थाईलैंड का 'लैंड ब्रिज' प्रोजेक्ट: भारत के 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' के लिए कैसे बनेगा गेम चेंजर बूस्टर?

थाईलैंड के लैंड ब्रिज प्रोजेक्ट से भारत के ग्रेट निकोबार पोर्ट को मिलेगा बूस्टर

एशिया के समुद्री व्यापार मार्गों में एक बड़ा बदलाव आने वाला है, जो भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से मील का पत्थर साबित हो सकता है। थाईलैंड सरकार ने अपने महत्वाकांक्षी 30 बिलियन डॉलर के 'लैंड ब्रिज' प्रोजेक्ट (Land Bridge Project) को हरी झंडी दे दी है। यह परियोजना सिर्फ थाईलैंड के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के ड्रीम 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' (Great Nicobar Project) के लिए भी एक बड़ा बूस्टर (Booster) साबित होगी। यह नया व्यापार मार्ग दशकों से चले आ रहे मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) की भीड़भाड़ और बाधाओं का एक सशक्त विकल्प बनकर उभरेगा, जिससे वैश्विक शिपिंग नेटवर्क (Global Shipping Network) में भारत की भूमिका और मजबूत होगी।

थाईलैंड का 'लैंड ब्रिज' प्रोजेक्ट: क्या है यह गेम चेंजर?

वर्तमान में, पूर्वी एशिया (चीन, जापान) से मिडिल ईस्ट (Middle East) और यूरोप (Europe) जाने वाले जहाजों को इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच स्थित 900 किलोमीटर लंबे, संकरे और अत्यधिक भीड़भाड़ वाले मलक्का स्ट्रेट (Malacca Strait) से होकर गुजरना पड़ता है। इस रास्ते की वजह से जहाजों की रफ्तार धीमी हो जाती है, जिससे कीमती समय और ईंधन दोनों बर्बाद होते हैं, और माल ढुलाई की लागत (Freight Cost) बढ़ जाती है।

थाईलैंड के प्रधानमंत्री अनुतिन चरनविराकुल ने इस समस्या का एक अनूठा समाधान पेश किया है। थाईलैंड सरकार अपने देश के दो छोरों पर दो बड़े गहरे समुद्री बंदरगाहों (Deep Sea Ports) का निर्माण कर रही है: पूर्वी छोर (थाईलैंड की खाड़ी - Gulf of Thailand) पर 'चुमपोन' पोर्ट (Chumphon Port) और पश्चिमी छोर (अंडमान सागर - Andaman Sea) पर 'रानोंग' पोर्ट (Ranong Port)। इन दोनों बंदरगाहों को जोड़ने के लिए थाईलैंड अपनी जमीन पर एक 90 किलोमीटर लंबा हाई-स्पीड रेलवे लाइन (High-Speed Railway Line), मल्टी-लेन हाईवे (Multi-Lane Highway) और पाइपलाइन (Pipeline) का एक विशाल 'लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर' (Logistics Corridor) तैयार कर रहा है। इसका मतलब यह होगा कि जहाज एक तरफ माल उतारेंगे, जो ट्रेनों और ट्रकों के जरिए कुछ ही घंटों में जमीन पार कर दूसरी तरफ पहुंचेगा और वहां से दूसरे जहाजों में लोड होकर आगे निकल जाएगा। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, इस परियोजना से माल ढुलाई की लागत में सीधे 30% की कमी आएगी और चीन से लेकर भारत व मिडिल ईस्ट के बीच व्यापार का सफर पूरे 14 दिन पहले ही खत्म हो जाएगा।

भारत के 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' से सीधा कनेक्शन

भारत सरकार अंडमान-निकोबार द्वीप समूह (Andaman-Nicobar Islands) के 'ग्रेट निकोबार' में एक बेहद विशाल इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (International Transshipment Port) का निर्माण कर रही है। जब थाईलैंड का 'लैंड ब्रिज' चालू होगा, तो भारत का यह इलाका वैश्विक शिपिंग नेटवर्क (Global Shipping Network) का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन जाएगा। अंडमान और निकोबार के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने भी इस बात पर जोर दिया है कि थाईलैंड का यह प्रोजेक्ट भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के भू-राजनीतिक महत्व (Geopolitical Importance) को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा देगा। थाईलैंड के पश्चिमी छोर पर स्थित रानोंग पोर्ट से जब जहाज माल लेकर निकलेंगे, तो उनके ठीक सामने भारत का ग्रेट निकोबार पोर्ट उनका स्वागत करने के लिए तैयार खड़ा होगा। ये दोनों प्रोजेक्ट्स मिलकर एक-दूसरे के पूरक (Complementary) का काम करेंगे, जिससे हिंद महासागर (Indian Ocean) में भारत की स्थिति और मजबूत होगी।

रानोंग पोर्ट और भारत का रणनीतिक मेल

थाईलैंड के 'लैंड ब्रिज' का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा, रानोंग पोर्ट, सीधे अंडमान सागर में भारत की समुद्री सीमा के ठीक सामने खुलता है। थाईलैंड सरकार की रणनीति अपने इस पश्चिमी बंदरगाह को भारत के 'सागरमाला प्रोजेक्ट' (Sagar Mala Project) और अंडमान-निकोबार के पोर्ट्स के साथ सीधे तौर पर जोड़ना है। इससे भारत और थाईलैंड के बीच की समुद्री दूरी नाममात्र की रह जाएगी और एक सीधा शिपिंग रूट (Direct Shipping Route) खुल जाएगा। दोनों देश BIMSTEC (बिम्सटेक) के महत्वपूर्ण सदस्य हैं और थाईलैंड अपनी 'लुक वेस्ट' नीति (Look West Policy) के तहत भारत के विशाल बाजार का फायदा उठाने के लिए उत्सुक है। इस कॉरिडोर के जरिए दक्षिण चीन (South China) और थाईलैंड का माल बहुत कम समय और लागत में भारत के पूर्वी तटों जैसे कोलकाता, चेन्नई और विशाखापट्टनम के बंदरगाहों तक सीधे पहुंच सकेगा, जिससे भारतीय व्यापारियों को भारी लाभ होगा।

रक्षा विशेषज्ञों और सिंगापुर के आईएसईएएस-यूसुफ इसहाक इंस्टीट्यूट (ISEAS-Yusof Ishak Institute) के विश्लेषक यूजीन मार्क (Eugene Mark) का मानना है कि यह प्रोजेक्ट थाईलैंड के लिए एक बड़ा राष्ट्रीय सुरक्षा एसेट (National Security Asset) बनेगा। यदि थाईलैंड इस पूरे प्रोजेक्ट में चीन की बड़ी सरकारी कंपनियों को मालिकाना हक देने के बजाय भारत और अन्य बिम्सटेक देशों के साथ मिलकर काम करता है, तो हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक स्थिति और कमान इतनी मजबूत हो जाएगी कि चीन चाहकर भी कोई दादागिरी नहीं कर पाएगा।

संक्षेप में, थाईलैंड का 'लैंड ब्रिज' प्रोजेक्ट केवल एक व्यापारिक पहल नहीं, बल्कि भारत के लिए एक रणनीतिक अवसर है। यह न केवल ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को गति देगा, बल्कि मलक्का स्ट्रेट पर निर्भरता कम करके भारत की समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक पहुंच को भी बढ़ाएगा। यह भारत और थाईलैंड के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करते हुए, पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific Region) में एक नई आर्थिक और रणनीतिक शक्ति संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

*Image is AI-generated and used for representational purposes only.

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