भारत सरकार का संकल्प: 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह से समाप्त करने की दिशा में निर्णायक कदम

भारतीय सुरक्षा बल नक्सलवाद को समाप्त करने के लिए अभियान चला रहे हैं

नई दिल्ली: भारत सरकार ने देश से नक्सलवाद को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसके तहत 31 मार्च 2026 तक इस चुनौती को जड़ से खत्म करने की प्रतिबद्धता जताई गई है। यह घोषणा हाल ही में सुरक्षा बलों द्वारा वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) के खिलाफ चलाए गए कई बड़े और सफल अभियानों के बाद आई है, जिन्होंने देश के आंतरिक सुरक्षा परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दिया है। इन अभियानों ने न केवल नक्सली समूहों की कमर तोड़ी है, बल्कि प्रभावित क्षेत्रों में विकास की नई राह भी खोली है, जिससे एक एलडब्ल्यूई मुक्त भारत का सपना अब पहले से कहीं अधिक साकार होता दिख रहा है।

नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक प्रहार और सरकार की बहुआयामी रणनीति

देश के इतिहास के सबसे बड़े नक्सल विरोधी अभियानों में से एक के तहत, सुरक्षा बलों ने हाल के हफ्तों में छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा और छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जैसे क्षेत्रों में बड़ी सफलताएं हासिल की हैं। 21 अप्रैल से 11 मई, 2025 के दौरान कर्रेगुट्टालु पहाड़ी (केजीएच) क्षेत्र में चलाए गए एक व्यापक अभियान में, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), विशेष कार्य बल (एसटीएफ), जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) और राज्य पुलिस बलों के समन्वित प्रयासों के परिणामस्वरूप 16 महिलाओं सहित 31 माओवादियों को मार गिराया गया। इसके बाद, 21 मई को छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में एक और ऑपरेशन में 27 खूंखार माओवादियों को मार गिराया गया, जिनमें सीपीआई-माओवादी का महासचिव और शीर्ष नेता, नंबाला केशव राव, उर्फ बासवराजू भी शामिल था, जिसे नक्सल आंदोलन की रीढ़ माना जाता था। इन सफलताओं के साथ ही, ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट के पूरा होने के बाद छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र में 54 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और 84 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया।

नक्सलवाद, जिसे अक्सर वामपंथी उग्रवाद के रूप में जाना जाता है, 1967 के पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी आंदोलन से उत्पन्न हुआ और दशकों तक देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बना रहा। सामाजिक-आर्थिक असमानताओं में निहित और माओवादी विचारधारा से प्रेरित इस आंदोलन ने देश के सबसे सुदूरवर्ती, अविकसित और जनजातीय-बहुल क्षेत्रों को प्रभावित किया। हालांकि, भारत की बहुआयामी वामपंथी उग्रवाद विरोधी रणनीति, जिसमें सुरक्षा प्रवर्तन, समावेशी विकास और सामुदायिक सहभागिता शामिल है, ने इस आंदोलन को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया है। सरकार की मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक प्रतिबद्धता के साथ, प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा में भारी कमी आई है, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कनेक्टिविटी, बैंकिंग और डाक सेवाओं को इन गांवों तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।

लगातार घटते प्रभावित जिले और विकास की नई इबारत

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिलों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। अप्रैल 2018 में यह संख्या 126 थी, जो जुलाई 2021 में घटकर 70 और अप्रैल 2024 में मात्र 38 रह गई है। सबसे अधिक प्रभावित जिलों की संख्या 12 से घटकर 6 रह गई है, जिनमें छत्तीसगढ़ के चार जिले (बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर और सुकमा), झारखंड का एक जिला (पश्चिमी सिंहभूम) और महाराष्ट्र का एक जिला (गढ़चिरौली) शामिल हैं। इसी तरह, चिंता वाले जिलों की संख्या भी 9 से घटकर 6 हो गई है। पिछले 10 वर्षों में, 8,000 से अधिक नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता त्याग दिया है, और इसके परिणामस्वरूप, नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 20 से भी कम रह गई है।

सुरक्षा बलों की संख्या बढ़ाने और उनकी क्षमताओं में सुधार के लिए पिछले 5 सालों में 302 नए सुरक्षा शिविर और 68 नाइट लैंडिंग हेलीपैड स्थापित किए गए हैं। 2014 तक जहां कुल 66 फोर्टिफाइड थाने थे, वहीं पिछले 10 सालों में इनकी संख्या बढ़कर 612 हो गई है। हिंसा की घटनाओं में भी भारी कमी आई है; 2010 में अपने उच्चतम स्तर 1936 पर पहुंची घटनाएं 2024 में घटकर 374 रह गई हैं, यानी 81 प्रतिशत की कमी। नागरिकों और सुरक्षा बलों की मौतों की संख्या में भी 85 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इसके अतिरिक्त, नक्सलियों पर आर्थिक रूप से शिकंजा कसने के लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का प्रभावी ढंग से उपयोग किया गया है, जिससे उनकी आर्थिक रीढ़ टूट गई है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सार्वजनिक बुनियादी ढांचे में कमी को पूरा करने के लिए विशेष केन्द्रीय सहायता (एससीए) के तहत वित्तीय सहायता भी प्रदान की जा रही है, और इन क्षेत्रों के लिए बजट आवंटन में 300% की वृद्धि की गई है।

यह स्पष्ट है कि भारत सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति, सुरक्षा बलों की बहादुरी और विकासोन्मुखी नीतियों के कारण नक्सलवाद अपने अंतिम चरण में है। 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद को पूरी तरह से समाप्त करने का लक्ष्य प्राप्त करने योग्य प्रतीत होता है, जिससे देश के सबसे वंचित क्षेत्रों में शांति, सुरक्षा और समृद्धि का एक नया युग शुरू होगा।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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