शिमला में जलवायु परिवर्तन पर मंथन: क्या 'एक दशक से भी कम' में बदल पाएगी हमारी दुनिया...?

शिमला में जलवायु परिवर्तन पर हुई बैठक, विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिए एक दशक से भी कम समय बचा है।

शिमला में 'क्लाइमेट चेंज' पर मंथन: जब पहाड़ पर पिघलती बर्फ के बीच, 'लेस दैन ए डिकेड' की घंटी बजी...

वाह! क्या नज़ारा है! एक तरफ़ शिमला की सर्द हवाएं, दूसरी तरफ़ ग्लोबल वार्मिंग की तपिश पर गरमागरम बहस। पिछले मंगलवार को हिमाचल प्रदेश के राज्य सचिवालय में कुछ ऐसा ही हुआ। पर्यावरण, विज्ञान और प्रौद्योगिकी और जलवायु परिवर्तन विभाग ने इंस्टिट्यूट फॉर गवर्नेंस एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट (IGSD) के साथ मिलकर एक 'साइंटिफिक असेसमेंट रिपोर्ट' जारी की। मुद्दा था नॉन-CO2 (कार्बन डाइऑक्साइड नहीं, बल्कि अन्य ग्रीनहाउस गैसें) उत्सर्जन से कैसे निपटा जाए। अब आप कहेंगे, "हमें क्या? हमारी तो AC की हवा और गाड़ी का धुआँ ही सब कुछ है!" लेकिन रुकिए, यही तो असली ट्विस्ट है!

इस बैठक में वॉशिंगटन डीसी यूएसए से पधारे IGSD के अध्यक्ष और फाउंडर डॉ. दुरवुड जैलके ने एक ऐसी बात कह दी, जिसने सुनने वालों के दिलों में अगर नहीं भी, तो कम से कम हॉल में बैठे अधिकारियों के माथे पर चिंता की हल्की लकीरें ज़रूर खींच दी होंगी। उन्होंने फरमाया, "ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव रोकने के लिए हमारे पास केवल एक दशक से भी कम समय है।" यानी, दस साल भी नहीं बचे, दोस्तों! क्या आप अपनी पसंदीदा वेब सीरीज़ के अगले सीज़न का इंतज़ार कर रहे हैं? हो सकता है तब तक हमारे पास देखने के लिए नई दुनिया ही न बचे!

नॉन-CO2 उत्सर्जन: जब कार्बन नहीं, तो कौन है विलेन?

अक्सर हम कार्बन डाइऑक्साइड को ही जलवायु परिवर्तन का एकमात्र विलेन मानकर चलते हैं। लेकिन शिमला में हुए इस कार्यक्रम ने हमें बताया कि असली कहानी में और भी किरदार हैं। विभाग के निदेशक डीसी राणा ने अपने स्वागत संबोधन में शायद इसी 'बहु-विलेन' कॉन्सेप्ट की ओर इशारा किया होगा। फिर IGSD के निदेशक डॉ. नीमिश सिंह ने अपनी पावर पॉइंट प्रस्तुति से हमें उन 'छिपे हुए' खलनायकों से मिलवाया होगा, जो हमारे फ्रिज से लेकर खेतों तक में अपना काम कर रहे हैं। सोचिए, हम तो 'कार्बन न्यूट्रल' होने की बात करते हैं, लेकिन यहाँ तो मामला 'नॉन-CO2' का है! यह ठीक वैसा ही है जैसे आप चोर को ढूंढ रहे हों और डाकू आपके सामने खड़ा हो।

इस बीच, ईएसटी एंड सीसी के सचिव सुशील कुमार सिंघला ने भी अपने विशेष संबोधन में कुछ ज्ञान की बातें ज़रूर कही होंगी। और अंत में, IGSD की इंडिया प्रोग्राम की निदेशक जेरिन ओशो ने धन्यवाद प्रस्ताव देकर इस गंभीर चर्चा को एक औपचारिक विराम दिया। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विराम सिर्फ़ कागज़ों पर है या ज़मीनी हकीकत पर भी इसका असर होगा? आम भारतीय के लिए यह खबर इसलिए दिलचस्प है क्योंकि जब तक हम अपनी गाड़ियों, AC, और यहाँ तक कि खाने की आदतों पर ध्यान नहीं देंगे, तब तक यह "एक दशक से भी कम" वाली चेतावनी हमारे सिर पर मंडराती रहेगी।

घड़ी की सुइयाँ और हमारी आदतें: क्या बदलेगा कुछ?

डॉ. जैलके की यह चेतावनी कोई नया अलार्म नहीं है, लेकिन "एक दशक से भी कम" का समय सुनकर लगता है कि हम अब 'अंतिम ओवर' में आ गए हैं। हमारे देश में, जहाँ हर साल गर्मी के नए रिकॉर्ड बनते हैं, जहाँ नदियाँ सूख रही हैं और पहाड़ दरक रहे हैं, वहाँ ऐसी रिपोर्ट्स का आना अब एक 'सीज़नल फ़ेनोमेना' सा लगता है। हम सोशल मीडिया पर 'ग्लोबल वार्मिंग' के मीम्स शेयर करते हैं, लेकिन अपनी ज़िंदगी में 'सिंगल यूज़ प्लास्टिक' नहीं छोड़ पाते। यह बैठक हमें यह संकेत देती है कि वैज्ञानिक समुदाय अपनी तरफ़ से पूरी शिद्दत से काम कर रहा है, लेकिन क्या हमारी सरकारें और जनता उस शिद्दत से इसे ले रही है?

नीतिगत स्तर पर, नॉन-CO2 उत्सर्जन पर ध्यान देना एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका मतलब है कि अब सिर्फ़ बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज़ ही नहीं, बल्कि कृषि, पशुधन और यहाँ तक कि हमारे घरों से निकलने वाले कचरे पर भी गंभीरता से विचार करना होगा। यह सिर्फ़ एक 'भारतीय ड्रामा एपिसोड' है या वाकई यह एक नए ट्रेंड की शुरुआत है, यह तो आने वाला दशक ही बताएगा। लेकिन एक बात तो तय है, अगर हमने इस 'लेस दैन ए डिकेड' की वार्निंग को हल्के में लिया, तो फिर किसी और रिपोर्ट के लिए शायद कोई शिमला भी न बचे...

तो अगली बार जब आप अपनी गाड़ी स्टार्ट करें या AC चलाएं, तो एक बार सोचिएगा ज़रूर। कहीं ऐसा न हो कि हमारा भविष्य, शिमला की पिघलती बर्फ़ की तरह, बस एक याद बनकर रह जाए। अब मीटिंग्स होती रहेंगी, रिपोर्ट्स आती रहेंगी, लेकिन असली काम तो ज़मीन पर ही होगा। और उस काम के लिए, हमारे पास सच में बहुत कम समय है।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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