतीय के लिए यह सिर्फ़ एक और राजनीतिक दाँव-पेंच नहीं, बल्कि यह समझने का मौक़ा है कि हमारे नेता किसी भी मुद्दे को कैसे अपने हिसाब से 'री-फ़ॉर्मेट' करके पेश करते हैं।

याददाश्त का खेल और कुप्रबंधन का भूत

प्रियांक खड़गे ने भाजपा की 'याददाश्त' पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें नितिन गडकरी का कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान किया गया विरोध प्रदर्शन क्यों याद नहीं आता? उस समय विरोध करना "अभिव्यक्ति की आज़ादी" थी, और अब कांग्रेस करे तो "देशद्रोह"? ये तो वही बात हुई, "हम करें तो रासलीला, तुम करो तो कैरेक्टर ढीला"। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि जब कर्नाटक में भाजपा की सरकार थी, तब राहुल गांधी के दौरे पर भाजपा के लोग किस तरह काले झंडे लेकर विरोध प्रदर्शन करने पहुँच गए थे। ख़ड़गे साहब का कहना है कि अपनी गिरेबां में झाँकने की बजाय, भाजपा हमेशा कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने की फिराक में रहती है।
दरअसल, प्रियांक खड़गे का मूल तर्क यह है कि दिल्ली में हुए एआई इम्पैक्ट समिट में भारी कुप्रबंधन हुआ है। और भाजपा इसी कुप्रबंधन की विफलताओं को दुनिया के सामने आने से रोकने के लिए इस विरोध प्रदर्शन का सहारा ले रही है। उनका सवाल वाजिब है: "आप भला इस बात को क्यों जानना चाहते हैं कि इसे लेकर कांग्रेस की क्या राय है? आपको यह जानना होगा कि इसमें शामिल होने वाले डेलीगेट्स और निवेशक इस पर क्या विचार रखते हैं।" यानी, असली मुद्दा एआई समिट का प्रबंधन है, न कि कांग्रेस का विरोध। ये ठीक वैसा ही है जैसे कोई शादी में खाने की क्वालिटी पर सवाल उठाए और मेज़बान कहे, "अरे, आप तो सिर्फ़ डीजे पर नाचने वालों को देखिए!"

सिर्फ़ एक और 'भारतीय ड्रामा एपिसोड'?

प्रियांक खड़गे ने कांग्रेस विधायकों द्वारा शीर्ष नेतृत्व को लिखे गए पत्र पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि महत्वाकांक्षी होना गलत नहीं है और सभी को अपनी बात रखने का हक है, लेकिन तरीका सही होना चाहिए। यह टिप्पणी भले ही अंदरूनी पार्टी की बात हो, लेकिन यह भारतीय राजनीति का एक सामान्य सत्य है: "बात तो सही है, पर कहने का सलीका भी तो हो।" यह घटना हमें दिखाती है कि भारतीय राजनीति में किसी भी विषय को कैसे तुरंत 'ब्लैक एंड व्हाइट' या 'तू-तू, मैं-मैं' में बदल दिया जाता है। एआई जैसे भविष्योन्मुखी विषय पर भी बहस का स्तर 'कौन कब विरोध किया' और 'किसने किसकी पोल खोली' तक ही सीमित रह जाता है। क्या यह सिर्फ़ एक और "भारतीय ड्रामा एपिसोड" है या यह हमारी राजनीतिक संस्कृति का स्थायी ट्रेंड बन गया है, जहाँ हर घटना एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने का बहाना बन जाती है? शायद दोनों। अंत में, जनता बस यही देखती रह जाती है कि एआई का भविष्य क्या होगा, यह तो पता नहीं, लेकिन नेताओं की 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (एक-दूसरे पर आरोप लगाने की) दिन-ब-दिन बेहतर होती जा रही है। *Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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