बीकानेर की अनोखी होली: बारात निकलती है, बैंड-बाजा बजता है, दूल्हा सजता है, पर शादी नहीं होती... क्यों?

बीकानेर की अनोखी होली बारात, जहाँ दूल्हा बिना दुल्हन लौट आता है, सामाजिक सौहार्द का प्रतीक.

बीकानेर की अनोखी होली: बारात निकलती है, बैंड-बाजा बजता है, दूल्हा सजता है, पर शादी नहीं होती... क्यों?

भारत, उत्सवों का देश! यहाँ हर त्योहार के साथ कोई न कोई अनोखी परंपरा जुड़ी होती है। लेकिन बीकानेर में धुलण्डी के दिन जो होता है, वो देखकर आप कहेंगे, "अरे भाई, ये किस लाइन में आ गए आप?" जी हाँ, यहाँ रंगों के बीच निकलती है एक ऐसी बारात, जहाँ दूल्हा सज-धजकर निकलता है, बाराती नाचते-गाते हैं, मंगल गीत गाए जाते हैं, लेकिन... दुल्हन नहीं आती! न फेरे होते हैं, न शादी। मतलब, पूरी तैयारी, पूरा माहौल, बस 'अंतिम परिणाम' नदारद! क्या आजकल की कमिटमेंट-फोबिया वाली पीढ़ी ने तीन सदी पुरानी परंपरा में भी अपनी झलक दिखा दी है? आइए जानते हैं इस अनोखी कथा के पीछे का रहस्य...

जब बारात बिना दुल्हन लौटती है: एक अनोखी परंपरा का पोस्टमार्टम

मामला बीकानेर का है, जहाँ पुष्करणा समाज की हर्ष जाति के लोग धुलण्डी के दिन एक ऐसी बारात निकालते हैं, जो किसी भी आम भारतीय शादी से ज़्यादा दिलचस्प है, क्योंकि इसमें 'ट्विस्ट' है। इस साल 3 मार्च को यह अनोखी बारात फिर से शहर की सड़कों पर निकली, जिसमें एक कुंवारा युवक विष्णु रूपी दूल्हा बनकर निकला। उसके सिर पर खिड़किया पाग, ललाट पर चंदन-कुमकुम, गुलाबी बनियान, गले में पुष्पहार और पीतांबर... देखकर लगता है, बस अब घोड़ी पर चढ़ेगा और 'तेरा यार हूँ मैं' पर एंट्री मारेगा! लेकिन रुकिए, यहाँ कहानी में 'ट्विस्ट' है।

वरिष्ठ नागरिक एडवोकेट हीरालाल हर्ष बताते हैं कि यह परंपरा विभिन्न जातियों के बीच आपसी प्रेम और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक है। तीन सदियों से भी ज़्यादा पुरानी यह परंपरा, राधाकिशन हर्ष जी के अनुसार, आठ निर्धारित मकानों तक जाती है। हर घर के आगे महिलाएं 'पोखने' की रस्म निभाती हैं, विवाह गीत गाती हैं और बारातियों की मनुहार की जाती है। नारियल और नकद राशि भी भेंट की जाती है। माहौल ऐसा बन जाता है, जैसे सच में कोई शादी हो रही हो। 'तू मत डरपे हो लाडला' और 'केसरियो लाडो' जैसे गीत गूंजते हैं और पूरा मोहल्ला शादी के 'फील' में डूब जाता है।

लेकिन यहाँ आकर सारे 'शादी के अरमानों' पर पानी फिर जाता है। दूल्हा इन मकानों में से किसी के भीतर प्रवेश नहीं करता। रस्में पूरी होने के बाद, वह बिना फेरे, बिना विवाह और बिना दुल्हन के सीधे मोहता चौक लौट आता है। मतलब, पूरी 'प्री-वेडिंग' और 'बरात' की रस्में, लेकिन 'पोस्ट-वेडिंग' कुछ नहीं! क्या ये उन लोगों के लिए एक सबक है, जो शादी के नाम पर लाखों फूंक देते हैं, जबकि असल में उन्हें सिर्फ 'इवेंट मैनेजमेंट' का शौक होता है?

बारात बिना शादी: समाज को क्या संदेश?

यह अनोखी परंपरा हमें क्या सिखाती है? क्या यह आधुनिक भारत के 'कमिटमेंट-फोबिया' को दर्शाता है, जहाँ लोग रिश्ते तो चाहते हैं, पर उसकी 'जिम्मेदारी' से बचना चाहते हैं? या फिर यह शादी के बढ़ते खर्चों से बचने का कोई 'विकल्प' है, जहाँ आप बारात का पूरा मज़ा ले सकते हैं, लेकिन शादी के 'बजट' से बच सकते हैं? खैर, मजाक अपनी जगह है, लेकिन यह परंपरा सच में सामाजिक समरसता और आपसी संबंधों को मजबूत करने का एक खूबसूरत तरीका है।

आजकल जब छोटी-छोटी बातों पर समाज में दूरियां बढ़ जाती हैं, तब बीकानेर की यह 'बिना दुल्हन की बारात' हमें सिखाती है कि त्योहार और परंपराएं सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने का जरिया भी हो सकती हैं। यह एक ऐसा 'ड्रामा एपिसोड' है, जहाँ क्लाइमेक्स को जानबूझकर बदल दिया जाता है, ताकि लोग 'प्रेम' और 'सौहार्द' के मूल संदेश को याद रखें, न कि सिर्फ 'शादी' के भौतिक पहलू को। क्या पता, भविष्य में ऐसी 'प्रतीकात्मक बारातें' और भी शहरों में निकलें, जहाँ लोग शादी के बंधन में बंधे बिना ही रिश्ते निभाने का संदेश दें!

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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