संसद की लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee - PAC) ने एक गंभीर रिपोर्ट जारी की है, जिसमें बताया गया है कि वैश्विक भूजल निकासी (global groundwater extraction) में भारत की हिस्सेदारी लगभग 25 प्रतिशत है। यह आंकड़ा देश में पानी के अत्यधिक दोहन (over-exploitation) की चिंताजनक स्थिति को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। समिति ने जल शक्ति मंत्रालय (Ministry of Jal Shakti) से आग्रह किया है कि वह राज्यों को भूजल के इस अत्यधिक उपयोग पर अंकुश लगाने के लिए तत्काल और कड़े कदम उठाने को राजी करे। यह रिपोर्ट भारत की जल सुरक्षा और भविष्य की पीढ़ियों के लिए सतत जल उपलब्धता (sustainable water availability) सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण चेतावनी है।
भारत में भूजल दोहन: एक गंभीर चुनौती
लोक लेखा समिति की 41वीं रिपोर्ट 'भूजल प्रबंधन और विनियमन' (Groundwater Management and Regulation) को समिति के अध्यक्ष के. सी. वेणुगोपाल ने 1 अप्रैल को लोकसभा और राज्यसभा दोनों में पेश किया था। इस रिपोर्ट में भारत को दुनिया में भूजल (groundwater) का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता बताया गया है। देश में अनुमानित रूप से 245 अरब घन मीटर (BCM) जल निकाला जाता है, जो वैश्विक निकासी का लगभग एक चौथाई है। यह भूजल देश की लगभग 80 प्रतिशत पेयजल (drinking water) जरूरतों और करीब 64 प्रतिशत सिंचाई (irrigation) आवश्यकताओं को पूरा करता है।
रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि भूजल संसाधनों के सतत उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए मौजूदा पहलों को ठोस नतीजों में बदलने की आवश्यकता है। चार राज्यों में 100 प्रतिशत से अधिक जल दोहन और 267 जिलों में 64 प्रतिशत से 385 प्रतिशत तक जल दोहन की स्थिति इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सतत जल उपयोग को प्राथमिकता नहीं दी गई है।
अति-दोहन वाले राज्य और जिले
समिति की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान ऐसे राज्य हैं जहाँ भूजल के दोहन का स्तर 100 प्रतिशत से अधिक दर्ज किया गया है। इसका सीधा अर्थ है कि इन क्षेत्रों में भूजल निकासी (groundwater extraction) उसके पुनर्भरण (recharge) से कहीं अधिक है। वहीं, जिला स्तर पर 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (Union Territories) के 267 जिलों में दोहन 64 प्रतिशत से 385 प्रतिशत के बीच दर्ज किया गया, जो इन क्षेत्रों में जल संकट की भयावहता को उजागर करता है। समिति ने मंत्रालय से अपील की है कि वह राज्य सरकारों को भूजल के अत्यधिक दोहन को रोकने और भूजल संसाधनों की दीर्घकालिक व्यवहार्यता (long-term viability) सुनिश्चित करने के लिए तत्काल और कड़े कदम उठाने पर सहमत करे।
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मंत्रालय का जवाब और शुरुआती सुधार के संकेत
जल शक्ति मंत्रालय ने समिति को दिए अपने जवाब में बताया है कि वह भूजल के सतत प्रबंधन (sustainable management) के लिए राज्यों के साथ समन्वय कर रहा है। मंत्रालय द्वारा जल शक्ति अभियान (Jal Shakti Abhiyan), अटल भूजल योजना (Atal Bhujal Yojana), भूजल प्रबंधन एवं विनियमन योजना और राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना (National Hydrology Project) जैसे कई कार्यक्रम लागू किए जा रहे हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड (Central Ground Water Board - CGWB) और राज्य एजेंसियों द्वारा 2023 में किए गए भूजल संसाधनों के नवीनतम आकलन (assessment) से पता चला है कि भूजल दोहन का समग्र स्तर 2017 के 63.33 प्रतिशत से घटकर 2023 में 59.26 प्रतिशत रह गया है।
मंत्रालय ने यह भी बताया कि 2022 में मानसून के बाद के जल स्तर (post-monsoon water level) के आंकड़ों से पता चला है कि निगरानी में रखे गए लगभग 61 प्रतिशत कुओं में पिछले 10 वर्षों (2012-21) के औसत की तुलना में जल स्तर में वृद्धि हुई है। यह भूजल की स्थिति में शुरुआती सुधार के संकेत देता है। हालांकि, मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि ये शुरुआती संकेत "उत्साहजनक" हैं, लेकिन इस रफ्तार को बनाए रखने और भूजल संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन (scientific management) को सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाना अभी भी आवश्यक है।
आगे की राह और दीर्घकालिक प्रभाव
लोक लेखा समिति की यह रिपोर्ट भारत के सामने मौजूद जल संकट की गंभीरता को एक बार फिर रेखांकित करती है। भले ही मंत्रालय द्वारा कुछ सकारात्मक रुझान दर्शाए गए हों, लेकिन चार राज्यों में 100 प्रतिशत से अधिक और सैकड़ों जिलों में अत्यधिक दोहन की स्थिति बताती है कि चुनौती अभी भी बहुत बड़ी है। यह घटनाक्रम नीति निर्माताओं, राज्य सरकारों और आम जनता के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि भूजल का विवेकपूर्ण उपयोग अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्यता है।
दीर्घकालिक रूप से, भूजल के अत्यधिक दोहन से न केवल पेयजल और सिंचाई की समस्याएँ बढ़ेंगी, बल्कि यह कृषि उत्पादकता (agricultural productivity), पारिस्थितिक संतुलन (ecological balance) और ग्रामीण आजीविका (rural livelihoods) पर भी गंभीर प्रभाव डालेगा। भविष्य में जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, जल संरक्षण (water conservation), वर्षा जल संचयन (rainwater harvesting), फसल विविधीकरण (crop diversification) और जल उपयोग दक्षता (water use efficiency) में सुधार जैसे उपायों को प्राथमिकता देनी होगी। यह रिपोर्ट राज्यों और केंद्र के बीच एक मजबूत समन्वय की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालती है ताकि भूजल प्रबंधन के लिए एक एकीकृत और प्रभावी रणनीति (integrated and effective strategy) तैयार की जा सके।
संक्षेप में, लोक लेखा समिति की रिपोर्ट भारत में भूजल की स्थिति पर एक महत्वपूर्ण चेतावनी है, जो भूजल दोहन की गंभीर चुनौतियों और शुरुआती सुधार के संकेतों के बीच एक नाजुक संतुलन को दर्शाती है। जल शक्ति मंत्रालय द्वारा किए जा रहे प्रयासों के बावजूद, भूजल संसाधनों की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए राज्यों और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी के साथ निरंतर और मजबूत नीतियों की आवश्यकता बनी रहेगी।
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.