उद्योग मंडल सीआईआई (CII) के अध्यक्ष राजीव मेमानी ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण चेतावनी जारी की है, जिसमें उन्होंने कहा है कि पश्चिम एशिया में लंबा खिंचने वाला संघर्ष भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है। उनका अनुमान है कि यह संकट देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर को मौजूदा अनुमानित स्तर से नीचे लाकर 6.5 प्रतिशत से भी कम कर सकता है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच अपनी रफ्तार बनाए रखने का प्रयास कर रहा है, और यह आम नागरिकों से लेकर नीति निर्माताओं तक सभी के लिए चिंता का विषय है।
मेमानी ने बातचीत में विस्तार से बताया कि यदि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और उससे उत्पन्न ऊर्जा संकट लंबे समय तक बना रहता है, तो यह न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया की आर्थिक वृद्धि के लिए सबसे बड़ा जोखिम बन जाएगा। उन्होंने कहा कि समुद्री आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधाएं और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगी।
पश्चिम एशिया संकट: भारत की जीडीपी वृद्धि दर पर संभावित प्रभाव
राजीव मेमानी के अनुसार, भारत की आर्थिक वृद्धि दर की दिशा पश्चिम एशिया संकट के समाधान पर बहुत निर्भर करती है। उनका मानना है कि यदि यह संकट समय रहते सुलझ जाता है, तो आर्थिक वृद्धि की रफ्तार एक बार फिर तेज हो सकती है और यह 6.5 से 7 प्रतिशत के बीच रह सकती है। हालांकि, यदि यह संघर्ष बहुत लंबे समय तक खिंचता है, तो जीडीपी (GDP) वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत से नीचे खिसक सकती है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि जब तक पश्चिम एशिया का संकट समाप्त नहीं होता, तब तक जीडीपी वृद्धि और ब्याज दरों (interest rates) को लेकर स्पष्ट आकलन करना मुश्किल है।
कच्चे तेल की कीमतों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ता है। मेमानी ने इस बात पर जोर दिया कि 100 डॉलर प्रति बैरल (barrel) से ऊपर की कोई भी कीमत आर्थिक वृद्धि को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगी। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत अभी तक अपनी ऊर्जा मांग के ढांचे में पर्याप्त बदलाव नहीं कर पाया है और बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। पिछले 10-12 वर्षों में, तेल की कीमतें सामान्य रूप से संतुलित रही हैं, जिससे भारत को मजबूत आर्थिक वृद्धि हासिल करने में मदद मिली है। लेकिन मौजूदा हालात एक नई चुनौती पेश कर रहे हैं। गौरतलब है कि आधिकारिक अनुमान के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में देश की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जिस पर इस संकट का सीधा असर पड़ सकता है।
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ब्याज दरें और एमएसएमई (MSME) क्षेत्र पर असर
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति (monetary policy) के रुख पर पूछे जाने पर, मेमानी ने संकेत दिया कि निकट भविष्य में ब्याज दरों में कमी की संभावना कम है। केंद्रीय बैंक की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति ने आठ अप्रैल को सर्वसम्मति से नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने का फैसला किया था। समिति ने अपने फैसले में पश्चिम एशिया संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी, रुपये में कमजोरी और व्यापार प्रवाह (trade flow) में बाधा से बढ़ी अनिश्चितता का भी उल्लेख किया था।
सीआईआई अध्यक्ष ने पश्चिम एशिया संकट के प्रभावों से सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (MSMEs) को राहत देने के लिए सरकार से लक्षित उपाय करने की भी वकालत की। उन्होंने सुझाव दिया कि विशेष रूप से ऐसे कदम उठाए जाएं जो ऋण से जुड़ी समस्याओं के कारण एमएसएमई क्षेत्र पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को दूर कर सकें। यह क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और किसी भी बड़े झटके से इसे बचाना महत्वपूर्ण है।
कारोबार सुगमता और न्यायिक सुधारों की आवश्यकता
मेमानी ने कारोबार सुगमता (ease of doing business) और न्यायिक सुधारों (judicial reforms) में तेजी लाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि पिछले 12-18 महीनों में इन क्षेत्रों में सरकार ने सराहनीय काम किया है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। उनका मानना है कि विवादों की संख्या कम करने और यदि कोई विवाद होता है, तो उसके शीघ्र समाधान की व्यवस्था होनी चाहिए। यह निवेशकों का विश्वास बढ़ाने और आर्थिक गतिविधियों को गति देने के लिए आवश्यक है।
कुल मिलाकर, राजीव मेमानी की यह चेतावनी भारत के नीति निर्माताओं और व्यापारिक समुदाय के लिए एक वेक-अप कॉल (wake-up call) है। पश्चिम एशिया संकट के कारण उत्पन्न होने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए एक सुनियोजित रणनीति और त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता है। ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन और घरेलू मांग को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करना महत्वपूर्ण होगा ताकि भारत अपनी आर्थिक वृद्धि की गति को बनाए रख सके और वैश्विक अनिश्चितताओं का सामना कर सके।
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