नमस्ते दोस्तों! आज की खबर सुनकर आप कहेंगे, "भला ऐसा भी होता है?" और हम कहेंगे, "हाँ भाई, भारत है, यहाँ सब होता है!" सरकार ने वो कर दिखाया है, जिसके बारे में हम-आप तो सिर्फ सोचते थे – कबाड़ बेचकर करोड़ों कमाना! जी हाँ, वही कबाड़, जिसे हम दिवाली की सफाई में कूड़ेदान में डालते हैं या कबाड़ी को दो-चार रुपए में दे देते हैं। हमारी सरकार ने इसी 'बेकार' सामान से अपने खजाने में पूरे ₹4,405 करोड़ जमा कर लिए हैं। यह NDTV.in की ताजा रिपोर्ट है, जो बताती है कि सफाई अभियान अब सिर्फ झाड़ू पोछा नहीं, बल्कि एक 'कमाई अभियान' भी बन गया है। हम तो गली के कबाड़ी से मोलभाव करते रह गए, और यहाँ देश का खजाना ही कबाड़ से भर गया! अब सोचिए, जब सरकार कबाड़ से इतना कमा सकती है, तो आपके घर में पड़े पुराने अखबार और टूटे खिलौने कितने काम के होंगे!
सरकार का 'कबाड़-कल्याण' मॉडल: सफाई से कमाई तक!
स्वच्छता अभियान, जिसे हम अब तक सिर्फ गलियों और सड़कों पर झाड़ू लगाने तक सीमित समझते थे, अब एक नया रूप ले चुका है। यह अब सिर्फ 'स्वच्छ भारत' नहीं, बल्कि 'स्वच्छ भारत, समृद्ध भारत' का नारा बन गया है, और वो भी कबाड़ बेचकर! केंद्र सरकार ने साल 2021 से लेकर जनवरी 2026 तक, यानी इन पांच सालों में, पुराने कागजों, टूटी कुर्सियों, और शायद कुछ पुरानी फाइलों को बेचकर कुल ₹4,405.28 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया है। यह आंकड़ा बताता है कि सरकारी दफ्तरों में कितना 'अनमोल' कबाड़ यूं ही पड़ा धूल फांक रहा था।
ताजा रिपोर्ट तो और भी चौंकाने वाली है। सिर्फ दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 के दो महीनों में ही सरकार ने कबाड़ हटाकर ₹200.21 करोड़ रुपये जुटा लिए। जनवरी के महीने में तो देशभर के 5,188 सरकारी दफ्तरों में सफाई का ऐसा महा-अभियान चला कि 81 हजार से ज्यादा पुरानी फाइलों को 'मोक्ष' मिल गया। इन फाइलों के हटने से दफ्तरों में लगभग 4.34 लाख वर्ग फुट जगह खाली हो गई है। अब इस खाली जगह में क्या होगा? नए दफ्तर बनेंगे? या शायद सरकारी बाबू इन खाली जगहों पर आराम फरमाएंगे?
जनवरी की कमाई में सबसे बड़ा हाथ रहा कोयला मंत्रालय, भारी उद्योग मंत्रालय और रेलवे मंत्रालय का। इन मंत्रालयों ने मिलकर ₹115.85 करोड़ का रेवेन्यू दिया। सोचिए, कोयला मंत्रालय, जो खुद खदानों से कोयला निकालता है, उसने अपने कबाड़ से 1.88 लाख वर्ग फुट जगह खाली करवा दी। लगता है अब कोयले के साथ-साथ कबाड़ भी देश की अर्थव्यवस्था का नया ईंधन बन गया है। क्या पता, अगली पंचवर्षीय योजना में 'कबाड़ निर्यात' को ही बढ़ावा दे दिया जाए!
कबाड़ में छिपा 'अर्थशास्त्र': यह ट्रेंड है या भारतीय ड्रामा?
यह घटना सिर्फ एक कमाई का आंकड़ा नहीं, बल्कि एक गहरी सोच को जन्म देती है। क्या यह सरकार की दूरदर्शिता है, जिसने कबाड़ में भी 'अर्थव्यवस्था' देख ली? या फिर दशकों से जमा धूल और फाइलों का एक कड़वा सच है, जिसे अब जाकर हटाने की सुध आई है? यह दिखाता है कि हमारे दफ्तरों में कितना अनावश्यक सामान पड़ा रहता है, जिसका इस्तेमाल न होने के बावजूद वो जगह घेरे रहता है।
यह ट्रेंड अगर जारी रहा, तो क्या हर सरकारी बाबू अब अपनी कुर्सी के नीचे कबाड़ का ढेर लगाकर बैठेगा, यह सोचकर कि कब उसकी कीमत बढ़ जाए? क्या अब कबाड़ की नीलामी सरकारी योजनाओं की तरह भव्य तरीके से होगी? यह तो एक नया 'भारतीय ड्रामा एपिसोड' है, जिसमें 'कबाड़' अब सिर्फ कबाड़ नहीं, बल्कि 'राष्ट्रीय संपत्ति' बन गया है। उम्मीद है कि यह अभियान सिर्फ कागजी नहीं, बल्कि वाकई में सरकारी कामकाज को तेज और पारदर्शी बनाने में मदद करेगा, और खाली हुई जगह का सदुपयोग होगा, न कि सिर्फ और ज्यादा कबाड़ जमा करने के लिए।
तो दोस्तों, अगली बार जब आप अपने घर का कबाड़ बेचें, तो सरकार से कुछ प्रेरणा जरूर लीजिएगा। कौन जानता है, शायद आपके घर का पुराना रद्दी भी देश की GDP में योगदान दे जाए। फिलहाल, सरकार का यह कदम साबित करता है कि अगर नीयत साफ हो (और दफ्तर भी), तो पैसों की बारिश कहीं से भी हो सकती है, भले ही वो कबाड़ के ढेर से ही क्यों न हो। अब बस देखना यह है कि यह 'कबाड़ क्रांति' कब तक चलती है, और कब तक हमारे सरकारी दफ्तरों से 'कबाड़' निकलता रहता है... कहीं ऐसा न हो कि एक दिन दफ्तर में सिर्फ कबाड़ ही बचे, और काम करने वाले बाबू ही कबाड़ बेचने में व्यस्त हो जाएं!
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