हाल ही में भारतीय शेयर बाजार (Indian stock market) से एक चिंताजनक खबर सामने आई है। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII - Foreign Institutional Investors) की भारतीय इक्विटी बाजार में हिस्सेदारी पिछले 14 सालों के निचले स्तर पर पहुँच गई है, जो मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल खड़े कर रही है। अप्रैल 2026 तक यह हिस्सेदारी घटकर 14.7% रह गई है, जबकि अप्रैल 2016 में यह 19.9% थी। जून 2012 के बाद यह सबसे कम आंकड़ा है, जो देश की अर्थव्यवस्था (economy) के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद में एक भाषण के दौरान जनता को आर्थिक संयम बरतने की नसीहतें दीं, जिससे विपक्ष को सरकार की आर्थिक विफलताओं पर हमला करने का एक और मौका मिल गया है।
विदेशी निवेशकों की घटती हिस्सेदारी और घरेलू सहारा
टाइम्स ऑफ इंडिया (Times of India) में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से पलायन चिंता का विषय है। पिछले तीन वर्षों में निफ्टी-50 (Nifty-50) के 50 में से 41 शेयरों में FII की बिकवाली देखी गई है। हालांकि, इस बीच घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII - Domestic Institutional Investors) ने बाजार को संभालने की पूरी कोशिश की है। DII की हिस्सेदारी बढ़कर रिकॉर्ड 18.9% पर पहुँच गई है और उन्होंने उन 41 निफ्टी शेयरों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है, जहाँ FII ने बिकवाली की। यानी, हर FII की निकासी पर DII खरीदार बने। लेकिन, बाजार विशेषज्ञ अब यह सवाल उठा रहे हैं कि अगर FII की बिकवाली और तेज होती है, तो क्या DII के पास इतनी क्षमता होगी कि वे बाजार को अकेले संभाल सकें?
पीएम मोदी की नसीहतें और सरकार का बचाव
10 मई को हैदराबाद में दिए अपने भाषण में पीएम मोदी ने मध्य-पूर्व संकट (Middle East crisis) और ईरान-अमेरिका तनाव (Iran-US tension) को कोविड-19 (Covid-19) जैसी स्थिति बताया। उन्होंने जनता से 'वर्क फ्रॉम होम' (work from home) पर जोर देने, ईंधन (fuel) बचाने, विदेश यात्रा न करने, एक साल तक सोना (gold) न खरीदने और विदेशों में शादियाँ टालने की अपील की। पीएम की इस नसीहत में दो खास बातें छिपी थीं: पहला, भारत के आर्थिक हालात के लिए ईरान युद्ध (Iran war) जिम्मेदार है, यानी सरकार खराब आर्थिक हालत के लिए जिम्मेदार नहीं है। दूसरा, यदि जनता सरकार के साथ कोविड-19 जैसा सहयोग नहीं करती, तो वह भी आने वाली खराब आर्थिक स्थिति के लिए जिम्मेदार होगी। विपक्ष ने इसे अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का प्रयास बताया है।
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निजी निवेश में सुस्ती और FDI का बहिर्प्रवाह
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) ने कई बार सार्वजनिक तौर पर निजी कंपनियों (private companies) की निवेश के प्रति अनिच्छा पर हैरानी जताई है। सरकार ने टैक्स (tax) कम किए, बैंकों की बैलेंस शीट (balance sheet) साफ की और बुनियादी ढांचे (infrastructure) पर सरकारी पैसा खर्च किया, फिर भी वित्त वर्ष 2023-24 तक देश में कुल निवेश एक दशक के सबसे निचले स्तर पर आ गया। आरबीआई (RBI) के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2026 में भारत से नेट एफडीआई आउटफ्लो (net FDI outflow) दर्ज हुआ, यानी देश में पैसा आने से ज्यादा पैसा बाहर गया। सरकार और उसके समर्थक इस गिरावट के लिए वैश्विक अस्थिरता (global instability) को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, लेकिन अर्थशास्त्री मानते हैं कि असल समस्या घरेलू आर्थिक अनिश्चितता (domestic economic uncertainty) में है। निजी निवेश की रफ्तार कमजोर हुई है, उपभोग (consumption) घटा है, बेरोजगारी (unemployment) और आय संकट (income crisis) ने बाजार की मांग (market demand) को प्रभावित किया है, और उद्योग जगत भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं दिख रहा।
विश्लेषकों का मानना है कि विदेशी निवेशक केवल राजनीतिक स्थिरता (political stability) नहीं देखते, बल्कि नीति की विश्वसनीयता (policy reliability), न्यायिक पारदर्शिता (judicial transparency), कर ढांचे की स्थिरता (tax structure stability) और संस्थागत भरोसे (institutional trust) को भी महत्व देते हैं। भारत में व्यापार करना अभी भी जटिल है और नीतिगत अनिश्चितता (policy uncertainty) विदेशी निवेशकों को सतर्क बना रही है। पीएम मोदी की सोने की खपत कम करने की अपील का एक गंभीर पहलू यह भी है कि यह भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (forex reserves) पर मंडरा रहे खतरे का संकेत है, क्योंकि भारत सोने के सबसे बड़े आयातकों (importers) में से एक है।
विपक्षी दलों, जिनमें कांग्रेस (Congress), आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) और समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) शामिल हैं, ने सरकार की आर्थिक नीतियों और पीएम मोदी के बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सरकार पर जनता पर बोझ डालने और अपनी विफलताओं का ठीकरा वैश्विक परिस्थितियों पर फोड़ने का आरोप लगाया है। यह स्थिति संकेत देती है कि आने वाले समय में देश में महंगाई (inflation) और ईंधन के दाम (fuel prices) बढ़ सकते हैं, जिसका सीधा असर आम जनता, खासकर गरीब और मजदूर तबके पर पड़ेगा। यदि घरेलू निवेश, रोजगार सृजन (job creation) और उपभोक्ता विश्वास (consumer confidence) में सुधार नहीं हुआ, तो 'विश्वगुरु अर्थव्यवस्था' (Vishwaguru economy) का दावा केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा।
*Image is AI-generated and used for representational purposes only.