भारतीय अर्थव्यवस्था पर ADB का आकलन: मोदी सरकार के फैसलों की तारीफ, पर पश्चिम एशिया संकट की बड़ी चेतावनी

भारतीय अर्थव्यवस्था पर एडीबी का आकलन: मोदी सरकार के सुधारों की तारीफ और पश्चिम एशिया संकट की चेतावनी

नई दिल्ली: एशियाई विकास बैंक (ADB) ने भारत की आर्थिक नीतियों और सुधारों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। एक ओर जहाँ एडीबी (Asian Development Bank) के मुख्य अर्थशास्त्री अल्बर्ट पार्क ने मोदी सरकार के प्रमुख आर्थिक फैसलों, विशेषकर श्रम सुधारों (labor reforms) और वस्तु एवं सेवा कर (GST) जैसी पहलों की जमकर तारीफ की है, वहीं दूसरी ओर उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चेतावनी भी जारी की है। पार्क का मानना है कि इन सुधारों से देश में शुद्ध विदेशी निवेश (Net Foreign Investment - NFI) का प्रवाह बढ़ेगा, लेकिन पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष (West Asia conflict) के कारण भारत की आर्थिक वृद्धि दर (GDP growth rate) और महंगाई (inflation) पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

एडीबी के मुख्य अर्थशास्त्री अल्बर्ट पार्क ने स्पष्ट किया कि भारत के मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreements - FTAs), आयात शुल्क में कमी और कारोबार के माहौल में सुधार (ease of doing business) जैसे कदम शुद्ध विदेशी निवेश को आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उन्होंने कहा कि भारत को अपनी सुधारों की गति को बनाए रखना चाहिए। हालांकि, शुद्ध विदेशी निवेश के आंकड़ों में हाल के वर्षों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। जहाँ वित्त वर्ष 2021-22 में भारत ने 38.6 अरब डॉलर का शुद्ध विदेशी निवेश आकर्षित किया था, वहीं वित्त वर्ष 2023 में यह घटकर 28 अरब डॉलर और वित्त वर्ष 2024 में मात्र 10.2 अरब डॉलर रह गया। वित्त वर्ष 2025 में यह आंकड़ा और गिरकर केवल एक अरब डॉलर पर आ गया। हालाँकि, वित्त वर्ष 2026 की अप्रैल-दिसंबर अवधि में इसमें कुछ सुधार देखा गया और यह तीन अरब डॉलर तक पहुंच गया।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर पश्चिम एशिया संकट का असर और तेल की कीमतें

अल्बर्ट पार्क ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक संघर्ष को उजागर किया। उन्होंने चेतावनी दी कि एशिया के अन्य हिस्सों की तुलना में यह क्षेत्र इन झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील है। भारत पर इस संकट का सीधा असर होगा, जिससे देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर में 0.6 प्रतिशत की कमी आ सकती है। इसका अर्थ है कि एडीबी द्वारा अप्रैल में अनुमानित 6.9 प्रतिशत की वृद्धि दर घटकर 6.3 प्रतिशत रह जाएगी। इसके साथ ही, मौजूदा वित्त वर्ष में महंगाई दर (inflation rate) में भी उल्लेखनीय वृद्धि होने की आशंका है, जो आम आदमी की जेब पर सीधा बोझ डालेगी।

तेल की कीमतों के दृष्टिकोण पर बात करते हुए, पार्क ने कहा कि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहने की संभावना है। नए परिदृश्य के अनुसार, 2026 के लिए औसत तेल की कीमत 96 डॉलर प्रति बैरल (barrel) रहने का अनुमान है, जबकि 2027 में यह 80 डॉलर प्रति बैरल पर आ सकती है। तेल की ऊंची कीमतें भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए दोहरी मार साबित होती हैं, जिससे आयात बिल बढ़ता है और महंगाई पर दबाव आता है।

एडीबी ने अप्रैल में अपने अनुमानों में कहा था कि भारत की विकास दर मौजूदा वित्त वर्ष में 6.9 प्रतिशत रहेगी और वित्त वर्ष 2028 में मजबूत घरेलू मांग (domestic demand) के चलते यह बढ़कर 7.3 प्रतिशत हो जाएगी। तब महंगाई दर 4.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था। लेकिन अब पश्चिम एशिया के हालात और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते ये अनुमान संशोधित हो सकते हैं।

निष्कर्ष: संतुलन और सतर्कता की आवश्यकता

एडीबी का यह आकलन भारत के नीति-निर्माताओं के लिए एक मिश्रित संकेत है। एक ओर, यह सरकार द्वारा किए गए आर्थिक सुधारों (economic reforms) की वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता और उनके संभावित सकारात्मक प्रभावों को दर्शाता है। दूसरी ओर, यह वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से उत्पन्न होने वाले बाहरी जोखिमों (external risks) के प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता पर बल देता है। भारत को अपनी घरेलू आर्थिक मजबूती को बनाए रखने के साथ-साथ इन वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए भी रणनीतिक तैयारी करनी होगी ताकि विकास की गति बनी रहे और महंगाई को नियंत्रित किया जा सके। आने वाले समय में, सरकार की नीतियां इन दोनों पहलुओं के बीच संतुलन बनाने पर केंद्रित होंगी।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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